भारत के ई-मोबिलिटी परिवर्तन को सिर्फ ईवी बिक्री से न आंके, तकनीक और लोकल वैल्यू पर ध्यान दें : कुमारस्वामी
नई दिल्ली, 2 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने बुधवार को ऑटोमोटिव और ऑटो कंपोनेंट उद्योग से प्रौद्योगिकी, डिजाइन और घरेलू मूल्यवर्धन में निवेश बढ़ाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारत के इलेक्ट्रिक मोबिलिटी परिवर्तन का आकलन केवल बेचे गए इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए।
यहां ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एसीएमए) के 66 वें वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री ने कहा कि भारत के गतिशीलता परिवर्तन के अगले चरण में पैमाने का निर्माण, स्थानीयकरण को गहरा करने, नवाचार में तेजी लाने और देश को उन्नत और हरित गतिशीलता प्रौद्योगिकियों के लिए विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
एचडी कुमारस्वामी ने कहा, हमारी सफलता को केवल बेचे गए इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। इसे इस बात से भी मापा जाना चाहिए कि भारत में कितनी तकनीक विकसित की गई है, घरेलू स्तर पर कितना मूल्यवर्धन किया गया है, नई आपूर्ति श्रृंखलाओं में कितने लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भाग ले रहे हैं और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजारों में कितनी प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
उन्होंने ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट निर्माताओं से स्वच्छ, अधिक कुशल और उभरती प्रौद्योगिकियों में अधिक साहसपूर्वक निवेश करने का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य न केवल भारत में उत्पादों का निर्माण करना है बल्कि उन्हें वैश्विक बाजारों के लिए विकसित करना भी है।
उन्होंने कहा, भारत को वैश्विक गतिशीलता संक्रमण में केवल भाग ही नहीं लेना चाहिए। भारत को इसका नेतृत्व करने में मदद करनी चाहिए।
कुमारस्वामी ने कहा कि सरकारी योजनाएं घरेलू मूल्यवर्धन, उन्नत प्रौद्योगिकियों और विनिर्माण में निवेश का समर्थन कर रही हैं, साथ ही स्वच्छ गतिशीलता की ओर बदलाव को सुगम बना रही हैं।
उन्होंने कहा कि ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट उद्योग के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना उत्साहजनक परिणाम दिखा रही है। उन्होंने बताया कि 30 जून, 2026 तक, योजना के तहत स्वीकृत आवेदकों ने 45,477 करोड़ रुपये के निवेश की सूचना दी थी, जिससे 67,000 से अधिक रोजगार के अवसर सृजित हुए थे।
उन्होंने कहा कि कि ऑटोमोटिव और ऑटो कंपोनेंट उद्योग भारत के औद्योगिक विकास के लिए केंद्रीय महत्व रखता है, लाखों लोगों की आजीविका का समर्थन करता है और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के एक बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है।
उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र का इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, रसायन, लॉजिस्टिक्स और सेवाओं जैसे उद्योगों पर भी गुणक प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि कि भारी उद्योग मंत्रालय योजना के कार्यान्वयन में सुधार लाने, परिचालन संबंधी मुद्दों को संबोधित करने और निवेश और नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए एसीएमए और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) सहित उद्योग निकायों के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा। ये प्रयास महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है।
--आईएएनएस
एसएके/पीएम
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
मेटाबॉलिक जोखिम बढ़ा रहे एनसीडी का खतरा, स्वस्थ जीवनशैली और समय पर जांच जरूरी
नई दिल्ली, 2 सितंबर (आईएएनएस)। आज के समय में गैर-संचारी रोग (एनसीडी) लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। इनमें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग जैसी बीमारियां शामिल हैं। इन बीमारियों का खतरा बढ़ाने वाले कई कारण हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली से जुड़े हैं। खराब खानपान, शारीरिक गतिविधि की कमी, तंबाकू और शराब का सेवन तथा बढ़ता वजन ऐसे प्रमुख जोखिम कारक हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देकर एनसीडी से बचाव किया जा सकता है।
भारत में राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग निगरानी सर्वेक्षण (एनएनएमएस) 2017-18 के जरिए वयस्क आबादी में एनसीडी से जुड़े जोखिम कारकों की राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति का आकलन किया गया। सर्वे में 18 से 69 वर्ष की उम्र के वयस्कों को शामिल किया गया था। इसके आंकड़े बताते हैं कि देश में मेटाबॉलिक जोखिम कारकों का स्तर चिंता का विषय है।
सर्वे के अनुसार, 28.5 प्रतिशत वयस्कों का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ पाया गया। वहीं 9.3 प्रतिशत लोगों में ब्लड ग्लूकोज का स्तर बढ़ा हुआ था। इसके अलावा 26.1 प्रतिशत लोग ओवरवेट जबकि 6.2 प्रतिशत मोटापे से प्रभावित पाए गए। सेंट्रल ओबेसिटी यानी पेट के आसपास अधिक चर्बी की समस्या 32.2 प्रतिशत वयस्कों में देखी गई। पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी को कई मेटाबॉलिक बीमारियों के बढ़ते खतरे से जोड़ा जाता है।
सर्वे में केवल वजन और ब्लड प्रेशर जैसे मेटाबॉलिक जोखिम ही नहीं बल्कि जीवनशैली से जुड़े दूसरे पहलुओं की भी जानकारी जुटाई गई। इसमें सामने आया कि 32.8 प्रतिशत वयस्क तंबाकू का सेवन कर रहे थे जबकि 15.9 प्रतिशत लोगों ने शराब के सेवन की जानकारी दी। इससे यह साफ होता है कि एनसीडी की रोकथाम के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है बल्कि जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी है।
शारीरिक सक्रियता की कमी भी एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आई। सर्वे में 41.3 प्रतिशत वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय पाए गए। यानी बड़ी संख्या में लोग रोजमर्रा की जिंदगी में पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। खानपान की स्थिति भी बेहतर नहीं थी। करीब 98.4 प्रतिशत वयस्क रोजाना पांच सर्विंग लगभग (400-500 ग्राम) से कम फल और सब्जियां खा रहे थे। वहीं, आबादी का औसत नमक सेवन करीब 8 ग्राम प्रतिदिन पाया गया।
सर्वे में 40 से 69 वर्ष की उम्र के वयस्कों में हृदय रोग के जोखिम का भी आकलन किया गया। करीब 12.8 प्रतिशत लोगों में अगले 10 वर्षों में हृदय रोग का जोखिम 30 प्रतिशत या उससे अधिक था या वे पहले से हृदय रोग से प्रभावित थे।
एनसीडी की रोकथाम के लिए स्वस्थ जीवनशैली और समय पर जांच बेहद जरूरी है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, तंबाकू और शराब से दूरी, वजन पर नियंत्रण और समय-समय पर ब्लड प्रेशर व ब्लड ग्लूकोज की जांच जैसी आदतें जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं।
--आईएएनएस
पीआईएम/पीएम
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