भारत की मेजबानी में राजधानी नई दिल्ली के भारत मंडपम में 11 से 13 सितंबर तक 18वां ब्रिक्स (BRICS) लीडर्स समिट आयोजित होने जा रहा है। इस भव्य और हाई-प्रोफाइल अंतरराष्ट्रीय आयोजन की सुरक्षा व ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 11 सितंबर को नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के कार्यालयों में अवकाश घोषित किया है। इसके बाद 12 और 13 सितंबर को सप्ताहांत होने के कारण दफ्तर बंद रहेंगे।
विदेशों से पहुंचेंगे दर्जनों देशों के शीर्ष नेता और प्रतिनिधि इस समिट में ब्रिक्स सदस्य देशों- भारत, ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के शीर्ष नेता शामिल होंगे। इनके अलावा बेलारूस, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम समेत 10 सहयोगी देशों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी नई दिल्ली पहुंचेंगे।
विदेशी मेहमानों के ठहराव के लिए ताज मानसिंह, मौर्य शेरेटन, ली मेरिडियन, अशोक, लीला और शांगरी-ला जैसे प्रमुख होटलों में विशेष इंतजाम किए गए हैं।
'मानवता सर्वोपरि' और नवाचार पर केंद्रित होगी समिट की थीम इस वर्ष भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का मुख्य विषय 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण' रखा गया है। यह थीम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मानव-केंद्रित दृष्टिकोण और 'मानवता सर्वोपरि' की भावना को दर्शाती है।
समिट के दौरान ब्रिक्स बिजनेस फोरम और लीडर्स समिट में आपसी सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक व क्षेत्रीय शांति और आर्थिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, ट्रैफिक एडवाइजरी जारी इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और वीवीआईपी की आवाजाही को देखते हुए दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने कड़े सुरक्षा घेरे की व्यवस्था की है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने आम जनता की सहूलियत और आवाजाही के सुचारू संचालन के लिए पहले से ही एडवाइजरी जारी कर दी है, ताकि आम यात्रियों को असुविधा का सामना न करना पड़े।
भाद्रपक्ष कृष्ण अष्टमी का पावन पर्व सम्पूर्ण भारतवर्ष में भारतीय जनमानस के नायक, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है। जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन में श्रीकृष्ण के विराट व्यक्तित्व और उनके लोककल्याणकारी संदेशों का स्मरण कराने वाला पर्व है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भाद्रपक्ष कृष्ण अष्टमी की अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के संयोग में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था। अत्याचारी कंस के आतंक से त्रस्त मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्म अन्याय और अधर्म के विरुद्ध धर्म, सत्य और न्याय की विजय की आशा का प्रतीक बना। पौराणिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के पूर्णावतार माने जाते हैं और उनके व्यक्तित्व में बाल-सुलभ चंचलता, अद्भुत करुणा, अनुपम प्रेम, असाधारण पराक्रम, दूरदर्शी कूटनीति तथा गहन आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने भगवद्गीता के माध्यम से कर्म, धर्म और कर्तव्य का ऐसा कालजयी संदेश दिया, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है। इस वर्ष 4 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण की 5253वीं जन्माष्टमी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। मंदिरों में विशेष सजावट, झांकियों, भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि में भगवान के जन्मोत्सव के साथ यह पर्व भारतीय सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
जन्माष्टमी के दिन देशभर में मंदिरों को सजाया जाता है, लोग रात्रि के 12 बजे तक व्रत रखते हैं और रात्रि 12 बजे शंख और घंटों की ध्वनि के जरिये भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खबर चारों दिशाओं में गूंज उठती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्याकाल में अनेकों लीलाएं की, जन्माष्टमी के अवसर पर ऐसी ही अनेक लीलाओं का मंचन किया जाता है। सही मायनों में श्रीकृष्ण हमारे इतिहास के अभिन्न अंग हैं, जिनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व जितना मोहक था, उतना ही रहस्यमयी भी और उतनी ही अनोखी थी उनकी लीलाएं। बाल्यावस्था से लेकर जीवनपर्यन्त लीलाएं करते रहे श्रीकृष्ण में कभी भगवान के दर्शन होते हैं तो कभी वे एक साधारण मानव सरीखे प्रतीत होते हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि मानव के रूप में भी श्रीकृष्ण उतना ही आकर्षित करते हैं, जितना कि भगवान के रूप में। उनका एक-एक कार्य मन में गहरा स्थान बना जाता है। उनके आदर्श, उनके जीवन की विद्वत्ता, वीरता, कूटनीति, योगी सदृश उज्जवल, निर्मल एवं प्रेरणादायक पक्ष, सब हमारे लिए अनुकरणीय हैं। श्रीकृष्ण को प्रेम एवं मित्रता के अनुपम प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। बचपन के निर्धन मित्र सुदामा को उन्होंने अपने राज्य में जो मान-सम्मान दिया, वह मित्रता का अनुकरणीय उदाकरण बना।
श्रीकृष्ण की लीलाओं को समझना जहां पहुंचे हुए ऋषि-मुनियों और बड़े-बड़े विद्वानों के बूते से भी बाहर था, वहीं अनपढ़, गंवार माने जाते रहे निरक्षर और भोले-भाले ग्वाले और गोपियां उनका सानिध्य पाते हुए उनकी दिव्यता का सुख पाते रहे। उन्हें कन्हैया कहें या कृष्ण, पीताम्बर कहें या वासुदेव या फिर देवकीनंदन अथवा यशोदानंदन, वास्तव में श्रीकृष्ण का भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वे महाभारत काल के ऐसे आध्यात्मिक एवं राजनीतिक दृष्टा रहे, जिन्होंने धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए दुर्जनों का संहार किया। वे शांति, प्रेम एवं करूणा के साकार रूप थे। महाभारत युद्ध के समय शांति के सभी प्रयास असफल होने पर उन्होंने संशयग्रस्त धनुर्धारी अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देकर कर्त्तव्य मार्ग पर अग्रसर किया और अन्याय की सत्ता को उखाड़ने के लिए अपने ही कौरव भाईयों के साथ युद्ध करते हुए उन्हें अपने कर्मों का पालन करने के लिए गीता का उपदेश दिया। युद्ध के समय वे हर पल धर्म की रक्षा करने के लिए अधर्म करने वालों के खिलाफ खड़े नजर आए, इसीलिए उन्हें अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। गीता में उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण ने कहा थाः-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।
अर्थात् हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात् साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं।
बाल्याकाल से लेकर बड़े होने तक श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएं विख्यात हैं। श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम का घमंड तोड़ने के लिए हनुमान जी का आव्हान किया था, जिसके बाद हनुमान ने बलराम की वाटिका में जाकर बलराम से युद्ध किया और उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था। श्रीकृष्ण ने नररकासुर नामक असुर के बंदीगृह से 16100 बंदी महिलाओं को मुक्त कराया था, जिन्हें समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिए जाने पर उन महिलाओं ने श्रीकृष्ण से अपनी रक्षा की गुहार लगाई और तब श्रीकृष्ण ने उन सभी महिलाओं को अपनी रानी होने का दर्जा देकर उन्हें सम्मान दिया था। अपने एक उपदेश में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा था:-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
अर्थात् साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूं।
श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना दिव्य था, इसकी अनुभूति इसी से हो जाती है कि एक ओर जहां अपने स्तनों पर विष लेप कर मां का रूप धारण कर दूध पिलाने आई राक्षसी पूतना का दूध पीकर श्रीकृष्ण उसे मां का सम्मान देते हैं तो दूसरी ओर उसकी दुष्टता के लिए उसका वध भी करते हैं। श्रीकृष्ण ने लंबे समय तक द्वारका पर शासन किया, इसीलिए उन्हें द्वारकाधीश नाम से भी जाना जाता है। 36 वर्षों तक द्वारका पर शासन करने के बाद वे परम धाम को प्राप्त हुए थे। पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सत्य-असत्य से परे पूर्ण पुरूष की अवधारणा को साकार करते श्रीकृष्ण भारतीय परम्परा के ऐसे प्रतीक हैं, जो जीवन का प्रतिबिम्ब हैं और सम्पूर्ण जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनका चित्र जनमानस के हृदय पटल पर एक कुशल नेतृत्वकर्ता, योद्धा, गृहस्थी, सारथी, योगीराज, देवता इत्यादि विविध रूपों में अंकित है। श्रीकृष्ण बंधन भी हैं और मुक्ति भी, एक ओर जहां वे अपने भक्तों को अपने आकर्षण में बांधते हैं तो उन्हीं भक्तों को मोह-माया के बंधन से मुक्त भी करते हैं।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
Harmanpreet Kaur Captaincy Records: भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर ने टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में इतिहास रच दिया. वह मेंस और वुमेंस दोनों को मिलाकर 150 टी20 इंटरनेशनल मैचों में कप्तानी करने वाली दुनिया की पहली खिलाड़ी बन गई हैं. महिला एशिया कप 2026 में पाकिस्तान के खिलाफ उतरते ही उन्होंने यह मुकाम हासिल किया. इस लिस्ट में उनके बाद श्रीलंका की चमारी अथापथु और रवांडा की मैरी बिमेनिमाना का नाम आता है. Sat, 5 Sep 2026 20:48:04 +0530