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₹25 हजार फीस और 1,000 क्लाइंट! दिल्ली के इस ज्योतिषी की कमाई का हिसाब देख रह जाएंगे दंग

दिल्ली के एक ज्योतिषी की फीस और क्लाइंट्स की संख्या ने सोशल मीडिया पर लोगों को हैरान कर दिया है। दावा है कि वह सालाना ₹25,000 फीस लेता है और उसके करीब 1,000 क्लाइंट हैं। इस हिसाब से उसकी संभावित सालाना कमाई ₹2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है। हालांकि, यह सिर्फ सोशल मीडिया पर आधारित अनुमान है

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Modi-Putin ने दुनिया को दिया बड़ा संदेश, भारत के आसमान को मिलेंगी 5 और S-400 Triumf, जमीन पर Indo-Russian AK-203 Sher Rifles मचाएंगी तहलका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एससीओ शिखर सम्मेलन में होने वाली मुलाकात से ठीक पहले भारत-रूस रक्षा साझेदारी से जुड़ी दो बड़ी तस्वीरें सामने आई हैं। एक तरफ रूस ने भारत को पांच और एस-400 ट्रायम्फ स्क्वाड्रन देने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रस्ताव सौंप दिया है, तो दूसरी तरफ अमेठी के कोरवा में भारतीय सेना के नए ‘शेर’ यानी एके-203 की पूरी तरह स्वदेशी यात्रा निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गई है। इस तरह एक ओर मिसाइल कवच भारत के आसमान को अभेद्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और दूसरी तरफ राइफल सीमा पर खड़े सैनिक के हाथ को और मजबूत बना रही है।

हम आपको बता दें कि रूस का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को मिल चुका है और उस पर प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद मार्च 2026 में पांच अतिरिक्त एस-400 स्क्वाड्रन खरीदने को मंजूरी दी थी। इनकी तैनाती पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर किए जाने की संभावना है, जिससे भारत की लंबी दूरी की वायु रक्षा क्षमता और मजबूत होगी। मौजूदा एस-400 बेड़े के लिए 280 से अधिक अतिरिक्त मिसाइलें भी खरीदी जा रही हैं, ताकि इंटरसेप्टर का पर्याप्त भंडार बना रहे।

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हम आपको बता दें कि एस-400 केवल एक मिसाइल प्रणाली नहीं, बल्कि भारत की बहुस्तरीय वायु रक्षा का बेहद महत्वपूर्ण लंबी दूरी वाला हिस्सा है। यह लड़ाकू विमानों, रणनीतिक विमानों, क्रूज मिसाइलों और अन्य हवाई लक्ष्यों को पहचानने, ट्रैक करने और निशाना बनाने में सक्षम है। अलग-अलग इंटरसेप्टर मिसाइलों के कारण यह विभिन्न ऊंचाइयों और दूरियों पर खतरे से निपट सकता है। इसकी कुछ मिसाइलें लगभग 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य को निशाना बना सकती हैं। कई लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक और एंगेज करने की क्षमता इसे एयरबेस, कमांड सेंटर और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए खास बनाती है।

हम आपको याद दिला दें कि भारत ने 2018 में पांच एस-400 स्क्वाड्रन का मूल समझौता किया था। इनमें चार की डिलीवरी हो चुकी है, जबकि पांचवें और अंतिम स्क्वाड्रन के नवंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नए पांच स्क्वाड्रन की डिलीवरी समझौते पर हस्ताक्षर के करीब तीन साल बाद शुरू होने की संभावना है। इस तरह भारत अब सिर्फ तात्कालिक जरूरत ही पूरी नहीं कर रहा, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए देश की एयर-डिफेंस छतरी का दायरा भी बढ़ा रहा है।

लेकिन आसमान की सुरक्षा के साथ जमीन पर सैनिक के हाथ में मौजूद हथियार भी उतना ही निर्णायक है। यहीं अमेठी का एके-203 ‘शेर’ कहानी का दूसरा और ज्यादा आत्मनिर्भर चेहरा सामने लाता है। कोरवा स्थित इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड में बन रही एके-203 पूरी तरह भारतीय कलपुर्जों और सामग्री से बनी है। हालांकि यह रूसी डिजाइन को भारतीय क्षमता में बदलने की करीब एक दशक लंबी यात्रा है। इस परियोजना के लिए रूस से लगभग 90 हजार पन्नों का तकनीकी दस्तावेज मिला था। कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तकनीक का हस्तांतरण प्रभावित हुआ और अंतिम टेक्नोलॉजी पैकेज 2024 में मिला। अगस्त 2023 में कोरवा में बनी पहली राइफल में भारतीय सामग्री की हिस्सेदारी करीब 5 प्रतिशत थी, दिसंबर 2024 में यह 15 प्रतिशत हुई और अगस्त 2026 तक सभी 50 प्रमुख तथा लगभग 180 छोटे कलपुर्जे भारत में बनने लगे।

इस स्वदेशीकरण की असली चुनौती सिर्फ असेंबली नहीं थी। विशेष स्टील मिश्रधातुओं, स्प्रिंग, इंजीनियरिंग प्लास्टिक, कंपोजिट, कोटिंग और सटीक रासायनिक संरचना वाली धातुओं को भारतीय स्तर पर विकसित करना पड़ा। इसके लिए एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड और अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज समेत भारतीय औद्योगिक साझेदारों ने सप्लायर नेटवर्क तैयार किया। टीमों ने देशभर में करीब 76 सब-वेंडरों का निरीक्षण किया, जिनमें लगभग आधे उत्तर प्रदेश, खासकर कानपुर और लखनऊ क्षेत्र में हैं।

अब कोरवा में करीब 76 तरह के परीक्षण करने वाली अपनी प्रयोगशाला है। हर राइफल को स्वीकार किए जाने से पहले करीब 70 राउंड फायर किए जाते हैं, जिनमें दो हाई-प्रेशर राउंड सामान्य से करीब 50 प्रतिशत अधिक दबाव पैदा करते हैं। पहली पूरी तरह भारतीय एके-203 ने लगातार 3,000 राउंड की फायरिंग परीक्षा भी सफलतापूर्वक पूरी की। साथ ही सेना के परीक्षण के लिए 100 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री वाली 10 राइफलें तैयार की जा रही हैं।

बताया जा रहा है कि अब तक करीब 70 हजार राइफलें सेना को दी जा चुकी हैं। अप्रैल 2027 से उत्पादन क्षमता एक राइफल हर 100 सेकंड तक पहुंचाने का लक्ष्य है। कंपनी को 1.5 लाख से अधिक राइफलों की संभावित मांग के संकेत मिल चुके हैं और आगे निर्यात तथा कलाश्निकोव श्रेणी के अन्य हथियारों की दिशा में भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

बहरहाल, रणनीतिक संदेश साफ है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि तकनीक को आत्मसात कर अपनी रक्षा औद्योगिक क्षमता खड़ी कर रहा है। एस-400 भारत की दूर से आने वाले हवाई खतरे को रोकने की क्षमता बढ़ाता है, जबकि पूरी तरह स्वदेशी एके-203 युद्ध के सबसे बुनियादी स्तर पर सैनिक की आत्मनिर्भरता मजबूत करता है। यही संयोजन भारत की बदलती सैन्य शक्ति की असली तस्वीर है। यानि आसमान में मजबूत सुरक्षा कवच और जमीन पर भारतीय हाथों से बना ‘शेर’।

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