US H-1B Visa Fee Hike: 1 करोड़ रुपये तक बढ़ सकती है फीस, भारतीयों पर क्या होगा असर?
US H-1B Visa Fee Hike: ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वीजा के लिए 1 लाख अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की फीस प्रस्तावित की है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो अमेरिका में सीधे विदेश से भारतीय प्रोफेशनल्स को हायर करना कंपनियों के लिए काफी महंगा हो जाएगा। जानिए इस फैसले का भारतीय IT प्रोफेशनल्स और अमेरिका में नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं पर क्या असर पड़ेगा।
US H-1B Visa Fee Hike: कितनी होगी नई फीस?
अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने नए H-1B वीजा के लिए 103,265 अमेरिकी डॉलर की फीस प्रस्तावित की है। भारतीय रुपये में यह रकम करीब 95.71 लाख रुपये बैठती है।
यह प्रस्ताव 2025 में लागू की गई 1 लाख डॉलर की फीस से जुड़े विवाद के बीच आया है। पहले लगाई गई फीस को एक संघीय जज ने रोक दिया था और इस मामले में कानूनी लड़ाई अभी जारी है। नई प्रस्तावित फीस पर अब 30 दिनों तक पब्लिक कमेंट लिए जाएंगे। इसके बाद इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है।
H-1B Visa क्या है?
H-1B वीजा अमेरिकी कंपनियों को टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, शिक्षा, रिसर्च और अन्य स्पेशलाइज्ड क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। अमेरिका हर साल 65,000 रेगुलर H-1B वीजा जारी करता है। इसके अलावा एडवांस्ड डिग्री रखने वाले विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा उपलब्ध होते हैं।
भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
H-1B वीजा कार्यक्रम में भारतीय प्रोफेशनल्स की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। वित्त वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, H-1B वर्कर्स में करीब 70 फीसदी भारतीय नागरिक थे। चीन के नागरिक करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहे। ऐसे में नई फीस लागू होने पर भारतीय प्रोफेशनल्स को अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा असर झेलना पड़ सकता है।
हालांकि, प्रस्तावित फीस अमेरिका में पहले से स्टूडेंट वीजा पर मौजूद विदेशी नागरिकों को दिए जाने वाले H-1B वीजा पर लागू नहीं होगी। मौजूदा H-1B वीजा के रिन्यूअल पर भी यह फीस लागू नहीं होगी।
लेकिन अमेरिका के बाहर से किसी भारतीय प्रोफेशनल को पहली बार H-1B पर बुलाने वाली कंपनियों की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
कंपनियों के लिए कितना बड़ा झटका?
पहले H-1B से जुड़ी फीस आमतौर पर करीब 2,000 से 5,000 अमेरिकी डॉलर के बीच होती थी। इसके मुकाबले 103,265 डॉलर की प्रस्तावित फीस कई गुना अधिक है। इससे अमेरिकी कंपनियां विदेशों से कर्मचारियों को नियुक्त करने से पहले लागत पर दोबारा विचार कर सकती हैं। इसका असर खास तौर पर उन भारतीय IT और टेक प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है, जो अमेरिका में नौकरी पाने के लिए H-1B वीजा पर निर्भर रहते हैं।
ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा है फीस बढ़ाने की बात?
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि H-1B कार्यक्रम का कुछ कंपनियां गलत इस्तेमाल कर रही हैं और अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम लागत वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त किया जा रहा है। प्रशासन का मानना है कि ज्यादा फीस होने से कंपनियां तब ही H-1B कर्मचारियों को हायर करेंगी, जब उनके पास योग्य अमेरिकी उम्मीदवार उपलब्ध न हों।
वहीं, कारोबारी संगठनों का कहना है कि H-1B कार्यक्रम अमेरिकी कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की कमी दूर करने और दुनिया भर से टैलेंट हासिल करने में मदद करता है।
प्रस्ताव को फिर मिल सकती है कानूनी चुनौती
103,265 डॉलर की प्रस्तावित फीस को भी कानूनी चुनौती मिलने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन की पिछली 1 लाख डॉलर की फीस को एक संघीय जज ने रोकते हुए कहा था कि प्रशासन ने अपनी कानूनी शक्तियों से आगे जाकर कार्रवाई की।
इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फीस टैक्स नहीं है और विदेशी नागरिकों के अमेरिका में प्रवेश को नियंत्रित करने के राष्ट्रपति के अधिकार के दायरे में आती है।
भारतीय IT Professionals के लिए क्या बदलेगा?
अगर नई H-1B फीस स्थायी रूप से लागू होती है, तो भारतीय IT प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका में नई नौकरी पाना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है। अमेरिका के बाहर से भारतीय कर्मचारियों को सीधे H-1B पर नियुक्त करने वाली कंपनियों की लागत काफी बढ़ जाएगी, जिसके चलते वे नई H-1B स्पॉन्सरशिप देने से बच सकती हैं या अमेरिका में पहले से मौजूद कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं।
हालांकि, इस प्रस्तावित फीस का असर अमेरिका में पहले से मौजूद H-1B कर्मचारियों के रिन्यूअल पर नहीं होगा। ऐसे में सबसे ज्यादा असर उन भारतीय प्रोफेशनल्स पर पड़ने की संभावना है, जो भारत से अमेरिका जाकर पहली बार H-1B वीजा के जरिए नौकरी शुरू करना चाहते हैं।
NEET Paper Leak Protest: वादे पूरे न होने पर फिर सड़क पर CJP; 5 सितंबर को इंडिया गेट से पुलिस मुख्यालय तक मार्च
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) में धांधली और पेपर लीक के मुद्दों को लेकर एक बार फिर राजधानी दिल्ली में छात्रों का आंदोलन तेज होने जा रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए दोबारा सड़क पर उतरने का निर्णय लिया गया है। संगठन का कहना है कि सरकार की टालमटोल की नीति के खिलाफ शिक्षक दिवस पर राजधानी में बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा।
25 जुलाई के आश्वासनों पर अमल न होने का आरोप
संगठन के मुताबिक, 20 जून से जंतर-मंतर पर शुरू हुआ 36 दिवसीय आंदोलन 25 जुलाई को सरकार के साथ हुई वार्ता और आश्वासनों के बाद सद्भावना के तहत वापस लिया गया था।
सरकार ने आंदोलनकारी छात्रों व युवाओं पर दर्ज सभी एफआईआर वापस लेने और परीक्षा संबंधी तनाव व अनियमितताओं के कारण जान गंवाने वाले अभ्यर्थियों के परिवारों को मुआवजा देने की बात कही थी। CJP का आरोप है कि एक माह बीत जाने के बाद भी सरकार ने इन आश्वासनों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
पीड़ित परिवारों की अगुवाई में निकलेगा मार्च
CJP ने स्पष्ट किया है कि 5 सितंबर को इंडिया गेट से शुरू होकर नई दिल्ली स्थित पुलिस मुख्यालय तक जाने वाले इस मार्च का नेतृत्व वे परिवार करेंगे, जिन्होंने नीट विवाद के चलते अपने बच्चों को खो दिया।
इसके साथ ही जुलाई में संसद मार्च के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज के शिकार हुए छात्र भी इस मार्च के अग्रिम मोर्चे पर रहेंगे। संगठन ने देशभर के छात्र संगठनों और युवाओं से इस मार्च में शामिल होने का आह्वान किया है।
दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की तैयारी
विरोध मार्च की घोषणा के बाद राजधानी की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर आ गई हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अभी तक संगठन की ओर से इस प्रस्तावित मार्च के लिए कोई आधिकारिक अनुमति पत्र प्राप्त नहीं हुआ है।
अनुमति का आवेदन आने के बाद कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक निर्णय लिया जाएगा और संवेदनशील मार्गों पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए जाएंगे।
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