उत्तराखंड सेवा का अधिकार आयोग को मिला नया आयुक्त, दीपेन्द्र चौधरी ने ली शपथ
Uttarakhand: मुख्य सचिव श्री आनन्द बर्द्धन ने बुधवार को सचिवालय में श्री दीपेन्द्र चौधरी को उत्तराखण्ड सेवा का अधिकार आयोग में आयुक्त पद के लिए पद की शपथ दिलाई. मुख्य सचिव ने श्री दीपेन्द्र चौधरी को नवीन दायित्व के लिए शुभकामनाएं देते हुए अपेक्षा की कि वे अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा, पारदर्शिता एवं निष्पक्षता के साथ करेंगे. उन्होंने कहा कि सेवा का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य आम नागरिकों को निर्धारित समय-सीमा में सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना तथा प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना हम सभी की जिम्मेदारी है.
श्री दीपेन्द्र चौधरी ने शपथ ग्रहण के पश्चात कहा कि वे आयोग द्वारा सौंपे गए दायित्वों का पूरी निष्ठा एवं प्रतिबद्धता के साथ निर्वहन करेंगे तथा नागरिकों को समयबद्ध एवं पारदर्शी ढंग से सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य को और प्रभावी बनाने के लिए कार्य करेंगे. इस अवसर पर सचिव डॉ. पंकज कुमार पाण्डेय सहित शासन एवं प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे.
ब्याज पर उधार लिए 13 डॉलर, कई किमी पैदल चला... नेपाल बाढ़ में गुम हुए बेटे को ढूंढने वाले पिता की बेबस कहानी
Nepal floods: नेपाल में आई आपदा से कई घर उजड़ गए. 1100 से ज्यादा अभी तक शव मिल चुके हैं. तकरीबन 4 हजार लोग अभी भी गुम हैं. वैसे तो हर गुमशुदा के पीछे एक कहानी है. लेकिन एक बेहद मार्मिक कहानी सामने आ रही है. बाढ़ में बहे बेटे को ढूंढने के लिए एक पिता ने 13 डॉलर रुपये ब्याज पर उधार लिए और कई किमी तक पैदल चला.
नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं. अल जजीरा रिपोर्ट के अनुसार, इन्हीं में 19 साल का विनोद भी है. उसका पिता टालका सदा बेटे की तलाश में कई दिनों से बाढ़ प्रभावित इलाकों में भटक रहा है. बेटे को खोजने के लिए उसने करीब 13 डॉलर यानी 2 हजार नेपाली रुपये से भी कम रकम उधार ली है. 50 साल से ज्यादा उम्र के टालका सदा नेपाल के सप्तरी जिले के रहने वाले हैं. उनका बेटा विनोद करीब एक महीने पहले रसुवा जिले में एक पनबिजली परियोजना में मजदूरी करने गया था. वह वहां सीमेंट मिलाने और दूसरे छोटे-मोटे काम करता था. 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद से विनोद का कोई पता नहीं है. उसके साथ काम करने वाले चार अन्य युवक भी लापता हैं.
बेटे की तलाश में अस्पतालों के चक्कर
विनोद से सदा ने बाढ़ आने से एक दिन पहले आखिरी बार बात की थी. इसके बाद उसका फोन बंद है और परिवार से कोई संपर्क नहीं हुआ. बेटे की तलाश में सदा पहले काठमांडू पहुंचे. सदा के साथ उनका भाई भी है. दोनों ने कई अस्पतालों में जाकर लापता लोगों और मृतकों की सूची देखी. उन्होंने शवगृहों में रखे शवों की तस्वीरें भी देखीं, लेकिन विनोद का कहीं पता नहीं चला. इसके बाद दोनों भाई नुवाकोट की ओर पैदल निकल पड़े. माना जा रहा है कि विनोद जिस पनबिजली परियोजना में काम करता था, वह इसी इलाके के पास है.
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बेटे को खोजने के लिए लिया कर्ज
सदा के पास 2 हजार नेपाली रुपये से भी कम पैसे बचे हैं. यह रकम उन्होंने बेटे की तलाश में आने-जाने के लिए उधार ली थी. सदा बताते हैं कि उन्हें हर 100 रुपये के बदले 20 रुपये ब्याज देना होगा. सप्तरी से काठमांडू तक बस से आने में भी उनके काफी पैसे खर्च हो गए.
कई घंटो पैदल चले
नुवाकोट पहुंचने के दौरान दोनों भाइयों ने टूटी सड़कों पर घंटों पैदल सफर किया. रास्ते में त्रिशुली कस्बे में उन्हें एक लॉज में रात रुकने के लिए 1,500 नेपाली रुपये देने पड़े. सदा का कहना है कि उन्हें खाने के लिए भी सिर्फ थोड़े से चावल मिले, जिससे उनका पेट नहीं भरा. उन्हें डर है कि अगर एक और रात यहां रुकना पड़ा तो उनके पास वापस घर जाने तक के पैसे नहीं बचेंगे.
'हमारी कोई मदद नहीं कर रहा'
पिता सदा का आरोप है कि वह और उनका भाई सेना के राहत शिविरों और शवगृहों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कई बार वहां से वापस भेज दिया गया. सदा का परिवार मुसहर समुदाय से आता है. उनका कहना है कि गरीब होने और तराई क्षेत्र से आने की वजह से उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. सदा ने कहा कि हम गरीब हैं. हमें मधेसी और बिहारी समझकर दूर किया जा रहा है. हम अपने बेटे को खोजने के लिए हर जगह गए, लेकिन कोई हमारी मदद नहीं कर रहा. उनका कहना है कि अगर विनोद की मौत भी हो गई है तो परिवार को कम से कम उसका शव देखने का अधिकार मिलना चाहिए.
कभी उम्मीद, कभी बेबसी
सदा और उनका भाई लगातार विनोद के मोबाइल नंबर पर फोन कर रहे हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा. सदा कहते हैं कि उनकी पत्नी ने उनसे बेटे को वापस लाने के लिए कहा है. इसी उम्मीद में वह अलग-अलग पनबिजली परियोजनाओं में विनोद को खोज रहे हैं. कभी-कभी उन्हें लगता है कि उनका बेटा जवान है और मजदूर होने के कारण फुर्तीला भी है। शायद वह बाढ़ से बचकर कहीं चला गया हो. लेकिन अगले ही पल उन्हें डर सताने लगता है. सदा कहते हैं कि अगर विनोद जिंदा होता तो किसी न किसी तरह फोन जरूर करता.
इसके बावजूद उन्होंने बेटे की तलाश बंद नहीं की है. सदा और उनका भाई अब उस पनबिजली परियोजना की ओर जाने की तैयारी कर रहे हैं, जहां विनोद काम करता था. गुस्से और बेबसी में सदा कहते हैं कि अगर कोई उनकी बात नहीं सुनेगा और मदद नहीं करेगा तो वे पुलिस स्टेशन के खिलाफ भी कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं.
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