“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बाँधा गया था, उसी रक्षा-सूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना, अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना।
रक्षाबंधन पर धागों पर बंधन एक संकल्प है।
वह धागा राखी का नहीं, रिश्तों का होता है।
बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो वह केवल धागा नहीं बाँधती। वह अपने बचपन को बाँधती है, अपनी स्मृतियों को बाँधती है, अपने विश्वास को बाँधती है। उसकी आँखों में एक मौन प्रार्थना होती है- “भैया! जीवन चाहे जितना बदल जाए, हमारे रिश्ते का यह विश्वास कभी मत बदलना।” और भाई भी जब बहन की ओर देखता है तो उसके मन में एक संकल्प जन्म लेता है- “तुम्हारे जीवन में कोई कठिनाई आए तो मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” यही रक्षाबंधन है। भारतीय संस्कृति की सुंदरता यह है कि वह किसी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंध तक सीमित नहीं रखती। वह एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदल देती है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है। और रक्षा उस प्रकृति की करनी है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं।
हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने हमारा सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी छोड़कर राष्ट्र की रक्षा के लिए तैनात रहता है। वह जानता है कि उसके पीछे करोड़ों परिवार चैन की नींद सो रहे हैं।
किसी सैनिक की कलाई पर बँधी राखी में भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है।
कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहाँ तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूँगी।” यह भाव केवल एक परिवार का नहीं है। यह पूरे राष्ट्र का भाव है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई किसान कठिन परिश्रम करके खेत में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई चिकित्सक ईमानदारी से रोगी का उपचार करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है, तब वह राष्ट्र की रक्षा करता है। और जब एक सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है और देश की एकता को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक अदृश्य राखी बाँधनी चाहिए, जो कर्तव्य करने का संकल्प बन सके। हम आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाएँ- यह आवश्यक है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। राखी केवल बाजार से खरीदा हुआ धागा नहीं है। उसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना है। वे यह समझें कि भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाले माध्यम हैं।
हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल स्वयं के लिए जीने का नाम नहीं है। हमारे पर्व वास्तव में हमारी संस्कृति की जीवित पाठशालाएँ हैं। इसलिए संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराना नहीं है। संस्कृति की रक्षा का अर्थ है- उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारना। प्रकृति हमें बार-बार संकेत दे रही है कि अब उसकी रक्षा का समय आ गया है। तो क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए? एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि एक परिवार हर वर्ष एक वृक्ष की जिम्मेदारी ले ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कितनी बड़ी विरासत तैयार हो सकती है। रक्षा का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। हर अधिकार के साथ एक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। जिसकी रक्षा करने का संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
एक राखी, अनेक संकल्प। इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ संकल्प लें- माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को संस्कार देंगे। जरूरतमंद की सहायता करेंगे। देश की संपत्ति को अपनी संपत्ति समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। यदि रक्षाबंधन इन संकल्पों का पर्व बन जाए तो समाज की कितनी समस्याएँ अपने आप कम हो सकती हैं। वस्तुएँ कुछ समय बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन संकल्प जीवनभर साथ रहता है।
रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बँधती है, लेकिन उसका अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह धागा हमें बताता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बाँधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। एक वृक्ष बचाइए। एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। तभी राखी का धागा सचमुच मजबूत होगा। यही रक्षाबंधन की सार्थकता है।
- डॉ. वन्दना सेन
पार्वती बाई गोखले विज्ञान महाविद्यालय
जीवाजीगंज, लश्कर ग्वालियर म. प्र.
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रक्षाबंधन पर्व रक्षा के तात्पर्य से बांधने वाला एक ऐसा सूत्र है, जिसमें बहनें अपने भाईयों के माथे पर तिलक लगाकर जीवन के हर संघर्ष तथा मोर्चे पर उनके सफल होने तथा निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर रहने की ईश्वर से प्रार्थना करती हैं तथा उनके सुखद जीवन के लिए मंगलकामना करती हैं। भाई इस कच्चे धागे के बदले अपनी बहनों की हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा करने का वचन देते हैं और उनके शील एवं मर्यादा की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। वास्तव में भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक पर्व रक्षाबंधन स्नेह, सौहार्द एवं सद्भावना का एक ऐसा पर्व है, जो उन्हें अटूट एकता के सूत्र में बांध देता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन पर्व की भारतीय समाज और संस्कृति में कितनी महत्ता है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बहनों के हाथ अपने भाईयों की कलाईयों पर राखियां बांधने के लिए मचल उठते हैं और कलाई पर बांधे जाने वाले मामूली से दिखने वाले इन्हीं कच्चे धागों से पक्के रिश्ते बनते हैं। पवित्रता तथा स्नेह का सूचक यह पर्व भाई-बहन को पवित्र स्नेह के बंधन में बांधने का पवित्र एवं यादगार दिवस है। इस पर्व को भारत के कई हिस्सों में श्रावणी के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में ‘गुरु महापूर्णिमा’, दक्षिण भारत में ‘नारियल पूर्णिमा’ तथा नेपाल में इसे ‘जनेऊ पूर्णिमा’ के नाम से जाना जाता है।
रक्षाबंधन मनाए जाने के संबंध में अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि जब देवराज इन्द्र बार-बार राक्षसों से परास्त होते रहे और हर बार राक्षसों के हाथों देवताओं की हार से निराश हो गए तो इन्द्राणी ने बहुत कठिन तपस्या की और अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया। यह रक्षासूत्र इन्द्राणी ने देवराज इन्द्र की कलाई पर बांध दिया। तपोबल से युक्त इस रक्षासूत्र के प्रभाव से देवराज इन्द्र राक्षसों को परास्त करने में सफल हुए। तभी से रक्षाबंधन पर्व की शुरूआत हुई। एक उल्लेख यह भी मिलता है कि जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने एक ब्राह्मण वेश धारण कर अपनी दानशील प्रवृत्ति के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी और बलि द्वारा उनकी मांग स्वीकार कर लिए जाने पर भगवान वामन ने अपने पग से सम्पूर्ण पृथ्वी को नापते हुए बलि को पाताल लोक भेज दिया। कहा जाता है कि उसी की याद में रक्षाबंधन पर्व मनाया गया।
रक्षाबंधन पर्व से कई ऐतिहासिक प्रसंग भी जुड़े हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से इस पर्व की शुरूआत मध्यकालीन युग से मानी जाती है। भारतीय इतिहास ऐसे प्रसंगों से भरा पड़ा है, जब राजपूत योद्धा अपनी जान की बाजी लगाकर युद्ध के मैदान में जाते थे तो उनके देश की बेटियां उन वीर सैनिकों की आरती उतारकर उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा करती थी तथा वीर रस के गीत गाकर उनकी हौंसला अफजाई करते हुए उनसे राष्ट्र की रक्षा का प्रण भी कराती थी। कहा जाता है कि उस जमाने में अधिकांश मुस्लिम शासक हिन्दू युवतियों का बलपूर्वक अपहरण करके उन्हें अपने हरम की शोभा बनाने का प्रयास किया करते थे और ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए राजपूत कन्याओं ने बलशाली राजाओं को राखियां भेजकर उनके साथ भ्रातृत्व संबंध स्थापित कर अपने शील की रक्षा करनी आरंभ कर दी थी। उसी परम्परा ने बाद में रक्षाबंधन पर्व का रूप ले लिया।
चितौड़ की महारानी कर्मावती का प्रसंग तो इस संबंध में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया तो चितौड़ की महारानी कर्मावती घबरा गई। उन्हें चितौड़ के साथ-साथ स्वयं की तथा चितौड़ की अन्य राजपूत बालाओं की सुरक्षा का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। कोई उपाय न सूझने पर रानी कर्मावती ने बादशाह हुमायूं को राखी के धागे में रक्षा का पैगाम भेजा और हुमायूं को अपना भाई मानते हुए उनसे अपनी सुरक्षा की प्रार्थना की। बादशाह हुमायूं महारानी कर्मावती का यह रक्षासूत्र और संदेश पाकर भाव विभोर हो गए और अपनी इस अनदेखी बहन के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने तुरन्त अपनी विशाल सेना लेकर चितौड़ की ओर रवाना हो गए लेकिन जब तक वह चितौड़ पहुंचे, तब तक महारानी कर्मावती और चितौड़ की हजारों वीरांगनाएं अपने शील की रक्षा हेतु अपने शरीर की अग्नि में आहूति दे चुकी थी। उसके बाद हुमायूं ने महारानी कर्मावती की चिता की राख से अपने माथे पर तिलक लगाकर बहन के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने के लिए जो कुछ किया, वह इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया तथा इसी के साथ रक्षाबंधन पर्व के इतिहास में एक अविस्मरणीय अध्याय भी जुड़ गया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही यह परम्परा बनी कि कोई भी महिला या युवती जब किसी व्यक्ति को राखी बांधती है तो वह व्यक्ति उसका भाई माना जाता है।
समय के साथ-साथ रक्षाबंधन पर्व के स्वरूप और मूल उद्देश्य में बहुत बदलाव आया है। तेजी से आधुनिकता की ओर अग्रसर आज के इस भागदौड़ भरे और स्वार्थपरक जमाने में जहां बहनों के लिए अब राखी का अर्थ भाई से महंगे उपहार तथा नकदी इत्यादि पाना हो गया है, वहीं भाई भी अपनी निजी जिन्दगी की व्यस्तताओं के चलते बहनों के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वहन सही ढ़ंग से नहीं कर पाते। ऐसे में यह पवित्र पर्व अब रुपये-पैसे तथा साड़ी, आभूषण व अन्य कीमती उपहारों इत्यादि के लेन-देन का पर्व बनता जा रहा है और भाई-बहन के बीच राखी का मोलभाव होने की वजह से धीरे-धीरे इस पर्व की मूल भावनाएं सिकुड़ रही हैं। कच्चे धागों की जगह रेशम के धागों ने ले ली और अब इन धागों की अहमियत कम होती जा रही है। रक्षाबंधन महज कलाई पर एक धागा बांधने की रस्म नहीं है बल्कि यह भाई-बहन के अटूट स्नेह, पवित्रता और सद्भावना का पर्व है। यह पर्व रिश्तों की पवित्रता और वचनबद्धता का प्रतीक है। इसलिए रक्षाबंधन पर्व को चंद रुपयों या कीमती उपहारों से तोलकर देखना इस पर्व के अंतस में विद्यमान पवित्र भावना का अपमान है।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)
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