पूजा में इस्तेमाल होने वाली रोली सिंदूर से कैसे है अलग? जानें रोली का धार्मिक महत्व और सही इस्तेमाल
Roli ka dharmik mahatva: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ, हवन या शुभ कार्य की शुरुआत में रोली का इस्तेमाल अत्यंत आवश्यक माना जाता है। मान्यता है कि रोली के बिना तिलक अधूरा माना जाता है, इसी वजह से देवी-देवताओं की पूजा से लेकर कलश स्थापना और यजमानों को तिलक लगाने तक, हर जगह रोली का इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि हर हिंदू घर की पूजा थाली में रोली का एक डिब्बा जरूर मौजूद रहता है।
रोली को क्यों माना जाता है पवित्र?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, रोली के लाल रंग को शक्ति, ऊर्जा और शुभता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि यह रंग सूर्य की ऊर्जा और सकारात्मकता से जुड़ा माना जाता है, इसी वजह से इसे तिलक के रूप में माथे पर लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि रोली का लाल रंग देवी शक्ति और उनकी कृपा का भी प्रतीक माना जाता है, इसी वजह से देवी पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है।
रोली और सिंदूर में क्या है अंतर?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, रोली और सिंदूर, दोनों ही लाल रंग के होने के बावजूद अलग-अलग उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। मान्यता है कि रोली को हल्दी और चूने के मिश्रण से तैयार किया जाता है, और इसे मुख्य रूप से पूजा-पाठ, तिलक और कलश स्थापना में इस्तेमाल किया जाता है। वहीं सिंदूर को मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं अपने सुहाग के प्रतीक के रूप में मांग में भरती हैं। इसी वजह से दोनों का धार्मिक महत्व और इस्तेमाल का तरीका अलग-अलग माना जाता है।
रोली से तिलक लगाने का सही तरीका
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रोली से तिलक लगाते समय इसमें अक्षत मिलाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि तिलक को हमेशा अनामिका उंगली से माथे के बीचोंबीच लगाना चाहिए, और इस दौरान मन में भगवान का ध्यान करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इसके अलावा किसी भी शुभ कार्य में यजमान या अतिथियों को रोली से तिलक लगाकर स्वागत करने की भी परंपरा प्रचलित है।
किन अवसरों पर होता है रोली का खास इस्तेमाल
हिंदू परंपरा में हवन, कलश स्थापना, रक्षाबंधन, भाई दूज और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर रोली का इस्तेमाल विशेष रूप से किया जाता है। मान्यता है कि रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर राखी बांधने से पहले रोली से तिलक करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह भाई की लंबी उम्र और सुरक्षा की कामना का प्रतीक होता है।
आज भी हर पूजा में इस्तेमाल होती है रोली
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन रोली का इस्तेमाल आज भी उतना ही महत्वपूर्ण बना हुआ है। आज भी हर छोटी-बड़ी पूजा और शुभ अवसर पर रोली से तिलक लगाना एक अनिवार्य परंपरा मानी जाती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
9 जुलाई को अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम विदाई, भारत की ओर से ये प्रतिनिधि होंगे शामिल?
ईरान के राजनीतिक और धार्मिक क्षेत्र पर कई दशकों तक मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत से दुनिया भर में हलचल मच गई थी। वहीं उनकी अंतिम विदाई का कार्यक्रम 9 जुलाई को रखा गया है, जिसके लिए दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों को बुलाया गया है। इसी क्रम में भारत के प्रमुख नेताओं को भी निमंत्रण मिला है।
मिली जानकारी के अनुसार, ईरान ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन नबीन और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को दिवंगत सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में शामिल होने का न्योता भेजा है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यह जानकारी भरोसेमंद सूत्रों के हवाले से सामने आई है, जो भारत-ईरान संबंधों के महत्व को दिखाती है।
अमेरिका-इजरायल के हमलों में हुआ था अयातुल्ला खामेनेई का निधन
गौरतलब है कि 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के हमलों में अयातुल्ला खामेनेई का निधन हो गया था। उनके निधन के बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने पिछले सप्ताह ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था। यह निमंत्रण दोनों देशों के बीच लगातार बने राजनयिक संबंधों को दिखाता है।
अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम 5 जुलाई से 9 जुलाई तक आयोजित किए जाएंगे
अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़े कार्यक्रम 5 जुलाई से 9 जुलाई तक आयोजित किए जाएंगे। इनमें 5, 6 और 7 जुलाई को तेहरान और कोम शहरों में विशेष कार्यक्रम होंगे। ईरान की सरकारी मीडिया आईआरएनए के अनुसार, अंतिम विदाई में करीब 1.2 करोड़ से 2 करोड़ लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसे देखते हुए पूरे तेहरान में सुरक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं की गई हैं। शहर के कई प्रमुख रास्तों पर वाहनों की आवाजाही भी सीमित रहेगी, ताकि व्यवस्था बनी रहे।
4 और 5 जुलाई को तेहरान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 और 5 जुलाई को तेहरान स्थित इमाम खुमैनी मोसाला प्रार्थना हॉल में श्रद्धांजलि कार्यक्रम होंगे। इसके बाद 6 और 7 जुलाई को राजधानी तेहरान और मध्य ईरान के शहर कोम में अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। यह यात्रा शिया समुदाय की गहरी आस्था और दिवंगत नेता के प्रति सम्मान का प्रतीक होगी। कार्यक्रम का अंतिम चरण 9 जुलाई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में पूरा होगा, जहां दिवंगत नेता को शिया मुसलमानों के आठवें इमाम, इमाम रजा के पवित्र दरगाह परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
अयातुल्ला खामेनेई का निधन 86 वर्ष की उम्र में हुआ। उन्होंने पिछले 36 वर्षों तक ईरान पर मजबूत पकड़ के साथ शासन किया, जिससे वे देश के इतिहास के एक महत्वपूर्ण नेता बन गए।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
Haribhoomi
Mp Breaking News






