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Black Raisins: आयरन से भरपर है काली किशमिश, हड्डियों में लाएगी नई जान! कमाल के हैं 5 फायदे

Black Raisins: काली किशमिश स्वाद में मीठी होने के साथ पोषक तत्वों से भी भरपूर मानी जाती है। अंगूर को सुखाकर तैयार की जाने वाली यह ड्राई फ्रूट्स की श्रेणी में आने वाली चीज कई घरों में रोजाना के खानपान का हिस्सा है। इसे सीधे खाने के अलावा दूध, दलिया, खीर या दूसरे व्यंजनों में भी शामिल किया जा सकता है। काली किशमिश में प्राकृतिक शर्करा, फाइबर और कई तरह के माइक्रोन्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं, इसलिए संतुलित मात्रा में इसका सेवन डाइट में विविधता ला सकता है।

खासकर भीगी हुई काली किशमिश खाने का चलन काफी पुराना है। रात में कुछ किशमिश पानी में भिगोकर सुबह खाने से इसे नरम बनाना आसान होता है और इसका सेवन भी सुविधाजनक रहता है। हालांकि, किसी भी ड्राई फ्रूट की तरह इसे भी सीमित मात्रा में खाना बेहतर है, क्योंकि इसमें प्राकृतिक शुगर और कैलोरी होती है। आइए जानते हैं काली किशमिश को डाइट में शामिल करने से कौन-कौन से संभावित फायदे मिल सकते हैं।

काली किशमिश खाने के बड़े फायदे

पाचन के लिए फायदेमंद
काली किशमिश में डाइटरी फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को सामान्य रखने में मदद कर सकता है। नियमित डाइट में पर्याप्त फाइबर लेने से मल त्याग बेहतर रहता है और कब्ज जैसी परेशानी से बचाव में मदद मिल सकती है। सुबह भिगोई हुई किशमिश खाने का चलन इसी वजह से भी लोकप्रिय है। हालांकि कब्ज लंबे समय से बनी हुई है तो केवल किशमिश पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

आयरन का स्रोत
किशमिश में आयरन सहित कई खनिज पाए जाते हैं। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी पोषक तत्व है। संतुलित डाइट के हिस्से के रूप में किशमिश का सेवन आयरन के सेवन में योगदान दे सकता है। लेकिन आयरन की कमी या एनीमिया होने पर केवल किशमिश को उपचार नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर की सलाह और उचित जांच जरूरी होती है।

हड्डियों के लिए उपयोगी पोषक तत्व
काली किशमिश में कैल्शियम और बोरॉन जैसे कुछ खनिज पाए जाते हैं, जो हड्डियों के स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं। इसे दूध, दही, नट्स और बीजों जैसी अन्य पौष्टिक चीजों के साथ डाइट में शामिल किया जा सकता है। अच्छी हड्डियों के लिए केवल किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन डी और नियमित शारीरिक गतिविधि भी जरूरी है।

शरीर को एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं
किशमिश में पॉलीफेनोल जैसे पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से निपटने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं में योगदान कर सकते हैं। रोजाना की डाइट में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, नट्स और बीजों के साथ थोड़ी मात्रा में किशमिश शामिल करना संतुलित खानपान का हिस्सा हो सकता है।

तुरंत ऊर्जा देने में मदद
काली किशमिश में प्राकृतिक रूप से मौजूद कार्बोहाइड्रेट और शुगर शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसलिए इसे व्यस्त दिनचर्या में छोटे स्नैक के तौर पर लिया जा सकता है। हालांकि, इसकी मिठास को देखते हुए मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है। खासकर डायबिटीज या ब्लड शुगर की समस्या वाले लोगों को किशमिश खाने की मात्रा अपने डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह के अनुसार तय करनी चाहिए।

(Disclaimer: इस आर्टिकल में दी गई सामग्री सिर्फ जानकारी के लिए है। हरिभूमि इनकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी सलाह या सुझाव को अमल में लेने से पहले किसी विशेषज्ञ/डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।)

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लेखक: (कीर्ति)

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परमाणु हथियारों के प्रतिबंध की वकालत करती है हिरोशिमा त्रासदी

मानव इतिहास में ‘6 अगस्त 1945’ की मनहूस तारीख को शायद ही कोई भूल पाए। 'हिरोशिमा दिवस' के रूप में मनाई जाती है ये तारीख। इस तारीख में सिर्फ तबाही लिखी थी। तारीख में ऐसा मुकर्रर वक्त था जिसने मात्र 16 मिनट के भीतर 1,30,000 लोगों की सांसें एक साथ रोकी थी। हताहतों का आकंड़ा फिलहाल सरकारी है, पर वास्तिवक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। हिरोशिमा पर किए परमाणु हमले में मरने वालों में बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें भी थीं। सुबह करीब 8ः15 बजे अमेरिका ने हिरोशिमा पर अपने ‘बी-29 ‘एनाला गे’ विमान द्वारा आसमान से परिमाणु बमों की बारिश करके पूरा शहर जिंदा जला दिया था। घटना के वक्त ज्यादातर लोग सोए हुए थे, परमाणु बम ने उन्हें सोता ही मार दिया। हिरोशिमा में जब परमाणु बम फोड़ा गया, तो जापानियों को लगा कि सूरज फटा है। जबकि, वह सूरज नहीं, बल्कि तथाकथित विकसित, सभ्य और मुट्ठी भर लोगों का निर्णय तथा एक महाशक्ति द्वारा निर्मित कृत्रिम सूरज था जिसकी आग में लाखों निर्दोष लोग भाप बनकर चंद मिनटों में उड़ गए। घटना का सामूहिक हत्यारा अमेरिका था।

अगस्त माह की जब 6 तारीख आती है या फिर परमाणु हथियारों की बढ़ती तादात पर वैश्विक मंचों पर विमर्श होता है, तो जापान की दिल दहला देने वाली यह घटना आंखों के सामने अनायास उमड़ पड़ती हैं। घटना को श्रृधालजि के तौर पर ही सालाना 6 अगस्त को ‘हिरोशिमा दिवस’ के रूप में विश्व मनाता है। यह दिन उन मुल्कों को संकल्पित होने को आहवान भी करवाता है, जो परमाणु बम फोड़ने की अनाअवश्यक धमकी दिया करते हैं। साथ ही अहिंसा, त्रासदी, को छोड़कर भाईचारा अपनाने और शांति के पथ पर चलने को जागरूश्क भी करता है। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर गिराए गए अलग-अलग तारीखों पर परमाणु बम की यह कहानी काले अध्याय के रूप में तबतक दर्ज रहेगी, जबतक दुनिया इस धरती पर वास करेगी। 6 अगस्त को गिराए पहले बम का नाम ‘एनाला गे’ था। वहीं, 9 अगस्त वाले बम का नाम ‘लिटिल बॉय’ यानी यूरेनियम-आधारित परमाणु बम था।

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जापान का जब तक अस्तित्व रहेगा, उनके लोग अमेरिका को माफ नहीं करेंगे। जापान के अलावा पूरे विश्व में इस मानव त्रासदी की निंदा प्रत्येक 6 अगस्त को की जाती है। नागासाकी पर गिराए बम से भी लाखों की संख्या में बेकसूर नागरिक मरे थे। हिरोशिमा दिवस वैश्विक स्तरीय पर परमाणु हथियारों के विरुद्ध एकजुट होने एवं समूचे संसार में अमन-शांति की वकालत के लिए भी याद किया जाता है। साथ ही भविष्य में ऐसे विनाशकारी युद्धों को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को नष्ट करने की पुरजोर अपील भी करता है। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन ‘डेलानो रूजवेल्ट’ के सन्दर्भ में ‘लिटिल ब्वाय’ और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में ‘फैट मैन’ भी कहा जाता है। फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति हुआ करते थे। वह द्वितीय विश्वयुद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान बीसवीं सदी के सबसे क्रूर व्यक्तियों में गिने जाते रहे। यह त्रासदी उनकी ही देन थी।
  
पाकिस्तान, अमरिका जैसे मुल्क आज भी परमाणु बमों को फोड़ने की धमकी देते हैं। इसलिए हिरोशिमा दिवस उनके लिए चेतावनी के अलावा सीख जैसा भी है। हिरोशिमा की घटना को आज 81 वर्ष हो गए, लेकिन दुर्भाग्य संसार आज भी युद्ध-हिंसा में संलग्न है। यूं कहें कि परमाणु हथियारों के ढेर पर बैठा है। हाल में, अमेरिका द्वारा ईराक पर परमाणु हमले की धमकी देना, दुनिया भर में बढ़ती हिंसा की घटनाएं और हथियारों को इकट्ठा करने की होड़ के बीच हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं से क्या कुछ सबक सीख पाए या नहीं? 81 साल पहले 2,50,000 हजार लोगों को मारकर भी अमेरिका को शांति नहीं मिली? अमेरिका की दादागिरी को जवाब देने का वक्त आ चुका है इसके लिए वैश्विक स्तर पर सभी मुल्कों को एकजुट होना होगा। साथ ही परमाणु हथियारों के निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में सभी देशों को सामूहिक पहल करने की जरूरत है।

- डॉ. रमेश ठाकुर
सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

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