Ground Report: नेपाल फ्लैश फ्लड: नुआकोट का देवीघाट कस्बा 80% मलबे में दफन, 500 घर जमींदोज, तबाही की ग्राउंड रिपोर्ट
Ground Report: नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा ने एक ऐसा भयावह मंजर छोड़ा है जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता. नुआकोट जिले का ऐतिहासिक और घनी आबादी वाला देवीघाट कस्बा कुदरत के इस कहर का सबसे बड़ा शिकार बना है. लगभग 20 हजार की आबादी वाला यह पूरा क्षेत्र करीब 80 प्रतिशत तक मलबे और गाद के नीचे दब चुका है. यह तबाही त्रिशूली नदी में आए उफान और अचानक आई फ्लैश फ्लड (जल-प्रलय) के कारण हुई. लगभग 30 फीट की ऊंचाई तक पानी, कंक्रीट और मिट्टी का तेज बहाव एक साथ इलाके में घुस आया. रात करीब 9:15 बजे जब नदी का पुल टूटने की खबर फैली, तो लोगों को समय रहते अलर्ट मिल गया. लोग अपनी जान बचाने के लिए अफरा-तफरी में घरों से निकलकर ऊंची पहाड़ियों की ओर भागे. हालांकि त्वरित अलर्ट की वजह से कई लोगों की जान बच गई, फिर भी 6 से 7 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है.
बेटियों की पढ़ाई के लिए नंगे पैर दौड़ पड़ी 47 साल की मां, युवाओं को पछाड़ कर जीतीं मैराथन
महाराष्ट्र से एक ऐसी वीडियो सामने आई है, जिसने मेहनत और जज्बे की नई मिसाल पेश की है. वीडियो ने लोगों का दिल जीत लिया है. दरअसल, 47 साल की रामाबाई रणवीर ने अपनी बेटियों की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद जुटाने के लिए अंबाजोगाई में आयोजित अमृत दौड़ मैराथन में हिस्सा लिया. खास बात है कि रामाबाई ने पास न तो स्पोर्ट्स शूज थे और न ही किसी प्रकार की प्रोफेशनल ट्रेनिंग. वह साड़ी और साधारण चप्पल पहनकर रेस में उतरती हैं और नंगे पैर दौड़कर बड़े-बड़े सूरमाओं को हराकर पहला स्थान हासिल किया. वीडियो महाराष्ट्र के बीड जिले की है.
चप्पल ने नहीं दिया साथ, तो नंगे पैर दौड़ पड़ीं
रामाबाई जब मैराथन में पहुंची तो उन्होंने रोजाना पहनी जाने वाली साड़ी और चप्पल पहनी हुई थी. रेस शुरू होने के बाद रास्ते पर कीचड़ और बारिश का पानी होने की वजह से उनकी चप्पल बार-बार फिसलने लगी, जिससे उनकी रफ्तार प्रभावित हो रही थी. लेकिन रामाबाई ने रेस छोड़ने की बजाए अपनी चप्पल उतारकर हाथ में पकड़ ली और नंगे पैर दौड़ना शुरू कर दिया. रास्ते में मौजूद मुश्किलों के बाद भी उन्होंने अपनी स्पीड बनाए रखी. मैराथन में बड़ी संख्या में युवा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था. मैराथन में बड़ी संख्या में युवा प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था. हर व्यक्ति स्पोर्ट्स शूज और ट्रैक सूट पहनकर दौड़ रहे थे. वहीं, रामाबाई नंगे पैर ही साधारण साड़ी में दौड़ रहीं थीं. बावजूद इसके उन्होंने सभी युवाओं और ट्रेंड एथलीट्स को पछाड़कर सबसे पहले फिनिश लाइन पार कर ली. उनकी जीत ने मौजूद दर्शकों और आयोजकों को भी हैरान कर दिया है.
इस 47 वर्षीय विधवा महिला का नाम "रमाबाई रणवीर" इनकी 2 बेटी भी है।
— Mandeep RajBhar (@MandeepRajBhar9) August 31, 2026
घर की हालत कमजोर है। यह रसोई में खाना पकाने का काम करती है। इनकी एक बेटी Bsc कर रही है, दूसरी पुलिस की तैयारी में लगी है। बेटियों की फीस और घर का खर्च चलाने के लिए रामाबाई दिन-रात मेहनत करती हैं।
30 अगस्त को… pic.twitter.com/fbekKwR33h
₹3,000 की इनामी राशि के लिए लगाई पूरी ताकत
बता दें, रामाबाई के लिए यह रेस सिर्फ जीतने या फिर ट्रॉफी जीतने की कोशिश नहीं थी बल्कि प्रतियोगिता में विजेता के लिए रखी गई 3 हजार रुपये की पुरस्कार राशि जीतने की कोशिश थी. रामाबाई की नजरें रकम पर इसलिए थी क्योंकि वह इसे अपनी बेटियों की पढ़ाई पर खर्च करना चाहती थीं. उनके पति की मौत के बाद परिवार और बेटियों की पढ़ाई का जिम्मा उनके कंधों पर आ गई है. वह अंबाजोगाई में अलग-अलग घरों में खाना बनाने का काम करती है. वह अंबाजोगाई में अलग-अलग घरों में खाना बनाने का काम करती हैं और इसी से परिवार का खर्चा चलाती है.
जीत पर उन्होंने कहा कि मैं इन पैसों से बेटियों की फीस भरूंगी. साथ ही उन्होंने कहा कि बेटियों की पढ़ाई के लिए जितना संघर्ष करना पड़ेगा, मैं करूंगी. मैं पीछे नहीं हटूंगी. मैं घर के खर्च के लिए हर रोज दौड़ती रहूंगी.
मां के लिए ₹3,000 सिर्फ इनाम नहीं, बेटियों का भविष्य है
आम आदमी के लिए भले ही 3 हजार की रकम कोई बड़ी बात न हो लेकिन रामाबाई और उनके परिवार के लिए 3 हजार की रकम बहुत बड़ी बात है. 3 हजार की यह रकम किताबों और पढ़ाई से जुड़ी अन्य जरूरतों में काम आएगी. बेटियों की पढ़ाई के लक्ष्य के साथ रामाबाई बिना किसी ट्रेनिंग के मैराथन में उतरती हैं. उनके पास जूते और ट्रैक सूट भले न हो लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाने का सपना जरूर था.
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो
रामाबाई के नंगे पैर मैराथन दौड़ने और जीतने की वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. लोग उनकी मेहनत और संघर्ष और बेटियों की शिक्षा के प्रति समर्पण की तारीफ कर रहे हैं. रामाबाई की कहानी इस बात की मिसाल है कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हो जाएं, मजबूत इरादा इंसान को अपनी मंजिल तक पहुंचा सकता है. यह सिर्फ एक मैराथन की जीत नहीं बल्कि परिवार के सपने की जीत है.
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