भगवान को चढ़ाए फूल मुरझाने के बाद कहां विसर्जित करने चाहिए? जानें इसका धार्मिक महत्व और सही नियम
Murjhaye phool visarjan niyam: हिंदू धर्म में भगवान को अर्पित किए गए फूलों को अत्यंत पवित्र माना जाता है, और इसी वजह से जब ये फूल मुरझा जाते हैं, तब भी इन्हें साधारण कचरे की तरह फेंकना उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि भगवान को अर्पित की गई हर वस्तु पूजनीय होती है, चाहे वह ताजा हो या मुरझाई हुई, इसी वजह से इनका निपटान भी एक निश्चित धार्मिक विधि के अनुसार करने की परंपरा चली आ रही है।
मुरझाए फूलों को क्यों माना जाता है पवित्र?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार भगवान को अर्पित किया गया कोई भी पुष्प "निर्माल्य" कहलाता है, यानी वह भगवान की कृपा और स्पर्श से युक्त हो चुकी पवित्र वस्तु मानी जाती है। मान्यता है कि इस पवित्रता के चलते इन फूलों को सामान्य कूड़े-कचरे के साथ फेंकना अनादर के समान माना जाता है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि भगवान से जुड़ी हर वस्तु का सम्मानपूर्वक निपटान करना भक्त का धार्मिक कर्तव्य माना जाता है।
मुरझाए फूलों के विसर्जन का सही तरीका
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पूजा में इस्तेमाल हुए मुरझाए फूलों को किसी पवित्र नदी, तालाब या जलाशय में प्रवाहित करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि जल में विसर्जित करने से इन फूलों की पवित्रता बनी रहती है और यह प्रकृति में स्वाभाविक रूप से समाहित हो जाते हैं। अगर नदी या जलाशय तक पहुंचना संभव न हो, तो इन्हें किसी पेड़ के नीचे या स्वच्छ मिट्टी में दबाने की भी परंपरा प्रचलित है।
फूल विसर्जित करते समय रखें इन बातों का ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मुरझाए फूलों को विसर्जित करते समय मन में भगवान का ध्यान करना और श्रद्धा भाव बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि फूलों के साथ-साथ पूजा में इस्तेमाल हुई अन्य सामग्री, जैसे बेलपत्र और तुलसी पत्र को भी उसी सम्मानजनक तरीके से विसर्जित करना चाहिए।
फूल दोबारा उगाने या खाद बनाने की भी है परंपरा
आधुनिक समय में कई श्रद्धालु पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए मुरझाए फूलों से जैविक खाद तैयार करने की भी पहल कर रहे हैं। मान्यता है कि यह तरीका भी उतना ही सम्मानजनक माना जाता है, क्योंकि इसमें फूलों को प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिलाकर पुनः उपयोगी बनाया जाता है, जिससे पवित्रता और पर्यावरण संरक्षण, दोनों का संतुलन बना रहता है।
आज भी निभाई जाती है यह पुरानी परंपरा
समय के साथ भले ही जीवनशैली और शहरीकरण के चलते नदी तक पहुंचना कई लोगों के लिए मुश्किल हो गया हो, लेकिन मुरझाए फूलों के सम्मानजनक निपटान की यह परंपरा आज भी अनेक हिंदू परिवारों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। आज भी लोग भगवान को अर्पित की गई हर वस्तु के प्रति सम्मान बनाए रखने की कोशिश करते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
Bahula Chauth 2026: भादो की चतुर्थी को क्यों कहते हैं बहुला चौथ? जानें गाय से जुड़ी पौराणिक कथा
Bahula Chauth 2026: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बहुला चतुर्थी या बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है। इस साल यह व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश के साथ बहुला गाय और उसके बछड़े की पूजा करने का विधान है। खास बात यह है कि इस व्रत का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और बहुला नाम की गाय की सत्यनिष्ठा से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा से बताया जाता है। आखिर भादो की इस चतुर्थी को बहुला चौथ क्यों कहा जाता है और इस दिन क्या किया जाता है? आइए जानते हैं।
बहुला चौथ 2026 कब है?
पंचांग के अनुसार इस साल बहुला चौथ का व्रत 31 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। चतुर्थी तिथि 31 अगस्त को सुबह 8:50 बजे शुरू होगी और 1 सितंबर को सुबह 7:41 बजे तक रहेगी।
बहुला चौथ के प्रमुख मुहूर्त:
चतुर्थी तिथि शुरू: 31 अगस्त, सुबह 8:50 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 1 सितंबर, सुबह 7:41 बजे
गोधूलि पूजा मुहूर्त: शाम 6:31 बजे से 6:57 बजे तक
पूजा अवधि: 26 मिनट
चंद्रोदय: रात 8:29 बजे
स्थानीय पंचांग और स्थान के अनुसार चंद्रोदय के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।
आखिर क्यों कहते हैं इसे बहुला चौथ?
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को बहुला चतुर्थी कहे जाने के पीछे एक पौराणिक मान्यता है। इस दिन बहुला नाम की दिव्य गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। इसी वजह से इस तिथि को बहुला चौथ के नाम से जाना जाता है।
कुछ क्षेत्रों में इसे बोल चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत भगवान श्रीकृष्ण, गौमाता के प्रति श्रद्धा और सत्य वचन निभाने की कथा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
क्या है बहुला चौथ की पौराणिक कथा?
धार्मिक कथा के अनुसार, कामधेनु गाय ने भगवान श्रीकृष्ण की सेवा के लिए बहुला नाम की गाय का रूप धारण किया था। एक दिन श्रीकृष्ण ने बहुला की सत्यनिष्ठा और धर्म के प्रति उसके समर्पण की परीक्षा लेने का विचार किया।
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने सिंह का रूप धारण कर बहुला का रास्ता रोक लिया। सिंह को सामने देखकर बहुला डर गई, लेकिन उसने उससे कुछ समय की मोहलत मांगी। उसने कहा कि उसका बछड़ा भूखा है और वह पहले उसे दूध पिलाकर वापस लौट आएगी।
बहुला ने अपने वचन के मुताबिक बछड़े को दूध पिलाया और फिर सिंह के पास लौट आई। उसकी सच्चाई और वचन निभाने की भावना देखकर भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए।
मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने बहुला को वरदान दिया कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन उसकी गौमाता के रूप में पूजा की जाएगी। इसी पौराणिक मान्यता से इस दिन का नाम बहुला चौथ पड़ा।
बहुला चौथ पर क्या किया जाता है?
बहुला चौथ का व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और संकटों से रक्षा की कामना के लिए रखती हैं।
इस दिन भगवान गणेश और शिव परिवार के साथ बहुला गाय और उसके बछड़े की पूजा करने की परंपरा है। कई स्थानों पर मिट्टी से गाय और बछड़े की प्रतिमा बनाकर भी पूजा की जाती है।
पूजा का विशेष महत्व गोधूलि बेला में बताया गया है। कुछ जगहों पर महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को पूजा तथा चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलती हैं।
बहुला चौथ पर गौ सेवा का महत्व
बहुला चौथ को केवल गणेश पूजा का पर्व नहीं माना जाता, बल्कि गौ सेवा और गौमाता के प्रति सम्मान से भी जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गायों को हरा चारा या अनाज खिलाना शुभ माना जाता है।
इस तरह बहुला चौथ की परंपरा में भगवान गणेश की आराधना के साथ मां और संतान के रिश्ते, वचन की पवित्रता और गौ सेवा का संदेश भी जुड़ा हुआ है।
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