हाल ही में उत्तर प्रदेश के कई जिलों में खाद्य सुरक्षा विभाग ने मिलावटी खोया के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई की। कानपुर, मेरठ, हापुड़, मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद से अब तक करीब 4,000 किलो मिलावटी खोया जब्त करके उसे नष्ट किया जा चुका है। जांच में पता चला कि कुछ लोग खोया में डिटर्जेंट, टैल्कम पाउडर, स्किम्ड मिल्क पाउडर, पाम ऑयल और हाइड्रोजन पेरॉक्साइड जैसी चीजों का इस्तेमाल कर रहे थे। मिलावटी खोया खाने से पेट दर्द, अपच, उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय में इससे लिवर और किडनी डैमेज का रिस्क होता है। रक्षाबंधन का त्योहार नजदीक है। इस दौरान बाजार में मिठाइयों की डिमांड बढ़ जाती है। मिलावटखोर इसी का फायदा उठा रहे हैं। ऐसे में त्योहार पर मिठाई खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी है। इसलिए आज 'जरूरत की खबर' में मिलावटी खोया पर बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- देवेन्द्र कुमार दुबे, फूड सेफ्टी ऑफिसर, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन, दमोह डॉ. आशीष मेहरोत्रा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन एंड क्रिटिकल केयर, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, कानपुर सवाल- असली खोया कैसे तैयार किया जाता है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- खोया जल्दी खराब क्यों होता है? जवाब- इसमें काफी मात्रा में प्रोटीन, फैट और अन्य पोषक तत्व होते हैं। साथ ही इसमें कुछ नमी भी बनी रहती है। ये सभी चीजें बैक्टीरिया और फफूंद पनपने के लिए अनुकूल माहौल बनाती हैं। इसलिए खोया जल्दी खराब होता है। सवाल- त्योहारों के समय खोया में मिलावट का खतरा क्यों बढ़ जाता है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- खोया में किस तरह की मिलावट हो सकती है? जवाब- इसमें सिंथेटिक दूध के साथ कई तरह की सस्ती, खराब चीजों की मिलावट हो सकती है। इनमें कुछ फूड आइटम्स होते हैं, जबकि कुछ केमिकल्स हो सकते हैं, जो सेहत के लिए नुकसानदायक हैं। डिटेल ग्राफिक में देखिए– इनका चीजों का इस्तेमाल अलग-अलग मकसद से किया जाता है। पॉइंटर्स से थोड़ा विस्तार से समझिए- सवाल- इन चीजों की मिलावट सेहत के लिए कितनी खतरनाक है? जवाब- इसका सेहत पर शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म मेें बुरा असर पड़ता है। ग्राफिक में सभी हेल्थ रिस्क देखिए-
सवाल- किन लोगों को हेल्थ रिस्क ज्यादा है? जवाब- मिलावटी खोया हर किसी के लिए नुकसानदायक है, लेकिन कुछ लोगों में इसका असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। किन्हें हेल्थ रिस्क ज्यादा होता है, ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या घर पर खोया की शुद्धता जांची जा सकती है? जवाब- घर पर खोया की शुद्धता का सटीक पता लगाना मुश्किल है। कुछ घरेलू तरीकों से मिलावट का शुरुआती अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन पुष्टि के लिए लैब टेस्ट जरूरी है। सवाल- कौन-से घरेलू टेस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद नहीं हैं? जवाब- सोशल मीडिया पर खोये की शुद्धता चेक करने के कई घरेलू तरीके बताए जाते हैं। हालांकि, इनमें से कई तरीकों को वैज्ञानिक रूप से भरोसेमंद नहीं माना जा सकता है। उदाहरण के लिए- हथेली पर रगड़कर सूंघना दावा किया जाता है कि असली खोये से घी जैसी खुशबू आती है। हालांकि, मिलावटखोर फ्लेवरिंग एजेंट्स मिलाकर इस स्मेल की नकल कर सकते हैं। गोली बनाना या फटना एक और दावे के मुताबिक, हथेली पर खोये की गोली बनाते समय उसमें दरारें पड़ें तो वह नकली है। लेकिन यह खोये में मौजूद नमी और उसे बनाने के तरीके पर भी निर्भर करता है। चीनी के साथ गर्म करना खोये को चीनी के साथ गर्म करने पर पानी निकलने को मिलावट का संकेत माना जाता है। जबकि तापमान, नमी और खोये की क्वालिटी के कारण भी ऐसा हो सकता है। सवाल- मिलावट का पता लगाने वाले कौन-से टेस्ट वैज्ञानिक रूप से मान्य हैं? जवाब- मिलावट की पहचान के लिए अलग-अलग लैब टेस्ट किए जाते हैं, जैसेकि- टेस्ट-1: आयोडीन स्टार्च टेस्ट टेस्ट-2: डिटर्जेंट टेस्ट टेस्ट-3: यूरिया टेस्ट सवाल- ये कैसे सुनिश्चित करें कि खोया मिलावटी न हो? जवाब- इसका सबसे अच्छा तरीका है कि खोया घर पर बनाएं। अगर बाजार से खरीद रहे हैं तो भरोसेमंद दुकान से या भरोसेमंद ब्रांड का ही खरीदें। साथ ही रंग, स्मेल और बनावट में किसी तरह की असामान्यता दिखे तो न खरीदें। सवाल- खोया का दूसरा सुरक्षित विकल्प क्या है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- मिल्क पाउडर और दूध इवैपोरेटेड मिल्क फुल क्रीम दूध सवाल- रक्षाबंधन पर मिठाई खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखें? जवाब- मिठाई खरीदते समय सिर्फ स्वाद नहीं, उसकी क्वालिटी और सेफ्टी पर भी ध्यान देना जरूरी है। ग्राफिक में सभी जरूरी सावधानियां देखिए - सवाल- अगर मिलावटी खोया खा लिया है तो कौन-से लक्षण दिखने पर डॉक्टर से संपर्क करें? जवाब- इन स्थितियों में डॉक्टर से कंसल्ट करें- रक्षाबंधन पर मिठाइयां सिर्फ स्वाद नहीं, रिश्तों की मिठास का भी प्रतीक होती हैं। इसलिए यह जानना उतना ही जरूरी है कि मिठाई किस चीज से बनी है, जितना यह कि वह कितनी स्वादिष्ट है। थोड़ी-सी जागरूकता रिस्क को कम कर सकती है और त्योहार को सुरक्षित बना सकती है। ………………………….. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- ‘एनालॉग पनीर’ पांच राज्यों में बैन:ये डेयरी प्रोडक्ट नहीं है, जानें कैसे बनता है, खरीदते हुए क्या सावधानी बरतें हाल ही में उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और गुजरात की सरकारों ने ‘एनालॉग पनीर’ के प्रोडक्शन, बिक्री और डिस्ट्रीब्यूशन पर बैन लगा दिया है। दरअसल, राज्यों में कई जगह इसे डेयरी पनीर बताकर बेचा जा रहा था। इससे उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी हो रही थी। पूरी खबर पढ़ें…
Continue reading on the app
पूरी दुनिया में मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती का एक बड़ा रणनीतिक लाभ भारत को मिलने जा रहा है और यह घटनाक्रम अमेरिका समेत पूरे पश्चिमी जगत के लिए चौंकाने वाला है। हम आपको बता दें कि भारत और रूस के बीच उभरती परमाणु साझेदारी मात्र कोई बिजली उत्पादन का समझौता नहीं है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, अत्याधुनिक परमाणु तकनीक, छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, बड़े परमाणु संयंत्रों और उच्च तकनीकी विनिर्माण के जरिए भारत की सामरिक शक्ति को नई ऊंचाई देने वाला समीकरण बनने जा रही है। देखा जाये तो ऐसे समय में जबकि पश्चिमी देश वैश्विक ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तब भारत और रूस के बीच परमाणु सहयोग का नई दिशा पकड़ना भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा संदेश है। यह साझेदारी भारत को केवल ऊर्जा की अतिरिक्त क्षमता नहीं देगी, बल्कि उसे तकनीकी आत्मनिर्भरता, औद्योगिक विस्तार और रणनीतिक स्वायत्तता की उस स्थिति तक पहुंचाने में मदद कर सकती है, जहाँ नई दिल्ली वैश्विक शक्ति संतुलन में कहीं अधिक मजबूत और निर्णायक भूमिका निभाए।
हम आपको बता दें कि भारत के परमाणु क्षेत्र में हाल के नियामकीय बदलावों ने विदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी के लिए नए अवसर खोले हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा लाभ उस देश को मिलने की संभावना है, जिसके पास केवल डिजाइन नहीं, बल्कि वास्तविक परिचालन अनुभव भी मौजूद है। रूस इस दौड़ में इसलिए आगे दिखाई देता है क्योंकि उसके पास बड़े परमाणु संयंत्रों के साथ-साथ छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के संचालन का व्यावहारिक अनुभव है।
SMR तकनीक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पारंपरिक परमाणु बिजलीघर विशाल निवेश, बड़े भूभाग और लंबी निर्माण अवधि की मांग करते हैं। इसके विपरीत छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर अपेक्षाकृत कम क्षमता वाले, चरणबद्ध तरीके से स्थापित किए जा सकने वाले और विशेष जरूरतों के अनुसार तैनात किए जा सकते हैं। इन्हें दूरदराज के क्षेत्रों, सीमित ग्रिड वाले इलाकों, औद्योगिक क्लस्टरों और ऊर्जा-गहन डेटा सेंटरों के लिए उपयोगी माना जा रहा है।
रूस का अकादमिक लोमोनोसोव इस दिशा में विशेष महत्व रखता है। यह एक तैरता हुआ परमाणु ऊर्जा संयंत्र है, जिसमें दो 35 मेगावाट क्षमता के मॉड्यूल हैं और जिसने वाणिज्यिक संचालन के जरिए फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर की व्यवहार्यता प्रदर्शित की है। भारत जैसे विशाल समुद्री तट वाले देश के लिए यह मॉडल केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक संभावित रणनीतिक विकल्प है। भविष्य में तटीय औद्योगिक क्षेत्रों, बंदरगाहों, द्वीपीय क्षेत्रों और दूरस्थ इलाकों की ऊर्जा जरूरतों के लिए ऐसी तकनीक अत्यंत उपयोगी हो सकती है।
देखा जाये तो भारत-रूस सहयोग का दूसरा बड़ा आधार बड़े परमाणु रिएक्टर हैं। तमिलनाडु का कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र इस साझेदारी की सबसे मजबूत मिसाल है। रूस की VVER तकनीक पर आधारित इकाइयों ने दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग को प्रयोगशाला से निकालकर जमीन पर उतारा है। अब नई पीढ़ी के VVER-1200 जैसे उच्च क्षमता वाले रिएक्टरों और भारत में इनके क्रमिक निर्माण की संभावनाओं पर भी चर्चा का विस्तार हो रहा है।
देखा जाये तो यहां भारत का सबसे बड़ा लाभ केवल अतिरिक्त बिजली क्षमता नहीं है। यदि रूसी डिजाइन वाले परमाणु संयंत्रों और SMR के उपकरणों का स्थानीयकरण भारत में होता है, तो देश परमाणु ऊर्जा का उपभोक्ता भर नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक परमाणु आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बन सकता है। इससे भारतीय कंपनियों को उच्च तकनीकी विनिर्माण, विशेष इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, नियंत्रण प्रणालियों और परमाणु उपकरण निर्माण में अवसर मिलेंगे। यही ‘मेक इन इंडिया’ को परमाणु क्षेत्र में वास्तविक गहराई दे सकता है।
यहां लागत का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की स्वदेशी दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर तकनीक की तुलना में रूसी रिएक्टरों की लागत कुछ अधिक हो सकती है, लेकिन पश्चिमी देशों के कई प्रस्तावित रिएक्टरों की तुलना में रूसी विकल्प अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी माना जाता है। हम आपको बता दें कि परमाणु ऊर्जा में केवल ईंधन की कीमत निर्णायक नहीं होती; निर्माण अवधि, वित्तपोषण की लागत और परियोजना में होने वाली देरी अंतिम लागत को कई गुना बढ़ा सकती है। इसलिए रूस का अनुभव और क्रमिक निर्माण का मॉडल भारत के लिए आर्थिक रूप से भी आकर्षक हो सकता है।
लेकिन इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामरिक निहितार्थ है। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए परमाणु ऊर्जा स्थिर बेसलोड बिजली उपलब्ध कराने का साधन है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत परमाणु संयंत्र चौबीसों घंटे बिजली दे सकते हैं। जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था, डेटा अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और उन्नत विनिर्माण का विस्तार होगा, बिजली की मांग में भारी वृद्धि होगी। ऐसे में परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा सुरक्षा का रणनीतिक स्तंभ बन सकती है।
इसके अलावा, रूस के साथ गहरा परमाणु सहयोग भारत को जो बड़ा लाभ देता है वह है रणनीतिक स्वायत्तता। भारत यदि केवल पश्चिमी प्रौद्योगिकी या किसी एक आपूर्ति शृंखला पर निर्भर रहता है, तो भू-राजनीतिक दबाव उसकी ऊर्जा योजनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के साथ सहयोग भारत को विकल्प देता है और बहुध्रुवीय परमाणु साझेदारी की क्षमता बढ़ाता है। साथ ही, भारत अपने स्वदेशी SMR और परमाणु कार्यक्रमों को भी समानांतर रूप से आगे बढ़ा सकता है।
देखा जाये तो भारत का लक्ष्य अब केवल अधिक बिजली पैदा करना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी परमाणु क्षमता विकसित करना है, जिसमें विदेशी सहयोग से तकनीक, अनुभव और विनिर्माण क्षमता हासिल करते हुए देश धीरे-धीरे डिजाइन, उत्पादन और आपूर्ति में आत्मनिर्भर बने। रूस के साथ साझेदारी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पुल बन सकती है।
बहरहाल, आने वाले वर्षों में भारत-रूस परमाणु सहयोग का असली मूल्य मेगावाट में नहीं, बल्कि उस रणनीतिक क्षमता में मापा जाएगा जो भारत को ऊर्जा-सुरक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और वैश्विक परमाणु उद्योग में अधिक प्रभावशाली बनाएगी। यदि स्थानीयकरण, लागत नियंत्रण, सुरक्षा मानकों और स्वदेशी क्षमता निर्माण के बीच सही संतुलन बनाया गया, तो यह साझेदारी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उसकी सामरिक शक्ति को भी नई ऊंचाई दे सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
Continue reading on the app