Uncovered With Manoj Gairola: अमेरिकी कमांडर्स ने खड़े कर दिए हाथ, क्या ईरान युद्ध हारने वाले हैं डोनाल्ड ट्रंप?
Uncovered With Manoj Gairola: आज अमेरिका के army secretary Dan Driscoll ने इस्तीफा दे दिया है. ये इस्तीफ़ा उस समय आया है जबकि अमेरिका और ईरान ने एक दूसरे के ऊपर फिर हमले शुरू कर दिये हैं. और ये ट्रम्प के लिये एक बहुत बड़ा झटका है. लेकिन सबसे बड़ी खबर ये है कि अमेरिकी कमांडर्स ने साफ़ कर दिया है कि वो अब आगे लड़ना नहीं चाहते. जो कारण उन्होंने बताया है उसने ट्रम्प की नींद उड़ा दी है. इसी हताशा को दूर करने के लिए ट्रम्प ने ईरान के लारक द्वीप पर मिसाइल्स से हमला किया था. ईरान को भी अमेरिकी फ़ौज की कमजोरी मालूम है. उसने भी जॉर्डन में अमेरिका के दो airbases पर ज़ोरदार हमला करके जवाब दिया. साथ ही UAE में अमेरिका के एक एयरबेस पर ड्रोन से हमला किया.
लड़ाई को जारी नहीं रख सकते- अमेरिकी कमांडर
अमेरिका के एयरफोर्स, नेवी और आर्मी प्रमुखों ने अपने रक्षा मंत्री हेगसेथ को बता दिया है कि इस जंग को जारी रखने के लिए ना तो उनके पास हथियार हैं. और ना ही उनके सैनिकों में इच्छा शक्ति है. अमेरिकी अख़बार ने पेंटागन के एक इंटरनल डॉक्यूमेंट का reference देते हुए लिखा है कि इन चीफ्स के साथ-साथ यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के टॉप मोस्ट कमांडर्स ने भी कहा है कि वो लड़ाई को जारी नहीं रख सकते. इस internal document का नाम है सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस ऑर्डर बुक और ये क्लासिफाइड डॉक्यूटमें है.
इसमें लिखा है कि जब रक्षा मंत्री हेगसेथ ने सेना को सितंबर तक मि़डिल ईस्ट में तैनात रहने का आदेश दिया, तो मिलिट्री कमांडर्स ने इसका विरोध किया. और विरोध करते हुए उन्होंने नॉन-कॉन्कर शब्द का इस्तेमाल किया है. इसका मतलब है ये है कि वो इस रक्षा मंत्री के इस आदेश के ख़िलाफ़ हैं. लेकिन फिर भी वो इस आदेश को मानेंगे. मतलब कि न चाहते हुए भी वो इस आदेश को मानेंगे क्यों कि वो मिलिट्री का हिस्सा हैं.
अब सवाल ये है कि टॉप कमांडर्स ईरान के खिलाफ युद्ध जारी क्यों नहीं रखना चाहते? इसका सबसे बड़ा कारण है कि जब युध शुरू हुआ तो अमेरिका के जो शिप्स, एयरक्राफ्ट्स और इक्विपमेंट्स और यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका में तैनात थे, उन्हें ईरान जंग के लिए शिफ्ट किया गया है. अब हालत ये है कि अगर इन जगहों पर जंग हो जाये तो अमेरिकी सेना के पास उसके लिए हथियार भी नहीं हैं. हालत ये है कि अमेरिका को अपनी रक्षा करना भी मुश्किल हो सकता है.
दरअसल युध शुरू होने के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद कर दिया. इसे खुलवाना ट्रम्प के लिए इज्जत का सवाल बन गया है. इसके लिए उसने ईरान के ऊपर आर्थिक पाबन्दियाँ भी लगा दी है और ईरान के पोर्ट्स को ब्लॉक किया हुआ है. इसलिए अमेरिका की फ़ौज मिडिल ईस्ट में तैनात है. ट्रम्प का कहना है कि आने वाले वक्त अमेरिका ईरान पर अटैक भी कर सकता है. इसलिए 50,000 अमेरिकी फ़ौज अभी भी खाड़ी में तैनात है.
अमेरिकी नेवी के हालात मुश्किल
सबसे पहले बात करते हैं अमेरिकी नेवी की जिसका इस युध में सबसे बड़ा रोल है. अमेरिका के चीफ ऑफ नेवल ऑपरेशंस एडमिरल डैरिल कॉडल ने कहा कि नेवी ने हर जगह से शिप्स की तैनाती इस जंग के लिए कर दी है. और अब हालत ये है कि अब उसके पास ऐसे सिर्फ़ २५% डिस्ट्रॉयर फ्लीट हैं, जिन्हें वो इस युध के लिये तैनात कर सकता है. हालत ये है कि अगर दुनिया में कहीं और कोई युद्ध छिड़ता है तो वहां अमेरिकन नेवी को तैनात करना मुश्किल हो जाएगा. वहीं आर्मी और एयरफोर्स के अधिकारियों ने भी ये साफ किया है कि लंबे वक्त तक ईरान युद्ध को जारी रखना बेहद रिस्की है.
इसके पीछे एक बड़ा कारण ये भी है कि पिछले एक महीने में ईरान ने अपनी मिलिट्री ताक़त और ज़्यादा बड़ा ली है. ईरान की मिसाइल्स और ड्रोन्स के हमलों को रोकने के लिए अब अमेरिका के पास इंटरसेप्टर मिसाइल्स कम पड़ गई हैं. जंग से पहले अमेरिका के पास 2330 patriot missiles थीं. उनमे से 1430 से ज्यादा इस्तेमाल हो चुकी हैं. यानी 60% से ज़्यादा. इसी तरह THAAD सिस्टम की 360 इंटरसेप्टर मिसाइल में से करीब 290 मिसाइल्स ख़त्म हो चुकी हैं. इससे पता चलता है कि अमेरिका के पास ईरान के हमले से बचने की ताक़त कितनी कम हो गई है.
नाटो देशों पर हमला कर सकता है रूस
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने जेलेंस्की को खूब पैट्रियोट मिसाइल दी थीं. खाड़ी के युद्ध के बाद इनकी इतनी कमी हो गई है कि अब अमेरिका के पास यूक्रेन को देने के लिए मिसाइलें नहीं बची हैं. वहीं दूसरी तरफ रूस इसका फायदा उठा कर यूक्रेन पर जमकर मिसाइलें बरसा रहा हैं. अब तो बात यहां तक आ पहुंची है कि रूस यूरोप में नाटो के इस्टर्न फ्रंट के लातविया, लिथुआनिया या एस्टोनिया जैसे किसी देश पर हमला कर सकता है. अगर ऐसा हुई तो ये नाटो और रूस के युद्ध की शुरूआत होगी और रूसी मिसाइलों से बचने के लिए अमेरिका और बाकी नाटो देशों के पास इंटरसेप्टर मिसाइल्स नहीं होंगी. यही बात अमेरिकी कमांडर्स को परेशान कर रही हैं. इसी तरह एशिया-पैसिफिक में चीन के खिलाफ लड़ने के लिए अमेरिका के पास मिसाइलें ही नहीं हैं.
अमेरिका की इस कमजोरी से ईरान अच्छी तरह वाकिफ है. इसीलिए उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना कंट्रोल बरकरार रखा हुआ है. युद्ध से पहले ये एक फ्री और आजाद समुद्री रास्ता था. लेकिन अब ईरान इस रास्ते से टोल वसूलने की तैयारी में है. और ये अमेरिका की सबसे बड़ी हार है. ट्रंप चाहते हैं कि किसी भी तरह होर्मुज का रास्ता खुल जाए और वो इसे अपनी जीत बताकर जंग को खत्म कर दें. लेकिन ईरान ऐसा होने नहीं दे रहा है. अब हालात ये है कि जहां सीजफायर के दौरान ईरान ने अपनी मिल्ट्री पावर को फिर से बढ़ा लिया, वहीं अमेरिकी कमांडर्स ने साफ कर दिया है कि ना तो उनके पास हथियार है और ना ही उनके सैनिकों में इच्छाशक्ति बची है.
स्वाइन फ्लू को लेकर घबराने की जरूरत नहीं, ये आयुर्वेदिक सावधानियां बरतें: डायरेक्टर प्रदीप कुमार प्रजापति
नई दिल्ली, 2 सितंबर (आईएएनएस)। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए), दिल्ली के डायरेक्टर प्रदीप कुमार प्रजापति ने बदलते मौसम के साथ बढ़ रहे स्वाइन फ्लू के मामले को लेकर आयुर्वेदिक सावधानियां बताईं। उन्होंने बुधवार को समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि डॉक्टर की सलाह के बाद ही गर्म पानी और सुदर्शन घनवटी एवं दशमूलारिष्ट जैसी दवाएं लें।
उन्होंने कहा कि स्वाइन फ्लू के मामले बदलते मौसम की वजह से बढ़ रहे हैं। बारिश के मौसम में मच्छरों का प्रकोप बढ़ जाता है। बैक्टीरिया और वायरस भी पनपता है। हमारे खान-पान में भी गड़बड़ी होती है और वर्षा ऋतु में हमारी इम्यूनिटी भी सबसे कम होती है, इसलिए इस मौसम में बैक्टीरिया का प्रभाव हमारे शरीर पर ज्यादा होता है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष जो स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ रहे हैं, इससे बहुत लोग परेशान हो रहे हैं। इसी को लेकर हमने 10 केस पर स्टडी की है। उन्होंने कहा कि मैं और मेरे परिवारवालों को भी स्वाइन फ्लू हुआ। इसके अलावा हमारे जानने वाले भी इस वायरस से संक्रमित हुए।
स्वाइन फ्लू के केसेज को स्टडी करने के दौरान हमने देखा कि इसमें 4 दिन बुखार नहीं उतरता। 4 दिनों तक लोगों को 100 डिग्री फारेनहाइट के ऊपर बुखार रहता है। हालांकि, इसको लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। इस दौरान हमें गरम पानी पीना है। डॉक्टरों की सलाह के बाद ही दवाइयां लेनी हैं।
डायरेक्टर प्रदीप कुमार प्रजापति ने बताया कि स्वाइन फ्लू को लेकर सुदर्शन घनवटी, दशमूलारिष्ट और अमृतारिष्ट के परिमाण बहुत अच्छे सामने आ रहे हैं। स्वाइन फ्लू होने पर लोगों को भूख-प्यास कम लगती है और सिर में दर्द रहता है। ऐसी स्थिति में हमें काम से थोड़ा आराम लेने की जरूरत है। गर्म-गर्म हल्का-फुल्का खाना खाएं और खुद की साफ-सफाई पर खास ध्यान दें।
उन्होंने कहा कि 4 दिन के बाद धीरे-धीरे बुखार खुद कम होता जाएगा और आपका स्वास्थ्य बेहतर हो जाएगा। डायरेक्टर प्रदीप कुमार प्रजापति ने साफ किया कि यह कोरोना वायरस जैसा नहीं है, इसलिए बहुत ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। अगर आपकी इम्यूनिटी अच्छी है तो आप 3 दिन में भी इस वायरस से रिकवर कर सकते हैं। वहीं, अगर आपकी इम्यूनिटी अच्छी नहीं है, तो रिकवर करने में आपको 5 दिन या उससे ज्यादा लग सकता है।
बुखार उतरने के बाद की कंप्लीकेशन की बात करें तो उसमें सिर दर्द, सर्दी और जुकाम जैसी समस्या होती है। इसके लिए हमें ध्यान देने की जरूरत है। खान-पान पर ध्यान देने के साथ अच्छी नींद, साफ-सफाई और स्टीम लेने की जरूरत है।
--आईएएनएस
डीके/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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