Mathura Janmashtami 2026: 200 किलो चांदी से सजा श्रीकृष्ण जन्मस्थान, पंचरत्नी पोशाक में होंगे कान्हा के दर्शन
भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में जन्माष्टमी की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में जन्मोत्सव भव्य तरीके से मनाया जाएगा। इस बार गर्भगृह की सजावट में करीब 200 किलो चांदी का इस्तेमाल किया गया है। जन्म की मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण पंचरत्नी पोशाक और रत्न जड़ित मुकुट में भक्तों को दर्शन देंगे। जन्मोत्सव को इस बार गौ रक्षा-राष्ट्र रक्षा के संकल्प को समर्पित किया गया है।
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर को जन्मोत्सव के लिए विशेष रूप से सजाया गया है। अब भक्तों को उस खास पल का इंतजार है, जब 4 सितंबर की मध्यरात्रि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाएगा।
जन्म के समय मंदिर परिसर में ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष गूंजेंगे। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालुओं के मथुरा पहुंचने की उम्मीद है।
200 किलो चांदी से सजा गर्भगृह
इस बार जन्मस्थान परिसर की सजावट को खास रूप दिया गया है। गर्भगृह की भव्य सजावट में करीब 200 किलोग्राम चांदी का इस्तेमाल किया गया है। चांदी की यह सजावट मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बनी हुई है। जन्मोत्सव की मध्यरात्रि में होने वाले मुख्य आयोजन के लिए मंदिर प्रबंधन की ओर से पूजा, श्रृंगार और दर्शन की व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।
पंचरत्नी पोशाक में दर्शन देंगे लड्डू गोपाल
जन्मोत्सव की रात भगवान श्रीकृष्ण कलहंस पुष्प-बंगले में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे। इस दौरान लड्डू गोपाल का विशेष श्रृंगार किया जाएगा।
मंदिर के सचिव कपिल शर्मा के मुताबिक, भगवान को पंचरत्नी पोशाक धारण कराई जाएगी। यह पोशाक समुद्र मंथन से प्राप्त रत्नों की भावना पर आधारित बताई गई है। भगवान के सिर पर रत्नों से सजा मुकुट भी सुशोभित होगा। इस विशेष पोशाक और मुकुट को ब्रज के कारीगरों ने तैयार किया है। इन्हें बनाने में कारीगरों को कई महीनों का समय लगा है।
पहले ही करा दिए गए विशेष पोशाक के दर्शन
जन्मोत्सव से एक दिन पहले गुरुवार शाम श्रद्धालुओं को भगवान की विशेष पोशाक और श्रृंगार के दर्शन कराए गए। बड़ी संख्या में भक्त जन्मस्थान परिसर पहुंचे। दिव्य श्रृंगार के दर्शन के दौरान पूरा परिसर ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयकारों से गूंजता रहा। श्रद्धालुओं के उत्साह को देखते हुए जन्मोत्सव की रात भी बड़ी संख्या में भक्तों के पहुंचने की संभावना है।
गौ रक्षा-राष्ट्र रक्षा के संकल्प को समर्पित जन्मोत्सव
इस वर्ष मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को गौ रक्षा-राष्ट्र रक्षा के संकल्प को समर्पित किया गया है। इसी भावना के साथ जन्मस्थान परिसर में धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं। मंदिर प्रबंधन की ओर से जन्मोत्सव के मुख्य कार्यक्रम के लिए विशेष तैयारियां की गई हैं।
सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन पर खास नजर
जन्मोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की है। मंदिर परिसर के साथ आसपास के इलाकों में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही को व्यवस्थित करने के इंतजाम किए गए हैं। दर्शन व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और जनसुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि जन्मोत्सव में आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न हो।
आधी रात गूंजेगा ‘नंद के आनंद भयो’
अब इंतजार उस पावन क्षण का है, जब 4 सितंबर की मध्यरात्रि श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव शुरू होगा। 200 किलो चांदी से सजा गर्भगृह, पंचरत्नी पोशाक और रत्न जड़ित मुकुट इस बार जन्मोत्सव के प्रमुख आकर्षणों में रहेंगे।
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी के दिन पीरियड्स आ जाएं तो क्या करें? व्रत रखें या नहीं, जानिए पूजा से जुड़े नियम
Janmashtami 2026: जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का प्रमुख हिंदू पर्व है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और रात में भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जन्माष्टमी की पूजा मध्यरात्रि के समय करने की परंपरा है। ऐसे में जिन महिलाओं को पीरियड्स की तारीख आसपास होती है, उनके मन में अक्सर यह सवाल आता है कि अगर जन्माष्टमी के दिन मासिक धर्म शुरू हो जाए तो क्या व्रत रखा जा सकता है? क्या पूजा करना जरूरी है या उससे दूरी बनानी चाहिए?
इस विषय में अलग-अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं में अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसे लेकर कोई एक सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं माना जा सकता। हालांकि, जिन परंपराओं में मासिक धर्म के दौरान कुछ पूजा-सामग्री या मंदिर के प्रत्यक्ष स्पर्श से परहेज किया जाता है, वहां महिलाएं बिना प्रत्यक्ष पूजा किए भी भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और भक्ति कर सकती हैं।
पीरियड्स में जन्माष्टमी का व्रत रख सकते हैं?
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, मासिक धर्म शुरू होने पर जन्माष्टमी का व्रत छोड़ना अनिवार्य नहीं माना जाता। अगर महिला शारीरिक रूप से स्वस्थ महसूस कर रही है और उपवास करना उसके लिए सहज है, तो वह अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रख सकती है। हालांकि, यहां स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है। पीरियड्स के दौरान कमजोरी, चक्कर, अत्यधिक दर्द या अन्य परेशानी हो तो निर्जला या कठिन उपवास करने की जरूरत नहीं है। ऐसी स्थिति में फलाहार या हल्का भोजन लेकर व्रत रखने की परंपरा अपनाई जा सकती है। धार्मिक आस्था के साथ शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।
कैसे लें व्रत का संकल्प?
अगर परिवार की परंपरा में मासिक धर्म के दौरान पूजा स्थान या पूजा सामग्री को स्पर्श करने की मनाही मानी जाती है, तो महिला बिना पूजा सामग्री छुए व्रत का संकल्प ले सकती है। सुबह स्नान आदि के बाद शांत मन से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और मन ही मन व्रत का संकल्प लें। भगवान के जन्म, बाल स्वरूप और उनकी लीलाओं का स्मरण करते हुए प्रार्थना की जा सकती है। भक्ति के लिए पूजा सामग्री का प्रत्यक्ष स्पर्श हर परंपरा में अनिवार्य नहीं माना जाता।
पूजा करनी हो तो क्या तरीका अपनाएं?
मासिक धर्म के दौरान पूजा को लेकर हिंदू समाज में अलग-अलग रीति-रिवाज हैं। कुछ परिवारों में इस दौरान मंदिर, पूजा स्थल, मूर्ति और धार्मिक वस्तुओं को छूने से परहेज किया जाता है। अगर आपके घर में भी ऐसी परंपरा है, तो परिवार का कोई दूसरा सदस्य लड्डू गोपाल की पूजा, अभिषेक और भोग की व्यवस्था कर सकता है। महिला पूजा स्थल से अलग बैठकर भगवान का ध्यान कर सकती है। जन्माष्टमी की कथा सुनना, कृष्ण भजन सुनना और मानसिक रूप से भगवान की पूजा करना भी भक्ति का एक तरीका माना जाता है।
मंत्र जाप और कृष्ण कथा का लें सहारा
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के नाम का जाप करने के लिए पूजा सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। महिला मन ही मन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप कर सकती है। इसके अलावा 'हरे कृष्ण' महामंत्र का स्मरण भी किया जा सकता है। श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनना, भगवद्गीता का पाठ या श्रवण करना और कृष्ण भजन सुनना भी दिन को आध्यात्मिक रूप से विशेष बना सकता है। इस तरह पूजा सामग्री को स्पर्श किए बिना भी श्रद्धा और भक्ति बनाए रखी जा सकती है।
प्रसाद और भोग बनाने को लेकर क्या मान्यता है?
कुछ पारंपरिक मान्यताओं में मासिक धर्म के दौरान पूजा के लिए भोग या प्रसाद तैयार करने से परहेज किया जाता है। ऐसी स्थिति में परिवार का कोई अन्य सदस्य भगवान कृष्ण के लिए माखन-मिश्री, पंजीरी, फल या अन्य प्रसाद तैयार कर सकता है। हालांकि, यह नियम सभी परिवारों या संप्रदायों में समान नहीं है। इसलिए इस मामले में अपने घर की परंपरा और व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है।
पीरियड्स खत्म होने के बाद क्या करें?
मासिक धर्म समाप्त होने के बाद सामान्य धार्मिक दिनचर्या में लौटने को लेकर भी अलग-अलग पारिवारिक परंपराएं हैं। जिन घरों में स्नान के बाद पूजा या रसोई में प्रवेश करने की परंपरा है, वहां संबंधित रीति का पालन किया जाता है। यदि आपके परिवार में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करने या अन्य शुद्धिकरण की परंपरा है, तो उसे अपनी मान्यता के अनुसार अपनाया जा सकता है। इसके बाद पूजा स्थान की सफाई करके सामान्य रूप से भगवान कृष्ण की पूजा और भोग की व्यवस्था की जा सकती है।
भक्ति के लिए सबसे जरूरी है श्रद्धा
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और श्रद्धा का पर्व है। पीरियड्स के दौरान पूजा-पद्धति को लेकर अलग-अलग धार्मिक और पारिवारिक मान्यताएं हो सकती हैं। इसलिए किसी महिला को इस प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया के कारण अपराधबोध या मानसिक दबाव महसूस करने की जरूरत नहीं है। अगर आपकी पारिवारिक परंपरा प्रत्यक्ष पूजा से परहेज करने की है, तो मानसिक पूजा, मंत्र जाप, कथा श्रवण और भजन के जरिए कृष्ण का स्मरण किया जा सकता है। वहीं व्रत के मामले में भी अपनी सेहत को ध्यान में रखना जरूरी है। खासकर कमजोरी या अस्वस्थता की स्थिति में उपवास को लेकर कठोरता बरतने के बजाय स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना बेहतर है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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