जब गोलियों से लाल हो गई थी मसूरी की वादियां, राज्य आंदोलन के अमर शहीदों को देहरादून में दी गई श्रद्धांजलि
Uttarakhand News: उत्तराखंड राज्य निर्माण की नींव जिन वीरों के असीम त्याग और लहू से सींची गई थी, उनकी यादें आज भी हर पहाड़वासी के दिल में पूरी शिद्दत से जिंदा हैं. राजधानी देहरादून स्थित शहीद स्थल पर 2 सितंबर को एक बार फिर वही भावुक और गौरवशाली माहौल देखने को मिला. मसूरी गोलीकांड की बरसी के अवसर पर राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री खजान दास ने अमर शहीदों के स्मारक पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए. इस दौरान शहीद स्थल पर उपस्थित तमाम लोगों की आंखें नम थीं और वातावरण शहीदों के जयकारों से गूंज रहा था. हर किसी के चेहरे पर अपने पुरखों के उस संघर्ष के प्रति गहरा सम्मान झलक रहा था, जिसने अलग पहाड़ी राज्य के सपने को हकीकत में बदला.
बलिदानियों के त्याग से बना है हमारा राज्य
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री खजान दास ने कहा कि आज का दिन केवल औपचारिकता निभाने या कोई रस्म पूरी करने का दिन नहीं है. यह दिन हम सभी प्रदेशवासियों को यह याद दिलाता है कि आज हम जिस खुले और स्वतंत्र उत्तराखंड में गरिमा के साथ जीवन जी रहे हैं, वह इन्हीं वीर आंदोलनकारियों की शहादत का परिणाम है. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों की आहुति न दी होती, तो अलग राज्य का सपना कभी पूरा नहीं हो पाता. इस मिट्टी का एक-एक कण उन अमर सेनानियों के त्याग का कर्जदार है, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते.
इतिहास के पन्नों में दर्ज काला अध्याय
भाषण के दौरान मंत्री ने 2 सितंबर 1994 के उस खौफनाक मंजर को भी याद किया, जब शांत वादियों में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी थी. उन्होंने कहा कि एक दिन पहले यानी 1 सितंबर को खटीमा में आंदोलनकारियों पर बर्बर कार्रवाई हुई थी. इसके विरोध में अगले दिन मसूरी में लोग पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे. उस शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर जिस बेरहमी से तत्कालीन सत्ता के इशारे पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, वह इतिहास का एक काला अध्याय बनकर रह गया. उस गोलीकांड में बेलमती चौहान और हंसा धनाई जैसी वीरांगनाओं के साथ बलबीर सिंह नेगी, धनपत सिंह, मदन मोहन ममगाईं और राय सिंह बंगारी ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. वहीं आंदोलनकारियों की जान बचाने की कोशिश में पुलिस उपाधीक्षक उमाकांत त्रिपाठी भी वीरगति को प्राप्त हुए थे.
सपनों का उत्तराखंड बनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि
कैबिनेट मंत्री ने जनता और युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी दी जा सकती है, जब हम उनके सपनों के अनुरूप राज्य का निर्माण करें. हमारे पुरखों ने जिस उत्तराखंड की कल्पना की थी, वह खुशहाल, आत्मनिर्भर और अपनी समृद्ध संस्कृति से जुड़ा हुआ राज्य था. उन्होंने कहा कि आज हम सभी को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हमेशा आगे रहेंगे. विकास की दौड़ में राज्य के मूल स्वरूप और पर्यावरण की रक्षा करना हमारा पहला दायित्व होना चाहिए. जब तक हर गांव तक बुनियादी सुविधाएं और खुशहाली नहीं पहुंचेगी, तब तक शहीदों का सपना अधूरा रहेगा.
आंदोलन के मार्गदर्शकों का हुआ स्मरण
इस पावन अवसर पर कैबिनेट मंत्री खजान दास ने उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ आंदोलनकारी और पूर्व विधायक स्वर्गीय रणजीत सिंह वर्मा को भी याद किया. उन्होंने स्वर्गीय वर्मा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके जैसे समर्पित नेताओं ने आंदोलन को सही दिशा दी और जन-जन को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया. उनके विचार और संघर्ष आज भी प्रदेश के नीति निर्धारकों और समाजसेवियों के लिए पथ प्रदर्शक का काम करते हैं.
गणमान्य नागरिकों ने भी टेका मत्था
शहीद स्थल पर आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियों, राज्य आंदोलनकारियों और स्थानीय नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया. सभी ने बारी-बारी से शहीद वेदी पर पुष्प चढ़ाकर वीर सपूतों को नमन किया. इस मौके पर गढ़वाल मंडल विकास निगम के निदेशक विशाल गुप्ता, स्थानीय पार्षद रोहन चंदेल, मंडल महामंत्री राहुल पंवार, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल शर्मा, सोनी रावत, सुखबीर सिंह, अशोक राठौर और सत्यम शर्मा समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे. उपस्थित जनसमूह ने एक स्वर में शहीदों के सपनों को साकार करने और राज्य को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का वचन दोहराया.
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महाराष्ट्र: 200 सालों में पहली बार जन्मी बेटी, परिवार ने रथ में बिठाकर किया स्वागत
बीड (महाराष्ट्र), 2 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के बीड जिले में दहीफले परिवार ने एक बच्ची के जन्म का जश्न बड़े धूमधाम से मनाया। चार पीढ़ियों में पहली बार बेटी का जन्म होने पर परिवार ने रथ जुलूस निकालकर बच्ची का जोरदार स्वागत किया।
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद बच्ची (जिसका नाम गार्गी रखा गया है) और उसकी मां को रथ में बिठाकर घर लाया गया। इस दौरान ढोल-नगाड़े और नाच-गाने का माहौल था।
परिवार का कहना है कि पिछले दो सौ सालों में उनके यहां कोई बेटी पैदा नहीं हुई थी।
परिवार में बेटी के जन्म के जश्न का हिस्सा बनकर खुद को खुशकिस्मत मानते हुए बच्ची के दादा ने कहा: परिवार में बेटी का होना बहुत सौभाग्य की बात है। इतने सालों से हमें बेटी न होने का अफसोस था, और आज वह इच्छा पूरी हो गई है।
गार्गी की दादी सुरेखा दहीफले ने बच्ची को धन की हिंदू देवी लक्ष्मी देवी कहा।
उन्होंने आगे कहा कि परिवार ने अस्पताल में ही तय कर लिया था कि वे बच्ची का भव्य स्वागत करेंगे।
अपनी खुशी जाहिर करते हुए बच्ची के पिता ने कहा: बेटियां आमतौर पर अपने पिता के ज्यादा करीब होती हैं, हम उसे फूल की तरह पालेंगे।
उन्होंने कहा कि हालांकि लोग आम तौर पर बेटा चाहते हैं, लेकिन बेटी का होना एक अलग ही एहसास है।
इससे पहले, राजस्थान के पिपलांत्री गांव में बेटी के जन्म का जश्न मनाते हुए देखा गया था, जहां हर बेटी के जन्म पर 111 पौधे लगाए जाते हैं।
यह परंपरा गांव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने अपनी बेटी की मौत के बाद शुरू की थी।
इस परंपरा ने समाज में बेटे की चाहत रखने की पुरानी सोच को बदलने का काम किया, खासकर राजस्थान में, जहां इतिहास में बच्चों के लिंगानुपात में असंतुलन और कन्या भ्रूण हत्या के मामले ज्यादा रहे हैं।
--आईएएनएस
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