पूरी दुनिया में मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती का एक बड़ा रणनीतिक लाभ भारत को मिलने जा रहा है और यह घटनाक्रम अमेरिका समेत पूरे पश्चिमी जगत के लिए चौंकाने वाला है। हम आपको बता दें कि भारत और रूस के बीच उभरती परमाणु साझेदारी मात्र कोई बिजली उत्पादन का समझौता नहीं है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, अत्याधुनिक परमाणु तकनीक, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, बड़े परमाणु संयंत्रों और उच्च तकनीकी विनिर्माण के जरिए भारत की सामरिक शक्ति को नई ऊंचाई देने वाला समीकरण बनने जा रही है। देखा जाये तो ऐसे समय में जबकि पश्चिमी देश वैश्विक ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तब भारत और रूस के बीच परमाणु सहयोग का नई दिशा पकड़ना भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा संदेश है। यह साझेदारी भारत को केवल ऊर्जा की अतिरिक्त क्षमता नहीं देगी, बल्कि उसे तकनीकी आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विस्तार और रणनीतिक स्वायत्तता की उस स्थिति तक पहुंचाने में मदद कर सकती है, जहाँ नई दिल्ली वैश्विक शक्ति संतुलन में कहीं अधिक मजबूत और निर्णायक भूमिका निभाए।
हम आपको बता दें कि भारत के परमाणु क्षेत्र में हाल के नियामकीय बदलावों ने विदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए नए अवसर खोले हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ उस देश को मिलने की संभावना है, जिसके पास केवल डिजाइन नहीं, बल्कि वास्तविक परिचालन अनुभव भी मौजूद है। रूस इस दौड़ में इसलिए आगे दिखाई देता है क्योंकि उसके पास बड़े परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के संचालन का व्यावहारिक अनुभव है।
SMR तकनीक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पारंपरिक परमाणु बिजलीघर विशाल निवेश, बड़े भूभाग और लंबी निर्माण अवधि की मांग करते हैं। इसके विपरीत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले, चरणबद्ध तरीके से स्थापित किए जा सकने वाले और विशेष जरूरतों के अनुसार तैनात किए जा सकते हैं। इन्हें दूरदराज के क्षेत्रों, सीमित ग्रिड वाले इलाकों, औद्योगिक क्लस्टरों और ऊर्जा-गहन डेटा सेंटरों के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
रूस का अकादमिक लोमोनोसोव इस दिशा में विशेष महत्व रखता है। यह एक तैरता हुआ परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें दो 35 मेगावाट क्षमता के मॉड्यूल हैं और जिसने वाणिज्यिक संचालन के जरिए फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर की व्यवहार्यता प्रदर्शित की है। भारत जैसे विशाल समुद्री तट वाले देश के लिए यह मॉडल केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक संभावित रणनीतिक विकल्प है। भविष्य में तटीय औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, द्वीपीय क्षेत्रों और दूरस्थ इलाकों की ऊर्जा जरूरतों के लिए ऐसी तकनीक अत्यंत उपयोगी हो सकती है।
देखा जाये तो भारत-रूस सहयोग का दूसरा बड़ा आधार बड़े परमाणु रिएक्टर हैं। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र इस साझेदारी की सबसे मजबूत मिसाल है। रूस की VVER तकनीक पर आधारित इकाइयों ने दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग को प्रयोगशाला से निकालकर जमीन पर उतारा है। अब नई पीढ़ी के VVER-1200 जैसे उच्च क्षमता वाले रिएक्टरों और भारत में इनके क्रमिक निर्माण की संभावनाओं पर भी चर्चा का विस्तार हो रहा है।
देखा जाये तो यहां भारत का सबसे बड़ा लाभ केवल अतिरिक्त बिजली क्षमता नहीं है। यदि रूसी डिजाइन वाले परमाणु संयंत्रों और SMR के उपकरणों का स्थानीयकरण भारत में होता है, तो देश परमाणु ऊर्जा का उपभोक्ता भर नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक परमाणु आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकता है। इससे भारतीय कंपनियों को उच्च तकनीकी विनिर्माण, विशेष इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, नियंत्रण प्रणालियों और परमाणु उपकरण निर्माण में अवसर मिलेंगे। यही ‘मेक इन इंडिया’ को परमाणु क्षेत्र में वास्तविक गहराई दे सकता है।
यहां लागत का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की स्वदेशी दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर तकनीक की तुलना में रूसी रिएक्टरों की लागत कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन पश्चिमी देशों के कई प्रस्तावित रिएक्टरों की तुलना में रूसी विकल्प अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी माना जाता है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा में केवल ईंधन की कीमत निर्णायक नहीं होती; निर्माण अवधि, वित्तपोषण की लागत और परियोजना में होने वाली देरी अंतिम लागत को कई गुना बढ़ा सकती है। इसलिए रूस का अनुभव और क्रमिक निर्माण का मॉडल भारत के लिए आर्थिक रूप से भी आकर्षक हो सकता है।
लेकिन इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामरिक निहितार्थ है। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए परमाणु ऊर्जा स्थिर बेसलोड बिजली उपलब्ध कराने का साधन है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत परमाणु संयंत्र चौबीसों घंटे बिजली दे सकते हैं। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था, डेटा अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उन्नत विनिर्माण का विस्तार होगा, बिजली की मांग में भारी वृद्धि होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा सुरक्षा का रणनीतिक स्तंभ बन सकती है।
इसके अलावा, रूस के साथ गहरा परमाणु सहयोग भारत को जो बड़ा लाभ देता है वह है रणनीतिक स्वायत्तता। भारत यदि केवल पश्चिमी प्रौद्योगिकी या किसी एक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर रहता है, तो भू-राजनीतिक दबाव उसकी ऊर्जा योजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के साथ सहयोग भारत को विकल्प देता है और बहुध्रुवीय परमाणु साझेदारी की क्षमता बढ़ाता है। साथ ही, भारत अपने स्वदेशी SMR और परमाणु कार्यक्रमों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ा सकता है।
देखा जाये तो भारत का लक्ष्य अब केवल अधिक बिजली पैदा करना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी परमाणु क्षमता विकसित करना है, जिसमें विदेशी सहयोग से तकनीक, अनुभव और विनिर्माण क्षमता हासिल करते हुए देश धीरे-धीरे डिजाइन, उत्पादन और आपूर्ति में आत्मनिर्भर बने। रूस के साथ साझेदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पुल बन सकती है।
बहरहाल, आने वाले वर्षों में भारत-रूस परमाणु सहयोग का असली मूल्य मेगावाट में नहीं, बल्कि उस रणनीतिक क्षमता में मापा जाएगा जो भारत को ऊर्जा-सुरक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक परमाणु उद्योग में अधिक प्रभावशाली बनाएगी। यदि स्थानीयकरण, लागत नियंत्रण, सुरक्षा मानकों और स्वदेशी क्षमता निर्माण के बीच सही संतुलन बनाया गया, तो यह साझेदारी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उसकी सामरिक शक्ति को भी नई ऊंचाई दे सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
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डिजिटल इंडिया के दौर में ट्रैफिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ई-चालान व्यवस्था काफी प्रभावी साबित हुई है। लेकिन इसी सुविधा का फायदा उठाकर साइबर अपराधी लोगों को ठगने के नए-नए तरीके अपना रहे हैं। आजकल हजारों वाहन चालकों के मोबाइल पर फर्जी ई-चालान के संदेश भेजे जा रहे हैं, जिनमें जुर्माना भरने का दबाव बनाकर लोगों को नकली वेबसाइट पर ले जाया जाता है। ऐसे में बिना जांच-पड़ताल किए किसी भी लिंक पर क्लिक करना भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
कैसे काम करता है यह नया साइबर फ्रॉड?
साइबर ठग सबसे पहले वाहन मालिकों को ट्रैफिक चालान का एसएमएस भेजते हैं। संदेश में लिखा होता है कि आपके वाहन पर ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन का जुर्माना लगाया गया है और निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं करने पर अतिरिक्त कार्रवाई की जाएगी। मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक करते ही व्यक्ति एक फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाता है, जो देखने में सरकारी पोर्टल जैसी लगती है।
इसके बाद वहां बैंक अकाउंट, डेबिट या क्रेडिट कार्ड, यूपीआई और ओटीपी जैसी संवेदनशील जानकारी मांगी जाती है। कई मामलों में लिंक पर क्लिक करते ही मोबाइल में हानिकारक सॉफ्टवेयर डाउनलोड हो जाता है, जिससे साइबर अपराधियों को फोन और बैंकिंग ऐप्स तक पहुंच मिल सकती है।
असली और नकली ई-चालान मैसेज की पहचान कैसे करें?
फर्जी संदेशों से बचने का सबसे आसान तरीका वेबसाइट के लिंक की जांच करना है। सरकारी ई-चालान से जुड़े सभी आधिकारिक लिंक .gov.in डोमेन पर होते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि लिंक echallan.parivahan.gov.in जैसे सरकारी डोमेन का है, तो उसकी विश्वसनीयता अधिक होती है।
वहीं यदि एसएमएस में .com, .net, .xyz, .apk, bit.ly या किसी अन्य शॉर्ट लिंक का उपयोग किया गया है, तो सतर्क हो जाएं। ऐसे लिंक साइबर ठगी का हिस्सा हो सकते हैं। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक करने से पहले उसकी जांच अवश्य करें।
गलती से लिंक खुल जाए तो तुरंत उठाएं ये कदम
यदि आपने अनजाने में फर्जी लिंक खोल दिया है या बैंकिंग से जुड़ी कोई जानकारी साझा कर दी है, तो समय गंवाए बिना अपने बैंक की हेल्पलाइन पर संपर्क कर कार्ड, नेट बैंकिंग या यूपीआई सेवाओं को अस्थायी रूप से ब्लॉक कराएं। इसके बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करें और ऑनलाइन साइबर क्राइम पोर्टल पर भी पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं। जितनी जल्दी शिकायत होगी, धन वापस मिलने की संभावना उतनी ही बढ़ सकती है।
ई-चालान चेक करने का सही तरीका
यदि आपको अपने वाहन के चालान की जानकारी चाहिए, तो हमेशा केवल आधिकारिक परिवहन विभाग के ई-चालान पोर्टल पर जाकर ही स्टेटस जांचें। किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट, व्हाट्सऐप मैसेज या अनजान एसएमएस में दिए गए लिंक के जरिए भुगतान करने से बचें। सरकारी पोर्टल पर वाहन नंबर या चालान नंबर डालकर पूरी जानकारी सुरक्षित तरीके से प्राप्त की जा सकती है।
इन आसान सावधानियों से रहें सुरक्षित
साइबर अपराधियों से बचाव के लिए कुछ छोटी-छोटी सावधानियां बेहद कारगर साबित होती हैं। किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें, ओटीपी, यूपीआई पिन या बैंकिंग जानकारी किसी के साथ साझा न करें। अपने मोबाइल में नियमित रूप से सिक्योरिटी अपडेट और एंटीवायरस सक्रिय रखें। यदि कोई संदिग्ध संदेश मिले, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट करें। जागरूकता ही साइबर ठगी से बचने का सबसे मजबूत हथियार है।
- डॉ. अनिमेष शर्मा
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