एक समय ऐसा भी आएगा जब दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका के सबसे घातक पेट्रिएट मिसाइल सिस्टम को दुनिया डंप करना शुरू कर देगी और उसकी जगह चुनाव होगा भारत में बने आकाश और ब्रह्मोस मिसाइल का। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है बल्कि हकीकत बन चुकी है। आज पूरी दुनिया भारत के स्वदेशी मिसाइल तकनीक की कायल हो चुकी है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब हमने अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता दिखाई तब शायद दुनिया को अंदाजा नहीं था कि भारत बहुत जल्द ग्लोबल डिफेंस मार्केट का पावर हाउस बनने वाला है। अब खबर आई है कि कई देशों ने अमेरिकी पेट्रियट सिस्टम की बजाय भारत की आकाश मिसाइल को अपना प्रेफरेबल विकल्प चुन लिया है।
सिर्फ आकाश ही नहीं हमारी ब्रह्मोस की दहाड़ भी इतनी तेज है कि इसकी ऑर्डर बुक ने $6 बिलियन का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है। दरअसल दुनिया भर के डिफेंस जनरल्स और हालिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के एक पेट्रिएट मिसाइल इंटरसेप्टर को बनाने की लागत लगभग ₹60 करोड़ यानी कि 7 बिलियन आती है। अब इसके मुकाबले भारत की डीआरडीओ द्वारा तैयार आकाश मिसाइल को देखिए। इसे बनाने का खर्च मात्र 4 से ₹4.5 करोड़ यानी 0.5 मिलियन है। यानी सीधा-सीधा 14 गुना का अंतर। अब आप सोच रहे होंगे कि क्या सस्ती होने से क्वालिटी पर फर्क पड़ता है? तो जवाब है बिल्कुल नहीं।
आकाश मिसाइल सिस्टम सिर्फ एक मिसाइल नहीं बल्कि एक कंप्लीट इकोसिस्टम है। इसमें आधुनिक रडार, कमांड, कंट्रोल और लांचर शामिल है। यह लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों, यूएईवी और क्रूज मिसाइलों को पलक झपकते ही तबाह करने की क्षमता रखता है। अब सवाल यह है कि आखिर दुनिया पेट्रियट को क्यों डिच कर रही है? देखिए इसकी एक बड़ी वजह हालिया वैश्विक युद्ध है। रूस यूक्रेन हो या इजराइल, ईरान संघर्ष हर जगह एयर डिफेंस मिसाइलों का इस्तेमाल अनप्रेसिडेंटेड लेवल पर हुआ है। अमेरिका की अपनी रिपोर्ट कहती है कि उनकी पेट्रियट इन्वेंटरी तेजी से खत्म हो रही है। ईरान के खिलाफ ही अमेरिका अपने 1500 से ज्यादा इंटरसेप्टर इस्तेमाल कर चुका है।
Continue reading on the app
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को घोषणा की कि अमेरिका निजी कंपनियों के साथ साझेदारी के ज़रिए वेनेजुएला के 65 अरब बैरल से ज़्यादा तेल भंडार पर ज़्यादातर नियंत्रण हासिल करेगा। उन्होंने इस समझौते को दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी तेल डील बताया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस डील में वेनेज़ुएला के कुल प्रमाणित रिज़र्व का लगभग पांचवां हिस्सा शामिल है। इससे वॉशिंगटन को एक जॉइंट वेंचर में हिस्सेदारी और लागत मूल्य पर तेल खरीदने का अधिकार मिलता है। यह जॉइंट वेंचर ओरिनोको बेल्ट और लेक माराकाइबो में 17 फील्ड्स के लिए 100 साल के कंसेशन (रियायतें) रखेगा। यह घोषणा अमेरिकी सेना द्वारा जनवरी में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेने और उनकी डिप्टी डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यभार संभालने की अनुमति देने के लगभग नौ महीने बाद की गई है।
इस समझौते के बारे में हम क्या जानते हैं
एक अमेरिकी अधिकारी ने AP और ब्लूमबर्ग को बताया कि घोषित ढांचे के तहत, अमेरिका वेनेजुएला में एक निजी ऑपरेटर (जिसका नाम अभी तय नहीं हुआ है) के साथ एक नए जॉइंट वेंचर के प्रभावी उत्पादन का 55% हिस्सा नियंत्रित करेगा। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह वेंचर सऊदी अरामको के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉर्पोरेट रिज़र्व होल्डर बन जाएगा। अधिकारी ने कहा कि तेल अमेरिका को लागत मूल्य पर बेचा जाएगा और इसे देश के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व (आपातकालीन भंडार) और सैन्य इस्तेमाल के लिए भेजा जाएगा। रोड्रिगेज़ ने टेलीग्राम पर इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि इसमें 17 रणनीतिक क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें लगभग 65 अरब बैरल का रिज़र्व है। उन्होंने कहा कि इस डील से 100 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश आएगा और वेनेज़ुएला सरकार को 209 अरब डॉलर का टैक्स रेवेन्यू मिलेगा। उन्होंने इस समझौते को "ऐतिहासिक" बताया और कहा कि इसका "हमारे देश के पुनरुत्थान पर बड़ा असर पड़ेगा।
Continue reading on the app