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खुद कोरोना पॉजिटिव, फिर भी मरीजों की चिंता… ऐसे थे पद्मश्री डॉ. केके अग्रवाल

नई दिल्ली, 4 सितंबर (आईएएनएस)। देश के जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार अग्रवाल ने अपनी पूरी जिंदगी लोगों की मदद और उन्हें बेहतर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में लगा दी। जब कोरोना महामारी ने देश को अपनी चपेट में लिया और वह खुद भी कोरोना पॉजिटिव हो गए, तब भी मरीजों की चिंता उनके मन से कम नहीं हुई।

डॉ. केके अग्रवाल का जन्म 5 सितंबर 1958 को हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एमबीबीएस और बाद में एमडी की पढ़ाई की। चिकित्सा के क्षेत्र में उन्होंने लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं और नई दिल्ली के मूलचंद मेडिसिटी में वरिष्ठ कंसल्टेंट के तौर पर भी काम किया। हालांकि उनकी पहचान सिर्फ एक सफल हृदय रोग विशेषज्ञ की नहीं थी। वह जरूरतमंद मरीजों की मदद करने और आम लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए भी जाने जाते थे।

डॉ. अग्रवाल का मानना था कि डॉक्टर और मरीज के बीच सिर्फ बीमारी और इलाज का रिश्ता नहीं होना चाहिए बल्कि भरोसे और संवेदना का रिश्ता भी होना चाहिए। यही वजह थी कि उनके पास इलाज के लिए आने वाले लोगों में बड़ी संख्या जरूरतमंदों की होती थी। दिल्ली के खेलगांव स्थित उनके कार्यालय के बाहर भी अक्सर मरीजों और जरूरतमंद लोगों की कतार देखने को मिलती थी।

कोरोना महामारी के दौरान उनकी सेवा की भावना और भी खुलकर सामने आई। जब देश में संक्रमण तेजी से फैल रहा था, तब उन्होंने ऑनलाइन माध्यमों का सहारा लेकर लोगों की मदद शुरू कर दी। फेसबुक, जूम और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए वह लोगों के सवालों का जवाब देते थे। कोरोना से जुड़े लक्षणों, सावधानियों और इलाज को लेकर लोगों को समझाते थे और उनका डर कम करने की कोशिश करते थे।

जब वह खुद कोरोना संक्रमित हो गए, तब भी उन्होंने लोगों से संपर्क बनाए रखा। बीमारी के बीच भी वह मरीजों के सवाल सुनते रहे और उन्हें हिम्मत देते रहे। यहां तक कि ऑक्सीजन पाइप लगी हालत में भी वह ऑनलाइन लोगों से बातचीत करते नजर आए। उनके लिए मरीजों की चिंता अपनी परेशानी से कहीं बड़ी थी।

डॉ. केके अग्रवाल चिकित्सा के साथ भारतीय संस्कृति और परंपराओं में भी गहरी रुचि रखते थे। वह महाभारत में मौजूद कई प्रसंगों को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते थे और भगवान कृष्ण को भारत का पहला काउंसलर बताते थे। उनका मानना था कि मानसिक स्वास्थ्य को समझने के लिए जीवन, भावनाओं और व्यवहार को भी समझना जरूरी है।

चिकित्सा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। वर्ष 2005 में उन्हें डॉ. बीसी रॉय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें राष्ट्रीय विज्ञान संचार पुरस्कार और कई अन्य सम्मान भी मिले। वर्ष 2010 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया।

डॉ. केके अग्रवाल 17 मई 2021 को कोरोना संक्रमण से जिंदगी की जंग हार गए लेकिन उनकी सेवा की कहानी आज भी लोगों को प्रेरणा देती है। खुद बीमारी से जूझते हुए भी दूसरों की चिंता करना आसान नहीं होता। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।

--आईएएनएस

पीआईएम/पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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NSE IPO के बीच IFCI का शेयर क्यों बना चर्चा का विषय, जानें वजह

IFCI Share Price: एक कंपनी है IFCI, जो कि सरकारी कंपनी है. पिछले 6 महीने में इसके शेयर की कीमत करीब 80% तक बढ़ चुकी है. यानी अगर किसी ने 6 महीने पहले इसमें ₹100 लगाए होते, तो आज उसकी वैल्यू करीब ₹180 हो जाती. अब सवाल यह उठता है कि इसके शेयर में आखिर इतनी तेजी आई कैसे? इसकी वजह है NSE, यानी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का IPO आना.

IFCI और NSE का आपस में रिश्ता क्या है?

IFCI और NSE के बीच एक कड़ी जुड़ी हुई है. मान लीजिए तीन कंपनियां हैं - IFCI, SHCIL और NSE. IFCI के पास SHCIL कंपनी के 52.86% शेयर हैं. यानी SHCIL का आधे से ज्यादा हिस्सा IFCI का है. और SHCIL के पास NSE के 4.44% शेयर हैं. इस हिसाब से, अगर IFCI के पास SHCIL का आधे से ज्यादा हिस्सा है, और SHCIL के पास NSE का थोड़ा हिस्सा है, तो घूम-फिरकर IFCI का भी NSE में एक बहुत छोटा-सा हिस्सा बनता है. इसे इस हिसाब से आप कैलकुलेट कर सकते हैं-

52.86% × 4.44% = करीब 2.35%

यानी IFCI का NSE में इनडायरेक्टली 2.35% हिस्सा बनता है. यह हिस्सा सीधे IFCI के नाम पर नहीं है, बल्कि SHCIL के जरिए है.

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अब सवाल यह है कि यह हिस्सा कितने पैसों का है?

अभी NSE की कोई तय कीमत नहीं है, क्योंकि यह अभी शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं है. लेकिन खबरों के मुताबिक, अगर NSE की वैल्यू ₹5 लाख करोड़ मानी जाए (यह केवल एक अनुमान है) तो इस हिसाब से IFCI का इनडायरेक्ट हिस्सा करीब ₹11,700 करोड़ का बैठता है. यह आंकड़ा IFCI की मौजूदा कुल मार्केट वैल्यू का करीब आधा है. इसी वजह से निवेशक इतने उत्साहित हैं और इसके स्टॉक में खरीदारी बढ़ रही है.

लेकिन यहां भी एक बड़ा पेच है

यह सोचना गलत होगा कि ₹11,700 करोड़ सीधे IFCI के खाते में आ जाएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि NSE के शेयर SHCIL के नाम पर हैं, IFCI के नाम पर नहीं. IFCI केवल SHCIL का मालिक है, इसलिए वह सीधे इन शेयरों को नहीं बेच सकती. दूसरी बात, खबरों के मुताबिक SHCIL अपने पास मौजूद NSE के 4.4% हिस्से में से सिर्फ 0.44% हिस्सा ही IPO में बेच सकती है, पूरा नहीं. यानी अगर ₹5 लाख करोड़ की वैल्यू मान लें, तो यह 0.44% वाला हिस्सा करीब ₹2,200 करोड़ का बनता है.

अब इसमें से IFCI का 52.86% हिस्सा निकालें तो यह आंकड़ा करीब ₹1,160 करोड़ बैठता है. ध्यान रहे, यह पैसा भी सीधे IFCI को नहीं मिलेगा. यह पैसा पहले SHCIL के पास जाएगा. इसके बाद SHCIL यह तय करेगी कि इस पैसे का क्या करना है. चाहे वो पैसा अपने पास रखे, दोबारा कहीं निवेश करे, डिविडेंड के रूप में बांटे, या किसी और काम में लगाए. इसीलिए NSE का IPO IFCI के लिए सीधा कैश मिलने जैसा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा मौका है जिससे यह पता चलेगा कि कंपनी के अंदर छुपी हुई असल वैल्यू कितनी है.

फिर NSE का IPO IFCI के लिए क्यों मायने रखता है?

अभी तक NSE शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं है, इसलिए इसकी सही कीमत का अंदाजा लगाना मुश्किल है. लेकिन जैसे ही NSE लिस्ट हो जाएगी, बाजार में इसका एक साफ भाव सामने आ जाएगा. इससे यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि SHCIL के पास मौजूद NSE के बचे हुए शेयर असल में कितने के हैं. इससे IFCI के अंदर छुपी हुई यह वैल्यू और साफ तौर पर दिखने लगेगी. ऐसा अक्सर होता है कि जब किसी कंपनी के अंदर छुपा हुआ कोई निवेश अचानक कीमती दिखने लगता है, तो निवेशक उस कंपनी के शेयर को भी ज्यादा भाव देने लगते हैं, भले ही कंपनी का असली कामकाज पहले जैसा ही हो.

लेकिन शेयर पहले ही काफी बढ़ चुका है

अब यहां एक जरूरी बात समझनी होगी. IFCI का शेयर 2 मार्च को ₹56.34 पर था, और 2 सितंबर तक यह ₹98.32 पर पहुंच चुका है. यानी सिर्फ 6 महीने में इसमें करीब 75% की तेजी आ चुकी है. पिछले 1 साल में यह 60% से ज्यादा और पिछले 3 साल में तो 400% से ज्यादा चढ़ चुका है. इसका मतलब यह है कि NSE वाली यह कहानी अब कोई नई या छुपी हुई बात नहीं रह गई है. बाजार में यह चर्चा महीनों से चल रही है, और जब-जब NSE के IPO को लेकर कोई अच्छी खबर आई है, IFCI का शेयर पहले ही उछल चुका है. तो अब सवाल यह नहीं है कि क्या IFCI के अंदर छुपी हुई वैल्यू है? बल्कि सवाल यह है कि इस छुपी हुई वैल्यू का कितना हिस्सा शेयर की मौजूदा कीमत में पहले से शामिल हो चुका है?

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NSE का IPO अभी पूरा नहीं हुआ है

एक और जरूरी बात यह है कि NSE IPO अभी सिर्फ मंजूरी के करीब है, पूरी तरह तय नहीं हुआ है. SEBI के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने कहा है कि रेगुलेटर IPO के दस्तावेजों को मंजूरी देने के करीब है. यह एक अच्छी खबर जरूर है, लेकिन मंजूरी के करीब होना और IPO पूरा हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं. अभी भी यह साफ नहीं है कि आखिर में NSE की कीमत क्या तय होगी, कितने शेयर बेचे जाएंगे और उस पैसे का इस्तेमाल कैसे होगा. यानी बाजार अभी से उम्मीदों के आधार पर कीमत बढ़ा रहा है, जबकि असली फायदा मिलने में अभी वक्त लग सकता है.

IFCI का अपना बिजनेस भी है

फिलहाल सारा फोकस NSE वाली कहानी पर है, लेकिन यह भूलना नहीं चाहिए कि IFCI खुद भी एक फाइनेंशियल कंपनी है, जिसका अपना कामकाज, कमाई और बैलेंस शीट है. जून 2026 को खत्म हुई तिमाही में कंपनी की कुल आय करीब ₹358 करोड़ और नेट प्रॉफिट करीब ₹60 करोड़ रहा. हालांकि पिछली कुछ तिमाहियों में कंपनी की आय में गिरावट देखी गई है, भले ही मुनाफे में कुछ सुधार हुआ हो. 

यहां निवेशकों को दो अलग-अलग चीजें समझनी होंगी. एक है कंपनी की ऑपरेटिंग वैल्यू, यानी उसका खुद का लेंडिंग और निवेश का बिजनेस. दूसरी है इन्वेस्टमेंट वैल्यू, यानी SHCIL और उसके जरिए NSE में जो हिस्सेदारी है उसकी वैल्यू. हाल की तेजी ज्यादातर इसी दूसरी वजह से आई है. इसलिए आगे चलकर IFCI के शेयर का परफॉर्मेंस सिर्फ इसके कोर बिजनेस पर ही नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि NSE से जुड़ी उम्मीदें आखिर में सच साबित होती हैं या नहीं.

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डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए दी गई है और इसे निवेश की सलाह नहीं माना जाना चाहिए. किसी भी निवेश फैसले से पहले कृपया अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लें.

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