सवाल- मैं 28 साल का हूं और पिछले दो साल से एक लड़की के साथ रिश्ते में हूं। हमें शादी करनी है, लेकिन करियर की वजह से अभी कम-से-कम तीन साल तक शादी संभव नहीं है। मेरी पार्टनर चाहती है कि हम पहले कुछ वक्त साथ रहकर देखें, ताकि शादी से पहले एक-दूसरे को बेहतर समझ सकें। मुझे यह बात कुछ हद तक सही भी लगती है। कुछ दोस्त भी कहते हैं कि साथ रहने से शादी के बाद होने वाली कई समस्याएं पहले ही समझ में आ जाती हैं, लेकिन हमारे परिवार इसके पक्ष में नहीं हैं। मैं उलझन में हूं कि क्या सचमुच लिव-इन में रहने से रिश्ता मजबूत होता है या इससे नई समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं? हमें क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट- डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आज के समय में यह सवाल बहुत से युवाओं के मन में आता है। करियर, आर्थिक जिम्मेदारियां और बदलती जीवनशैली की वजह से कई कपल शादी टालते हैं। ऐसे में कुछ लोग लिव-इन रिलेशनशिप को एक ‘ट्रायल’ की तरह देखते हैं। उनका मानना है कि साथ रहने से शादी से पहले एक-दूसरे की आदतें, स्वभाव और उम्मीदें बेहतर तरीके से समझी जा सकती हैं। लेकिन यह तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। कुछ रिश्तों में लिव-इन से समझ और भरोसा बढ़ता है, जबकि कुछ में नए विवाद और असमंजस भी पैदा हो जाते हैं। इसलिए यह तय करने का कोई एक फॉर्मूला नहीं है कि लिव-इन हर रिश्ते के लिए सही है। रिश्ते की मजबूती इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि दोनों लोग कितने परिपक्व हैं, कितना खुलकर संवाद करते हैं और आपसी मतभेदों को कैसे संभालते हैं। लिव-इन से क्या फायदे हो सकते हैं? अगर दोनों साथी समान सोच, सम्मान और स्पष्ट उम्मीदों के साथ रहते हैं तो कुछ सकारात्मक बातें सामने आ सकती हैं, जैसेकि– लेकिन क्या इससे रिश्ता अपने-आप मजबूत होता है? नहीं। शोध बताते हैं कि सिर्फ साथ रहने से रिश्ता मजबूत और सफल नहीं होता। अगर पहले से ही रिश्ते में भरोसे की कमी, सम्मान की कमी या संवाद की समस्या है तो लिव-इन इन्हें खत्म नहीं करता। कई बार ये समस्याएं और ज्यादा मुखर होकर सामने आने लगती हैं। वहीं जिन रिश्तों में ये मूल्य पहले से मौजूद होते हैं, वे लिव–इन के बगैर भी आपसी भरोसा, सम्मान और एक–दूसरे के प्रति मानवीयता बनाए रखते हैं। संक्षेप में कहें तो लिव-इन कोई ‘रिलेशनशिप टेस्ट’ नहीं है, बल्कि यह पहले से मौजूद रिश्ते का ही विस्तार है। लिव-इन में कौन-सी नई चुनौतियां आ सकती हैं? एक-दूसरे के साथ रहने का मतलब सिर्फ रोमांस नहीं होता। इसमें रोजमर्रा की जिंदगी भी शामिल होती है। इसलिए साथ रहने पर इन कारणों से तनाव बढ़ सकता है, जैसेकि- इसीलिए साथ रहने से पहले इन मुद्दों पर गंभीर और स्पष्ट बातचीत बहुत जरूरी है। क्या परिवार की चिंता को नजरअंदाज करना चाहिए? मेरी समझ से ऐसा नहीं करना चाहिए। भारतीय समाज में परिवार रिश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। अगर परिवार का विरोध है तो उसे सिर्फ पुरानी सोच कहकर खारिज करना ठीक नहीं है। आपको परिवार से बात करनी चाहिए और समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनकी चिंताएं क्या हैं, जैसेकि– अगर परिवार बातचीत के लिए तैयार है तो सम्मानजनक संवाद बेहतर रास्ता हो सकता है। अगर शादी तीन साल बाद करनी है तो क्या करें? आपके मामले में सबसे पहले तो यह तय करें कि लिव–इन का उद्देश्य क्या है। अगर उद्देश्य सिर्फ यह है कि "देखते हैं रिश्ता चलता है या नहीं," तो यह सोच रिश्ते में असुरक्षा पैदा कर सकती है। लेकिन अगर दोनों शादी को लेकर प्रतिबद्ध हैं और सिर्फ परिस्थितियों की वजह से इंतजार कर रहे हैं, तब भी कुछ जरूरी बातों पर पहले सहमति बनानी चाहिए। क्या लिव-इन के बिना भी रिश्ता मजबूत हो सकता है? बिल्कुल। किसी रिश्ते की मजबूती इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कपल साथ रह रहा है या नहीं। लिव-इन से रोजमर्रा की जिंदगी को करीब से समझने का मौका मिल सकता है, लेकिन रिश्ते की समझ और परिपक्वता दूसरे तरीकों से भी विकसित की जा सकती है। खासकर अगर कपल शादी को लेकर गंभीर है, तो लिव-इन को रिश्ते की मजबूती के लिए जरूरी मानना सही नहीं होगा। शादी से पहले दोनों पार्टनर एक-दूसरे को अलग-अलग परिस्थितियों में देखकर भी काफी कुछ समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए- इन बातों को समझने के लिए ये स्टेप्स मददगार हो सकते हैं- खुलकर बातचीत करें: शादी, बच्चे, करियर, पैसे, परिवार, रहने की जगह और भविष्य की प्राथमिकताओं पर पहले ही बात करें। साथ में मुश्किल परिस्थितियां देखें: सिर्फ अच्छे समय में नहीं, बल्कि तनाव या किसी समस्या के दौरान भी पार्टनर का व्यवहार देखें–समझें। कुछ यात्राएं साथ करें: इससे निर्णय लेने, खर्च करने, समय प्रबंधन और छोटी-छोटी असहमतियों को संभालने का तरीका समझ आता है। आर्थिक सोच समझें: कमाई, खर्च, बचत, कर्ज और भविष्य की आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर दोनों की सोच कितनी मिलती है, इस पर बात करें। घर और परिवार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करें: शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियां कैसे बांटेंगे और दोनों परिवारों की भूमिका क्या होगी, यह स्पष्ट करें। एक-दूसरे को सामाजिक परिस्थितियों में देखें: पार्टनर अपने दोस्तों, परिवार, सहकर्मियों और दूसरे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, इससे भी उसके व्यक्तित्व को समझने में मदद मिलती है। प्री-मैरिटल काउंसलिंग: इसमें कपल अपनी अपेक्षाओं, मतभेदों और भविष्य की योजनाओं पर व्यवस्थित तरीके से बातचीत कर सकता है। किन स्थितियों में लिव-इन से बचना चाहिए? अगर इनमें से कोई स्थिति हो तो पहले रिश्ते पर काम करना ज्यादा जरूरी है- ऐसी परिस्थितियों में साथ रहने से समस्या का समाधान नहीं होता है। आपके लिए क्या बेहतर होगा? आप दोनों शादी करना चाहते हैं और रिश्ता गंभीर है। इसलिए फैसला जल्दबाजी में या दोस्तों के अनुभवों को देखकर न लें। पहले बैठकर इन बातों पर खुलकर चर्चा करें— अगर इन सवालों के जवाब स्पष्ट हैं, तभी अगले कदम के बारे में सोचें। जरूरत महसूस हो तो किसी रिलेशनशिप काउंसलर या प्री-मैरिज काउंसलर से भी बात करें। कई बार एक निष्पक्ष एक्सपर्ट व्यक्ति रिश्ते से जुड़े ऐसे पहलुओं को सामने ला देता है, जिन पर कपल ने पहले कभी विचार नहीं किया होता। अंतिम बात लिव-इन रिलेशनशिप न तो रिश्ते की सफलता की गारंटी है और न ही असफलता की वजह। यह सिर्फ साथ रहने का एक तरीका है। रिश्ते की असली नींव भरोसा, सम्मान, संवाद, भावनात्मक सुरक्षा और साझा जिम्मेदारी होती है। यदि ये चीजें मजबूत हैं तो रिश्ता बिना लिव-इन के भी सफल हो सकता है, और यदि ये कमजोर हैं तो सिर्फ साथ रहने से समस्या हल नहीं होती है। ………. ये खबर भी पढ़ें रिलेशनशिप एडवाइज- डेटिंग एप पर हसबैंड ढूंढ रही हूं:लेकिन यहां फ्रॉड हैं, अपने बारे में झूठ बताते हैं, सही आदमी को कैसे पहचानूं ऑनलाइन डेटिंग अब शादी के लिए पार्टनर खोजने का एक सामान्य तरीका बन चुकी है। कई बार यहां लोगों को अच्छे रिश्ते मिलते भी हैं। लेकिन फर्जी प्रोफाइल, गलत जानकारी, कैटफिशिंग और आर्थिक ठगी के मामले भी लगातार सामने आते हैं। पूरी खबर पढ़ें…
Continue reading on the app
बांग्लादेश आज अपने इतिहास के एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जिसे कूटनीतिक और राजनीतिक विश्लेषक 'चौराहे' का नाम दे रहे हैं। सत्ता के तख्तापलट, व्यापक छात्र आंदोलनों और एक दीर्घकालिक शासन के अचानक अंत के बाद, यह दक्षिण एशियाई राष्ट्र वर्तमान में एक अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जब कोई देश ऐसे चौराहे पर खड़ा होता है, तो सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही उठता है कि 'जाए तो जाए कहां?' क्या यह देश एक पूर्ण, पारदर्शी और समावेशी लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा, या फिर यह राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक मंदी और आंतरिक संघर्षों के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएगा जिससे निकलना आने वाले दशकों तक मुश्किल हो जाएगा? यह संपादकीय इसी गंभीर प्रश्न के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करता है, जिसमें राजनीतिक पुनर्गठन, प्रशासनिक चुनौतियां, आर्थिक संकट, सामाजिक ताना-बाना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल समीकरण शामिल हैं।
अगस्त 2024 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के पतन के बाद, बांग्लादेश ने नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार की स्थापना देखी। इस बदलाव को देश की जनता, विशेषकर युवाओं ने 'दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन' या 'सच्ची मुक्ति' का नाम दिया। छात्र आंदोलनों ने जिस तरह एक शक्तिशाली शासन को उखाड़ फेंका, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। लेकिन सत्ता बदल देना जितना चुनौतीपूर्ण होता है, व्यवस्था को संभालना और एक नई पारदर्शी प्रणाली का निर्माण करना उससे कहीं अधिक जटिल होता है। शुरुआती दौर में जो उत्साह और उम्मीदें थीं, वे धीरे-धीरे प्रशासनिक और व्यावहारिक चुनौतियों के धरातल पर आकर थमती दिखाई दे रही हैं। अंतरिम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह देश में सामान्य स्थिति कब और कैसे बहाल करे, और एक ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत करे जो निष्पक्ष, पारदर्शी और सर्वस्वीकार्य हो।
जब एक लंबा राजनीतिक ढांचा अचानक ढह जाता है, तो देश में एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो जाता है। बांग्लादेश वर्तमान में इसी शून्यता से जूझ रहा है। अवामी लीग के कमजोर होने के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां राजनीतिक पटल पर फिर से सक्रिय हो गई हैं। इस चौराहे पर खड़ा बांग्लादेश अगर सही दिशा में कदम बढ़ाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करना होगा। देश में एक ऐसे स्वतंत्र और शक्तिशाली चुनाव आयोग की आवश्यकता है, जिस पर सभी राजनीतिक दलों और आम जनता को पूरा भरोसा हो। अतीत में चुनावों की निष्पक्षता पर लगे दागों को धोना इस नए आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
इसके साथ ही, केवल सरकार बदल देना काफी नहीं है। जब तक पुलिस, न्यायपालिका और नौकरशाही का राजनीतिकरण बंद नहीं होगा, तब तक किसी भी नए लोकतांत्रिक ढांचे की नींव कमजोर ही रहेगी। अंतरिम सरकार ने इसके लिए विभिन्न आयोगों का गठन किया है, लेकिन इन सुधारों को जमीन पर उतारना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है। देश में एक ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना होगा जहां हर विचारधारा को अपनी बात रखने का मौका मिले, बशर्ते वह लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में हो। प्रतिशोध की राजनीति को छोड़कर समावेशी राजनीति को अपनाना ही बांग्लादेश को इस चौराहे से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है।
राजनीतिक उथल-पुथल का सबसे सीधा और गहरा असर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बांग्लादेश, जो कभी विकास दर के मामले में दक्षिण एशिया का चमकता सितारा माना जाता था, आज गंभीर आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। लंबे समय तक चले कर्फ्यू, हड़तालों, इंटरनेट शटडाउन और कारखानों के बंद रहने के कारण देश की आर्थिक रीढ़ को भारी नुकसान पहुंचा है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ उसका रेडीमेड गारमेंट उद्योग है। देश के कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है और यह लाखों लोगों, विशेषकर महिलाओं को रोजगार देता है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण कई विदेशी खरीदारों ने अपने ऑर्डर वियतनाम, भारत और कंबोडिया जैसे देशों की तरफ मोड़ दिए हैं। अगर बांग्लादेश को अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो उसे जल्द से जल्द इन कारखानों में पूर्ण सुरक्षा और निर्बाध उत्पादन सुनिश्चित करना होगा ताकि वैश्विक बाजारों में उसका खोया हुआ भरोसा वापस लौट सके।
आर्थिक मोर्चे पर दूसरी बड़ी समस्या देश का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो पिछले कुछ समय से लगातार दबाव में है। इसके साथ ही, बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गैर-निष्पादित आस्तियां यानी डूबता हुआ कर्ज एक गंभीर संकट बन चुका है। केंद्रीय बैंक और अंतरिम सरकार वित्तीय अनुशासन लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक बैंकिंग प्रणाली से भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक आर्थिक स्थिरता एक दूर का सपना बनी रहेगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से मिलने वाली वित्तीय सहायता इस समय देश के लिए एक संजीवनी की तरह है, लेकिन इसके साथ आने वाली शर्तें भी देश की आंतरिक नीतियों को प्रभावित कर रही हैं।
आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी समस्या रसोई का बजट और रोजगार है। आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतें और दैनिक जीवन का खर्च आम जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहा है। छात्र आंदोलन की मुख्य मांग ही रोजगार के समान अवसर और कोटा प्रणाली में सुधार थी। अब जब नई व्यवस्था आ चुकी है, तो युवाओं को रोजगार के वास्तविक अवसर प्रदान करना सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि युवाओं की उम्मीदें निराशा में बदलीं, तो सामाजिक अशांति का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
किसी भी देश की प्रगति उसके सामाजिक सद्भाव और आंतरिक सुरक्षा पर टिकी होती है। सत्ता परिवर्तन के बाद के हफ्तों में बांग्लादेश ने कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भारी शिथिलता देखी। पुलिस थानों पर हमले, पुलिसकर्मियों की अनुपस्थिति और प्रशासनिक पंगुता के कारण देश में एक प्रकार की अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। हालांकि धीरे-धीरे स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन पूरी तरह से सुरक्षित माहौल का निर्माण होना अभी बाकी है। इस बदलाव के दौर में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय, के खिलाफ हिंसा और उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं सामने आईं। हालांकि नागरिक समाज और छात्रों ने इन संपत्तियों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखलाएं बनाईं, लेकिन इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि को प्रभावित किया है। एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बांग्लादेश का निर्माण तभी संभव है जब हर नागरिक, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो, खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे।
इसके अलावा, अतीत के शासकों और उनके समर्थकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना स्वाभाविक है, लेकिन यह कार्रवाई न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए, न कि प्रतिशोध की भावना से। यदि नई व्यवस्था भी वही गलतियां दोहराती है जो पुरानी व्यवस्था ने की थीं, तो देश में लोकतंत्र का आगमन केवल एक छलावा बनकर रह जाएगा। समाज में शांति और स्थिरता तभी लौट सकती है जब लोगों को यह विश्वास हो कि नई सरकार निष्पक्षता और न्याय के पथ पर चल रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बांग्लादेश एक बेहद महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है। बंगाल की खाड़ी में अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण बांग्लादेश हमेशा से वैश्विक शक्तियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। भारत, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को संतुलित करना अंतरिम और आने वाली चुनी हुई सरकार के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी। भारत और बांग्लादेश का इतिहास, संस्कृति और भूगोल एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध अपने सबसे सुनहरे दौर में थे। सत्ता परिवर्तन के बाद, भारत के लिए बांग्लादेश में एक नया कूटनीतिक परिदृश्य सामने आया है। बांग्लादेश की नई सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और समानता के आधार पर मजबूत संबंध बनाए रखना चाहती है। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, तीस्ता जल विवाद, व्यापार और पारगमन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिनका समाधान परिपक्व कूटनीति के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। भारत के लिए भी यह जरूरी है कि वह बांग्लादेश की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करे और वहां की नई व्यवस्था के साथ रचनात्मक जुड़ाव बनाए रखे।
दूसरी तरफ, चीन बांग्लादेश के बुनियादी ढांचे के विकास में एक बड़ा साझेदार रहा है। वह इस बदलाव के दौर में भी अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। इसके समानांतर, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने बांग्लादेश में लोकतांत्रिक सुधारों और मानवाधिकारों की बहाली का पुरजोर समर्थन किया है। बांग्लादेश को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह महाशक्तियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा न बने, बल्कि अपनी विदेश नीति को देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों के अनुरूप संचालित करे। किसी भी एक गुट की तरफ झुकाव देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
"चौराहे पर बांग्लादेश, जाए तो जाए कहां?" इस प्रश्न का उत्तर किसी एक व्यक्ति या एक सरकार के पास नहीं है। इसका उत्तर बांग्लादेश की सामूहिक चेतना, उसके राजनीतिक दलों की परिपक्वता और उसके युवाओं के संकल्प में छिपा है। बांग्लादेश के पास इतिहास रचने और एक नए, समृद्ध व लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में उभरने का यह एक अभूतपूर्व अवसर है। लेकिन इस मार्ग पर चलते हुए उसे अति-राष्ट्रवाद, प्रतिशोध की राजनीति, धार्मिक कट्टरता और आर्थिक कुप्रबंधन के गड्ढों से बचना होगा।
इस चौराहे से आगे बढ़ने का केवल एक ही सही रास्ता है: एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना जहां कानून का शासन सर्वोपरि हो, जहां अर्थव्यवस्था का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, और जहां हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी मिले। दुनिया उम्मीद और कौतूहल के साथ बांग्लादेश की ओर देख रही है, और यह समय बांग्लादेश के नेतृत्व के लिए अपनी दूरदर्शिता और दृढ़ता साबित करने का है।
- अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
Continue reading on the app