Janmashtami 2026: जन्माष्टमी के दिन पीरियड्स आ जाएं तो क्या करें? व्रत रखें या नहीं, जानिए पूजा से जुड़े नियम
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का प्रमुख हिंदू पर्व है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और रात में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जन्माष्टमी की पूजा मध्यरात्रि के समय करने की परंपरा है। ऐसे में जिन महिलाओं को पीरियड्स की तारीख आसपास होती है, उनके मन में अक्सर यह सवाल आता है कि अगर जन्माष्टमी के दिन मासिक धर्म शुरू हो जाए तो क्या व्रत रखा जा सकता है? क्या पूजा करना जरूरी है या उससे दूरी बनानी चाहिए?
इस विषय में अलग-अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसे लेकर कोई एक सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं माना जा सकता। हालांकि, जिन परंपराओं में मासिक धर्म के दौरान कुछ पूजा-सामग्री या मंदिर के प्रत्यक्ष स्पर्श से परहेज किया जाता है, वहां महिलाएं बिना प्रत्यक्ष पूजा किए भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और भक्ति कर सकती हैं।
पीरियड्स में जन्माष्टमी का व्रत रख सकते हैं?
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, मासिक धर्म शुरू होने पर जन्माष्टमी का व्रत छोड़ना अनिवार्य नहीं माना जाता। अगर महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ महसूस कर रही है और उपवास करना उसके लिए सहज है, तो वह अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रख सकती है। हालांकि, यहां स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है। पीरियड्स के दौरान कमजोरी, चक्कर, अत्यधिक दर्द या अन्य परेशानी हो तो निर्जला या कठिन उपवास करने की जरूरत नहीं है। ऐसी स्थिति में फलाहार या हल्का भोजन लेकर व्रत रखने की परंपरा अपनाई जा सकती है। धार्मिक आस्था के साथ शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।
कैसे लें व्रत का संकल्प?
अगर परिवार की परंपरा में मासिक धर्म के दौरान पूजा स्थान या पूजा सामग्री को स्पर्श करने की मनाही मानी जाती है, तो महिला बिना पूजा सामग्री छुए व्रत का संकल्प ले सकती है। सुबह स्नान आदि के बाद शांत मन से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और मन ही मन व्रत का संकल्प लें। भगवान के जन्म, बाल स्वरूप और उनकी लीलाओं का स्मरण करते हुए प्रार्थना की जा सकती है। भक्ति के लिए पूजा सामग्री का प्रत्यक्ष स्पर्श हर परंपरा में अनिवार्य नहीं माना जाता।
पूजा करनी हो तो क्या तरीका अपनाएं?
मासिक धर्म के दौरान पूजा को लेकर हिंदू समाज में अलग-अलग रीति-रिवाज हैं। कुछ परिवारों में इस दौरान मंदिर, पूजा स्थल, मूर्ति और धार्मिक वस्तुओं को छूने से परहेज किया जाता है। अगर आपके घर में भी ऐसी परंपरा है, तो परिवार का कोई दूसरा सदस्य लड्डू गोपाल की पूजा, अभिषेक और भोग की व्यवस्था कर सकता है। महिला पूजा स्थल से अलग बैठकर भगवान का ध्यान कर सकती है। जन्माष्टमी की कथा सुनना, कृष्ण भजन सुनना और मानसिक रूप से भगवान की पूजा करना भी भक्ति का एक तरीका माना जाता है।
मंत्र जाप और कृष्ण कथा का लें सहारा
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के नाम का जाप करने के लिए पूजा सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। महिला मन ही मन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप कर सकती है। इसके अलावा 'हरे कृष्ण' महामंत्र का स्मरण भी किया जा सकता है। श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनना, भगवद्गीता का पाठ या श्रवण करना और कृष्ण भजन सुनना भी दिन को आध्यात्मिक रूप से विशेष बना सकता है। इस तरह पूजा सामग्री को स्पर्श किए बिना भी श्रद्धा और भक्ति बनाए रखी जा सकती है।
प्रसाद और भोग बनाने को लेकर क्या मान्यता है?
कुछ पारंपरिक मान्यताओं में मासिक धर्म के दौरान पूजा के लिए भोग या प्रसाद तैयार करने से परहेज किया जाता है। ऐसी स्थिति में परिवार का कोई अन्य सदस्य भगवान कृष्ण के लिए माखन-मिश्री, पंजीरी, फल या अन्य प्रसाद तैयार कर सकता है। हालांकि, यह नियम सभी परिवारों या संप्रदायों में समान नहीं है। इसलिए इस मामले में अपने घर की परंपरा और व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है।
पीरियड्स खत्म होने के बाद क्या करें?
मासिक धर्म समाप्त होने के बाद सामान्य धार्मिक दिनचर्या में लौटने को लेकर भी अलग-अलग पारिवारिक परंपराएं हैं। जिन घरों में स्नान के बाद पूजा या रसोई में प्रवेश करने की परंपरा है, वहां संबंधित रीति का पालन किया जाता है। यदि आपके परिवार में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने या अन्य शुद्धिकरण की परंपरा है, तो उसे अपनी मान्यता के अनुसार अपनाया जा सकता है। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई करके सामान्य रूप से भगवान कृष्ण की पूजा और भोग की व्यवस्था की जा सकती है।
भक्ति के लिए सबसे जरूरी है श्रद्धा
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा का पर्व है। पीरियड्स के दौरान पूजा-पद्धति को लेकर अलग-अलग धार्मिक और पारिवारिक मान्यताएं हो सकती हैं। इसलिए किसी महिला को इस प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया के कारण अपराधबोध या मानसिक दबाव महसूस करने की जरूरत नहीं है। अगर आपकी पारिवारिक परंपरा प्रत्यक्ष पूजा से परहेज करने की है, तो मानसिक पूजा, मंत्र जाप, कथा श्रवण और भजन के जरिए कृष्ण का स्मरण किया जा सकता है। वहीं व्रत के मामले में भी अपनी सेहत को ध्यान में रखना जरूरी है। खासकर कमजोरी या अस्वस्थता की स्थिति में उपवास को लेकर कठोरता बरतने के बजाय स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना बेहतर है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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