Explainer: पर्यावरण नहीं बल्कि अब आर्थिक संकट बनने लगी है हिमालय क्षेत्र में होने वाली आपदाएं
Explainer: हिमाचल क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदों में बढ़ोतरी हुई है. जिसका खामिया इंसानी जानों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी उठाना पड़ रहा है. पिछले सप्ताह नेपाल में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला. जब अचानक आई बाढ़ ने सबकुछ तबाह कर दिया. नेपाल-तिब्बत में आई आपदा के ये निशान बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी लंबे समय तक बने रहेंगे.
यह उस कमी की भी एक बड़ी याद दिलाता है जिसे नीति-निर्माताओं को अभी पूरा करना है. क्योंकि बढ़ते जलवायु जोखिमों से घरों, व्यवसायों और सरकारों को कैसे बचाया जाए. इस पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में इसका और खतरनाक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिलेगा.
नेपाल बाढ़ में अब तक 900 से ज्यादा लोगों की गई जान
बता दें कि नेपाल में बीते बुधवार यानी 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई. कई गांव पूरी तरह से तबाह हो गए. इस घटना को एक सप्ताह बीत गया लेकिन कुदरत के कहर के निशान आज भी देखने को मिल रहे हैं. बचाव दल अभी भी लापता लोगों की तलाश कर रहा है. जैसे जैसे सर्च ऑपरेशन आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे मरने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. सोमवार शाम तक इस आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 939 हो गई, जबकि अभी भी करीब 4000 लोग लापता बताए जा रहे हैं. जिनकी तलाश की जा रही है.
नेपाल बाढ़ से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान
नेपाल में आई इस बाढ़ में अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा है. क्योंकि इस आपदा में कई सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बह गए. जिससे नेपाल पर पुनर्निर्माण का खर्च 4 से 5 अरब डॉलर आने का अनुमान है. जो नेपाल की अर्थव्यवस्था का लगभग दसवां हिस्सा है.
नेपाल ने मांगी पुनर्निर्माण के लिए विदेशी तकनीकी मदद
हालांकि नेपाल जैसी बड़ी आपदाओं का मॉडल बनाना मुश्किल हो सकता है, लेकिन जलवायु से जुड़ी आपदाओं के कारण आर्थिक नुकसान बढ़ने से बेहतर और व्यवस्थित बीमा सुरक्षा की मांग फिर से उठ रही है. दरअसल, 11 अगस्त को पब्लिश हुई रिपोर्ट के मुताबिक, री-इंश्योरर की रिसर्च विंग 'स्विस री इंस्टीट्यूट' का अनुमान है कि 2026 की पहली छमाही में दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं से 100 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. इस नुकसान का लगभग 42% हिस्सा बीमित (insured) था, जिसका मुख्य कारण यह था कि इनमें से कई घटनाएं अमेरिका जैसे देशों में हुईं, जहां बीमा बाजार काफी विकसित है.
नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक 'सोशल पॉलिसी रिसर्च फाउंडेशन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आपदा से होने वाले नुकसान के लिए बीमा कवरेज बहुत कम है; अनुमान बताते हैं कि कुल नुकसान का केवल 5% ही बीमित होता है. देश भर में आपदा बीमा कार्यक्रम शुरू करने पर कई वर्षों से चर्चा चल रही है. पिछले साल रिपोर्ट दी थी कि नीति-निर्माता एक ऐसे मॉडल पर विचार कर रहे हैं जिसमें प्रीमियम के लिए फंड जुटाने हेतु यूटिलिटी बिलों पर एक छोटा लेवी (अतिरिक्त शुल्क) लगाया जा सकता है.
इस प्रस्ताव को अभी लागू किया जाना बाकी
लॉ फर्म 'शार्दुल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी' में इंश्योरेंस प्रैक्टिस की हेड और पार्टनर शैलजा लाल ने कहा कि बिना किसी नेशनल फ्रेमवर्क के, मौसम से जुड़ी आपदाओं के बाद सरकार की मदद का तरीका ज्यादातर काम-चलाऊ ही रहता है. उन्होंने कहा, "राज्य राहत तो दे सकते हैं, लेकिन कोई व्यवस्थित तरीका नहीं है." उन्होंने आगे कहा कि सरकार की मदद वाली कोई स्कीम कम से कम जरूरी सुरक्षा का बेसिक लेवल तो दे ही सकती है.
क्या हैं मौसम से जुड़े बढ़ते जोखिम?
दुनियाभर में हो रही लगातार प्राकृतिक घटनाओं के चलते इंश्योरेंस की जरूरत को नजरअंदाज करना अब मुश्किल होता जा रहा है. क्योंकि भारत में, चल रहे सालाना मानसून के दौरान जोरदार बारिश हुई है. जिससे दक्षिणी राज्यों में 14 लोगों की मौत हुई, जबकि पूर्वोत्तर राज्य असम में 26 और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में छह लोगों की जान गई.
खेती से लेकर कारोबार तक भारी नुकसान
इंसानी नुकसान के अलावा, हीटवेव और बाढ़ से खेती और कारोबार पर भी बुरा असर पड़ रहा है. 'जर्मनवॉच' नाम का एनवायरनमेंटल थिंक-टैंक, जो 'ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स' जारी करता है, भारत को मौसम से जुड़े जोखिम से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में रखता है. इसके अनुमान के मुताबिक, 2024 तक पिछले तीन दशकों में महंगाई के हिसाब से भारत को लगभग 170 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है.
इसका एक संभावित समाधान 'पैरामीट्रिक इंश्योरेंस' है. इसमें पहले से तय सीमाएं (जैसे बारिश का स्तर, तापमान या चक्रवात की तीव्रता) पार होने पर पेमेंट अपने आप हो जाता है. हालांकि भारत के कुछ राज्यों ने ऐसे प्रोग्राम आजमाए हैं, लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर नहीं अपनाया गया है. इंश्योरेंस कंपनी AXA क्लाइमेट में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के हेड पंकज तोमर का कहना है कि, "भारत में नागालैंड ने राज्य-स्तर पर पैरामीट्रिक आपदा बीमा प्रोग्राम शुरू करने में पहल की है, हालांकि इस मॉडल को अभी और बड़े पैमाने पर अपनाया जाना बाकी है."
उन्होंने कहा, "ऐसे प्रोग्राम को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए बीमा प्रीमियम के लिए फंडिंग का एक टिकाऊ तरीका और इसमें शामिल सभी पक्षों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है." उनका कहना है कि कारोबारों के लिए पारंपरिक बीमा बेहतर काम करता है, लेकिन अगर पारंपरिक बीमा उपलब्ध न हो या महंगा हो, तो पैरामीट्रिक कवर मददगार हो सकता है.
हालांकि यह हिमालय के कुछ हिस्सों जैसी आपदा-संभावित जगहों पर खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, जहां पारंपरिक बीमा कवर या क्षमता मिलना कभी-कभी मुश्किल हो सकता है. यहीं पर नेपाल का 'अपर त्रिशूली-1' हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट एक टेस्ट केस बन सकता है. सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हाल की बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुए इस प्रोजेक्ट का बीमा पैरामीट्रिक पॉलिसी के तहत किया गया है. इसलिए, आपदा आने पर ऐसे प्रोडक्ट कैसे काम करते हैं, इसे समझने के लिए इसके ठीक होने की प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रखी जा रही है.
उम्मीद से ज्यादा तेजी से बढ़ी भारत की अर्थव्यवस्था
अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था उम्मीद से ज़्यादा 7.8% की दर से बढ़ी, जबकि इस दौरान ईरान युद्ध की वजह से तेल की ऊंची कीमतों और सप्लाई में रुकावटों का असर भी पड़ा. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत ग्रोथ और इन्वेस्टमेंट में तेजी ने इस तिमाही में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया.
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मनोज तिवारी ने सरेआम रवि किशन को बताया झूठा, कहा- ' उनकी बातों में 90% सच्चाई नहीं...'
Manoj Tiwari Called Ravi Kishan Liar: मनोज तिवारी और रवि किशन भोजपुरी सिनेमा के दो बड़े नाम हैं. दोनों ने अपने करियर के दौर में खूब स्टारडम देखा, लेकिन एक समय दोनों के बीच जबरदस्त राइवलरी थी. वहीं, बीते कई सालों से दोनों दोनों हमेशा खुलकर एक दूसरे पर शब्दों से वार करते हैं. वहीं, अब मनोज तिवारी ने रवि किशन पर फिर से निशाना साधा है और भोजपुरी स्टार को झूठा बताया है. तो चलिए जानते हैं, अब क्या हो गया.
मनोज तिवारी ने रवि को बताया झूठा
हाल ही में मनोज तिवारी ने 'जिंगाबाद' संग बातचीत की. इस दौरान उन्होंने एक बार फिर वि किशन संग अपने रिश्ते पर बात की. जब उनसे पूछा गया कि रवि किशन कई बार ये दावा करते हैं कि वही उन्हें सिंगिंग से एक्टिंग में लेकर आए हैं. इसपर मनोज तिवारी ने कहा- 'वो तो फालतू बोलते रहते हैं. ऐसा कुछ भी नहीं है. वो तो कुछ भी बोल सकते हैं. रवि की बात को आप बस सुन लीजिए. उनकी बातों में 90 प्रतिशत भी सच्चाई नहीं होती. मैं तो 1996 में आया...उनसे पूछिए वो कब आए.'
कॉफी के सवाल पर कही ये बात
वहीं, बातचीत में आगे जब मनोज तिवारी से पूछा गया कि रवि किशन ये भी कहते हैं उन्होंने ही आपको ब्लैक कॉफी पीनी सिखाई है. तो इसके जवाब में मनोज तिवारी ने कहा- 'मेरे कारण ही ये लोग ब्लैक कॉफी पीने लायक बन गए हैं...रवि किशन. इन्हें पैसा कौन देता था? ब्लैक कॉफी आप कब पियोगे? जब आप पूरी तरह सक्षम हो जाओगे. तो रवि भाई पूरे 30 दिन काम करके सिर्फ 25 हजार रुपये कमा पाते थे...मैं उनकी एक्टिंग को चुनौती नहीं दे रहा हूं. मैं उनके गुणों को भी चुनौती नहीं दे रहा हूं, लेकिन उन्हें पैसा नहीं मिलता था.'
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रवि किशन की फीस का किया जिक्र
मनोज तिवारी ने आगे ये भी कहा कि वो रवि किशन से ज्यादा फीस चार्ज करते थे. एक्टर ने कहा- ' रवि भाई ने हमसे पहले दो फिल्में बनाई थीं. ये लोग 15 लाख रुपये में एक फिल्म बनाते थे, तो 12 लाख रुपया आ जाता था. घाटे का मामला था, तो फिर कहां से ब्लैक कॉफी पीते. ये बात 2002 की बात है. उस दौर में जब वो एक दिन के लाखों रुपये चार्ज करते थे, तब रवि किशन को पूरे महीने काम करने के बाद 25 हजार रुपये मिलते थे. जब मैं सिनेमा में 80 लाख रुपये लेने लगा था, तब रवि भाई 10 लाख रुपये मांग रहे थे.'
मनोज तिवारी और रवि किशन का विवाद
बता दें, मनोज तिवारी और रवि किशन के बीच जबरदस्त राइवलरी थी. रवि किशन के मुताबिक, दोनों करीब 13 साल तक एक-दूसरे से बात नहीं करते थे और एक-दूसरे के साथ स्टेज तक शेयर नहीं करते थे. इसकी बड़ी वजह स्टारडम और काम को लेकर कॉम्पिटिशन और ईगो क्लैश था. कहा जाता है कि रवि किशन कहते थे कि वो मनोज तिवारी को इंडस्ट्री में लाए हैं वहीं, मनोज तिवारी का कहना है कि वो सिनियर हैं. इसी को लेकर दोनों का विवाद था.
अब कैसे हैं रिश्ते?
दोनों के झगड़े को लेकर रवि किशन बताया था कि उस दौर में आसपास के लोग दोनों के कान भरते थे, जिससे दूरी और बढ़ती गई. एक फिल्म में दोनों के किरदारों को लेकर भी ईगो का मामला सामने आया था.हालांकि, आज दोनों के रिश्ते काफी बदल चुके हैं. मनोज तिवारी और रवि किशन अब एक-दूसरे के साथ दोस्ताना रिश्ता रखते हैं और पुरानी बातों को पीछे छोड़ चुके हैं,
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