Responsive Scrollable Menu

Modi ने पिछले साल China जाने से पहले चली थी तगड़ी चाल, अब Xi Jinping के India आने से पहले खेल दिया बड़ा दाँव

पिछले वर्ष जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जाने वाले थे, तो उन्होंने उससे ठीक पहले जापान का दौरा किया था। 29 और 30 अगस्त 2025 को जापान में वार्षिक भारत-जापान शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद मोदी सीधे 31 अगस्त से 1 सितंबर तक SCO समिट के लिए चीन के तियानजिन पहुंचे थे। उस समय भी घटनाक्रम का सामरिक संदेश स्पष्ट था कि भारत एशिया की बड़ी शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को अलग-अलग खांचों में नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय रणनीति के अनुसार आगे बढ़ा रहा है।

अब एक बार फिर वैसा ही दिलचस्प और महत्वपूर्ण संयोग सामने आया है। अगले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना से पहले जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी की भारत यात्रा के दौरान नई दिल्ली और टोक्यो ने रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा देने वाले अहम फैसले किए हैं। संदेश को सीधे शब्दों में कहें तो चीन देखता रह गया और भारत ने जापान के साथ हिंद-प्रशांत की सुरक्षा, नौसैनिक सहयोग, रक्षा तकनीक और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी साझेदारी को और मजबूत कर लिया।

इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान

देखा जाये तो यह केवल एक रक्षा मंत्री की औपचारिक यात्रा नहीं है। पिछले महीने, 1 से 3 जुलाई 2026 के बीच जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची भी भारत आई थीं। नई दिल्ली में 16वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने 10 अरब डॉलर से अधिक के द्विपक्षीय समझौतों और आर्थिक, सामरिक तथा रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई। अब जापानी रक्षा मंत्री की यात्रा और इसी समय भारत में मौजूद जापान के बड़े निवेशक प्रतिनिधिमंडल ने यह संकेत और मजबूत कर दिया है कि भारत-जापान संबंध अब सुरक्षा और आर्थिक शक्ति के संयुक्त ढांचे में बदल रहे हैं।

नई दिल्ली में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके जापानी समकक्ष शिंजिरो कोइज़ुमी के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि समुद्री सुरक्षा सहयोग पर मेमोरेंडम ऑफ अरेंजमेंट (MoA) रही। इसके तहत दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच समुद्री गतिविधियों की निगरानी, मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, सूचनाओं के आदान-प्रदान, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) के क्षेत्र में सहयोग का व्यापक ढांचा तैयार होगा।

इस समझौते का महत्व केवल तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे सामरिक निहितार्थों वाला है। हिंद महासागर से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और नौवहन की स्वतंत्रता आज एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धाओं में शामिल है। दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता और समुद्री मौजूदगी के बीच भारत और जापान का समुद्री समन्वय मजबूत होना शक्ति संतुलन की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।

देखा जाये तो यह कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन की घोषणा नहीं है, लेकिन इसका मतलब साफ है कि भारत और जापान साझा सूचना, बेहतर समुद्री निगरानी, परस्पर लॉजिस्टिक सहयोग और संयुक्त क्षमता निर्माण के जरिए हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर रहे हैं। हम आपको बता दें कि भारत-जापान रक्षा सहयोग पिछले एक दशक में लगातार गहराता गया है। 2014 में औपचारिक रूप से स्थापित ‘विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी’ को दोनों देशों के नेतृत्व ने लगातार मजबूत किया। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्राओं और दोनों देशों के बीच नियमित उच्चस्तरीय संवाद ने इस रिश्ते को नई गति दी। इस साझेदारी की बुनियाद साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और मुक्त एवं खुले हिंद-प्रशांत की समान सोच पर टिकी है।

2014 के बाद हुए रक्षा समझौतों ने सैन्य सहयोग को संस्थागत स्वरूप दिया। 2020 में हुआ पारस्परिक आपूर्ति और सेवाएं समझौता दोनों देशों की सेनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुआ। MILAN और JAIMEX जैसे नौसैनिक अभ्यासों में इस व्यवस्था ने जहाजों और विमानों को अधिक सहज लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने का आधार तैयार किया।

साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी में भी दोनों देश अब प्रतीकात्मक सहयोग से आगे निकल चुके हैं। 2024 में औपचारिक रूप से आगे बढ़ा जापान के UNICORN इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एंटीना सिस्टम का भारतीय नौसेना के लिए सह-विकास, दोनों देशों का पहला संयुक्त रक्षा उपकरण प्रोजेक्ट है। अब नई वार्ता में समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ माइन काउंटरमेजर्स, संयुक्त जहाज निर्माण और पारस्परिक शिप रिपेयर सुविधाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

इसके अलावा, भारत की उत्पादन क्षमता और जापान की उच्च तकनीकी विशेषज्ञता को ‘मेक इन इंडिया’ के ढांचे से जोड़ने की कोशिश विशेष महत्व रखती है। इसका अर्थ केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि भविष्य में संयुक्त उत्पादन, तकनीकी साझेदारी और रक्षा औद्योगिक क्षमता का विस्तार है।

साथ ही दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यासों का दायरा भी बढ़ रहा है। धर्म गार्जियन और JAIMEX जैसे अभ्यासों को और व्यापक बनाने पर सहमति बनी है, जबकि वीर गार्जियन-26 एक नए चरण का संकेत है। इस अभ्यास में पहली बार जापानी लड़ाकू विमान भारत में भाग लेंगे। दोनों देशों ने DRDO और जापान की Acquisition, Technology and Logistics Agency (ATLA) के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास सहयोग गहरा करने और एक डिफेंस इंडस्ट्री फोरम आयोजित करने की योजना पर भी जोर दिया है।

इसके अलावा, कूटनीतिक और सामरिक समन्वय को आगे बढ़ाने के लिए इस वर्ष टोक्यो में प्रस्तावित चौथी भारत-जापान विदेश एवं रक्षा मंत्रियों की 2+2 बैठक की तैयारी तेज करने का भी फैसला हुआ है। साथ ही दोनों देश इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क (IPLN) के जरिए प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहतकर्मियों और जरूरी सामग्री को तेजी से पहुंचाने की क्षमता विकसित कर रहे हैं।

देखा जाये तो इस पूरी साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक सुरक्षा है। जापान की Free and Open Indo-Pacific अवधारणा और भारत की MAHASAGAR यानि Mutual and Holistic Advancement for Security and Growth Across Regions पहल के बीच बढ़ती समानता इस रिश्ते को केवल सैन्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला, निवेश, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सुरक्षा के स्तर पर भी मजबूत कर रही है। जापानी प्रधानमंत्री की हालिया यात्रा, अरबों डॉलर के समझौते और भारत आए निवेशक प्रतिनिधिमंडल इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देते हैं।

देखा जाये तो भारत और जापान का रिश्ता, कोई आज की भू-राजनीति की उपज नहीं है। इसके सांस्कृतिक सूत्र 752 ईस्वी तक जाते हैं, जब भारतीय बौद्ध भिक्षु बोधिसेन ने जापान के नारा स्थित तोदाइजी मंदिर में महान बुद्ध प्रतिमा का अभिषेक किया था। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और रास बिहारी बोस जैसे व्यक्तित्वों ने दोनों देशों के संबंधों को नई गहराई दी। 1903 में स्थापित जापान-इंडिया एसोसिएशन आज भी जापान की सबसे पुरानी अंतरराष्ट्रीय मैत्री संस्थाओं में से एक है।

लेकिन अब इतिहास और रणनीति एक ही दिशा में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। पिछले साल मोदी जापान से होकर चीन गए थे; अब चीनी राष्ट्रपति के भारत आने से पहले जापान के साथ रक्षा साझेदारी का नया अध्याय खुला है। जापानी प्रधानमंत्री की यात्रा, विशाल आर्थिक समझौते, निवेशक प्रतिनिधिमंडल और अब रक्षा मंत्री के साथ समुद्री सुरक्षा समझौते, ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। इनका सामूहिक संदेश बेहद धारदार है कि भारत किसी एक शक्ति केंद्र की परिधि में नहीं घूम रहा। वह चीन से संवाद भी करेगा, ब्रिक्स और SCO जैसे मंचों पर साथ भी बैठेगा, लेकिन साथ ही जापान जैसे रणनीतिक साझेदारों के साथ हिंद-प्रशांत में अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी स्थिति भी मजबूत करता रहेगा। बहरहाल, प्राचीन सांस्कृतिक रिश्तों से लेकर हिंद महासागर और प्रशांत में संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों तक, भारत-जापान संबंध अब एक नई रणनीतिक ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं।

-नीरज कुमार दुबे

Continue reading on the app

प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प

ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है।
 
इस व्यापक संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए देश के चार प्रमुख वर्गों को विकास का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया है, जिन्हें युवा, महिला, किसान और गरीब के रूप में रेखांकित किया गया है। इन चारों स्तंभों के समग्र सशक्तिकरण के बिना किसी भी विकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश हमारी सबसे बड़ी ताकत है। विकसित भारत का सपना तभी सच हो सकता है जब इस युवा ऊर्जा को सही दिशा, उत्कृष्ट शिक्षा और वैश्विक स्तर का कौशल मिले। देश में स्टार्टअप इकोसिस्टम का तेजी से विस्तार और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाना इसी दिशा में उठाए गए बड़े कदम हैं। इसके साथ ही, विकसित भारत का दूसरा अनिवार्य पहलू महिलाओं का सशक्तिकरण और उनके नेतृत्व में होने वाला विकास है। जब तक देश की आधी आबादी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह सक्रिय नहीं होगी, तब तक विकास की रफ्तार अधूरी रहेगी। सेनाओं में महिलाओं की भागीदारी से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती महिलाओं की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि वे अब नीति निर्धारण के केंद्र में आ रही हैं। इसी तरह, भारत की आत्मा आज भी गांवों में बसती है और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार, आधुनिक खेती को बढ़ावा और वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना आवश्यक है। किसान जब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर आधुनिक कृषि-उद्यमी बनेगा, तभी ग्रामीण भारत समृद्ध होगा। अंत में, अंत्योदय की भावना के अनुरूप समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचना चाहिए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र को तब तक विकसित नहीं कहा जा सकता जब तक कि बहुआयामी गरीबी का पूरी तरह उन्मूलन न हो जाए और हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन स्तर न मिल जाए।

इसे भी पढ़ें: PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान

आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा।
 
तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी।
 
संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा।
 
इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा।
 
निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा।
 
अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

Continue reading on the app

  Sports

Women’s Asia Cup 2026: चामरी अटापट्टू ने टी20 में झटके 7 विकेट, हैट्रिक लेकर रचा इतिहास

Sri Lanka Women vs Indonesia Women: महिला एशिया कप 2026 के छठे मैच में श्रीलंका ने इंडोनेशिया को 75 रनों से हरा दिया. इस जीत में कप्तान चामरी अटापट्टू का अहम रोल रहा. Wed, 02 Sep 2026 23:48:49 +0530

  Videos
See all

सांप ने डसा, सपेरा उसे लेकर अस्पताल पहुंचा! #shorts #viralnews #viralshorts #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-02T19:35:09+00:00

CM विजय और दादी का प्यारा VIDEO! #shorts #viralnews #viralshorts #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-02T19:39:13+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers