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Uttrakhand Weather Update: उत्तराखंड में बारिश बनी आफत, कई डैम और जलाशयों में बढ़ा जलस्तर

Uttrakhand Weather Update: उत्तराखंड में लगातार हो रही बारिश ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी है. भारी बारिश के चलते कई इलाकों में नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ गया है, वहीं कई डैम और जलाशयों में भी पानी तेजी से बढ़ रहा है. इसके चलते बाढ़ का खतरा बढ़ गया है और प्रशासन भी हालात पर नजर बनाए हुए है. कई जगहों पर लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है. बारिश का दौर जारी रहने से आने वाले दिनों में परेशानी और बढ़ने की आशंका है. अधिक जानकारी के लिए देखें पूरा वीडियो.

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Explainer: DM की सैलरी से कटेगा 5 लाख! क्यों अफसरों से वसूली कर रहा कोर्ट, जानें नियम

Noida DM Salary: पिछले 10 सालों में कई ऐसे मौके आए जब किसी न किसी वजह से देश की अदालतों ने अफसरों को अपनी जेब से जुर्माना भरने का निर्देश दिया. ताजा मामला नोएडा का है, जहां एक स्टूडेंट को जेल भेजने वाले अफसर को अब अपनी तनख्वाह से जुर्माना भरना पड़ेगा. दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश इन दिनों सुर्खियों में है और इसकी वजह जानकर हर कोई हैरान है.

पूरा मामला क्या है?

नोएडा में मजदूरों का एक प्रदर्शन अप्रैल 2026 में हिंसक हो गया था. पत्थरबाजी और गाड़ियों में आगजनी की घटनाएं सामने आईं. इस मामले में पुलिस ने सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया. इस दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में ग्रेजुएट 25 साल की सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को भी अरेस्ट किया गया. आरोप था कि उन्होंने मजदूरों को भड़काकर हिंसा कराई. आकृति पर NSA लगाया गया. 

आकृति पर NSA क्यों लगाई गई?

गिरफ्तारी के करीब एक महीने बाद 13 मई को यूपी पुलिस ने आकृति और एक पत्रकार सत्यम वर्मा पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया. बता दें यह कानून बिना ट्रायल के किसी को एक साल तक हिरासत में रखने की छूट देता है. पुलिस का दावा था कि उनके पास "मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो सबूत" मौजूद हैं. आकृति के घर से मिली एक किताब को भी उनकी सोच से जोड़कर पेश किया गया.

पांच महीने जेल में रहने के बाद क्या मोड़ आया?

आकृति करीब पांच महीने से जेल में थीं. सुप्रीम कोर्ट ने सीधे राहत न देकर उन्हें हाईकोर्ट जाने को कहा था. इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दाखिल की. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच के सामने राज्य सरकार अपने दावों को साबित नहीं कर पाई. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बार-बार पूछा कि आकृति को हिंसा भड़काने से जोड़ने वाला ठोस सबूत कहां है.

कोर्ट ने राज्य सरकार की कहानी को झूठा क्यों बताया?

कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में ही गड़बड़ी थी. नियम के मुताबिक पहले धारा 126 के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सीधे धारा 130 के तहत नोटिस थमा दिया गया. जज ने यह भी पूछा कि जब चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी तो अफसरों ने यह क्यों नहीं देखा कि गवाहों के बयान में आकृति का नाम कहीं आता भी है या नहीं. राज्य सरकार इसका सही जवाब नहीं दे सकी. बेंच ने साफ कहा कि पूरा मामला मनगढ़ंत कहानी पर टिका है. इसी आधार पर बुधवार को NSA हिरासत रद्द कर दी गई. यहां बता दें कि आकृति अभी भी जेल से बाहर नहीं आ पाई हैं, क्योंकि उन पर 11 अलग-अलग FIR दर्ज हैं और अभी तक सिर्फ चार मामलों में जमानत मिली है.

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DM की सैलरी से पैसा क्यों कटेगा?

कोर्ट ने सिर्फ रिहाई का आदेश देकर बात खत्म नहीं की. बेंच ने आकृति को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी सुनाया और यह रकम सीधे गौतम बुद्ध नगर की डीएम की तनख्वाह से वसूलने को कहा है. कोर्ट का तर्क सीधा था जिस अफसर के दस्तखत से गलत हिरासत का आदेश जारी हुआ गलती की जिम्मेदारी भी उसी की बनती है. सरकारी खजाने से भरपाई करने पर अफसरों की जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है, इसलिए निजी जेब से भरपाई का रास्ता चुना गया.

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यह कोई अकेला मामला नहीं है. बीते एक दशक में कई अदालतों ने अफसरों को निजी तौर पर सजा या जुर्माना भुगतने के आदेश दिए हैं.

गुजरात हाईकोर्ट, वडोदरा जेल मामला: एक कैदी को सजा पूरी होने के बाद भी दो महीने से ज्यादा जेल में रखा गया. कोर्ट ने जेल सुपरिटेंडेंट को अपनी जेब से 50 हजार रुपये मुआवजा भरने का आदेश दिया.

मद्रास हाईकोर्ट, IAS अफसर का मामला: कोर्ट के पुराने आदेश को न मानने पर एक IAS अफसर को एक महीने जेल की सजा सुनाई गई. साथ ही 25 हजार रुपये का मुआवजा उसकी निजी सैलरी से काटने को कहा गया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट, बंदी प्रत्यक्षीकरण गाइडलाइन: इसी साल कोर्ट ने आदेश दिया कि 24 घंटे से ज्यादा गैरकानूनी हिरासत पर हर दिन के हिसाब से 25 हजार रुपये मुआवजा मिलेगा और यह रकम जिम्मेदार मजिस्ट्रेट या पुलिस अफसर की सैलरी से वसूली जाएगी.

केरल हाईकोर्ट, NRI गलत गिरफ्तारी मामला: चेन स्नैचिंग के झूठे केस में 54 दिन जेल में रहे एक प्रवासी भारतीय को कोर्ट ने 10 लाख रुपये मुआवजा दिलवाया साथ ही परिवार को अतिरिक्त राशि भी दी गई.

क्या हाईकोर्ट ऐसा आदेश देने का अधिकार रखता है?

हां, और यह पहली बार नहीं है. संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को यह ताकत देता है कि वह मौलिक अधिकारों के हनन पर सीधे मुआवजे का आदेश दे सके. गलत हिरासत जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन मानी जाती है. पिछले कुछ दशकों में सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाईकोर्ट कई बार यह साफ कर चुके हैं कि सरकारी अफसर की लापरवाही या मनमानी साबित होने पर अदालत उससे निजी तौर पर वसूली का आदेश दे सकती है. इसे कानूनी भाषा में "पब्लिक लॉ कंपनसेशन" कहा जाता है.

आगे क्या होगा, क्या कहता है नियम?

फिलहाल पूरा विस्तृत आदेश आना बाकी है. आकृति की रिहाई की राह अभी और मुकदमों से होकर गुजरेगी लेकिन इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सुरक्षा कानूनों का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए हो रहा है.

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