PM Modi और भारत की मदद को Nepal ने सराहा, बाढ़ राहत और पुनर्निर्माण में मिला बड़ा सहयोग
नेपाल ने देश में आयी विनाशकारी बाढ़ और 600 से अधिक लोगों की जान जाने के कारण उत्पन्न संकट के समय मदद करने के लिए भारत के प्रयासों की सराहना करते हुए शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘अत्यंत उदार’ बताया। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने पीटीआई वीडियो से बातचीत में कहा कि भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह पुनर्निर्माण कार्यों के लिए उदारता से सहायता देगी। नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिम नद के तटबंध तोड़ देने के कारण बुधवार को मध्य नेपाल में भीषण जल प्रवाह और मलबा बहकर आने से कई बस्तियां और गांव, सैकड़ों मकान, वाहन, सड़क, पुल के साथ साथ कई पन बिजली परियोजनाएं भी बह गयीं।
इस त्रासदी में 2400 से अधिक लोग अभी तक लापता हैं और करीब 2500 लोगों को बचावकर्ताओं ने बचाया है। बचावकर्ता मौसम की मार के बीच लगातार प्रयास कर रहे हैं। भारत ने बुधवार से नेपाल के बाढ़ पीड़ित इलाकों में 57.6 टन राहत सामग्री भिजवाई है।
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काठमांडू के अनुरोध के बाद 11 सदस्यीय भारतीय दल पहुंच चुका है जिसमें चिकित्सा अधिकारी एवं सुरंग से बचाव करने के कार्यों में विशेषज्ञ शामिल हैं जो स्थानीय अधिकारियों की मदद करेंगे। बाढ़ की स्थिति और पुनर्निर्माण के बारे में पूछे जाने पर नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने कहा, हम इस संकट से चरणों में निपट रहे हैं। हमारी फौरी प्राथमिकता उन लोगों को बचाना है जिन्हें बचाया जा सकता है, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जो पनबिजली संयंत्रों में फंसे हुए हैं।
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नेपाली सेना ने 1,930 लोगों को, जिनमें कई विदेशी भी शामिल हैं, सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान धुनचे, रसुवा और स्याफ्रु बेसी जैसे इलाकों में हवाई रास्ते से राहत सामग्री पहुँचाने पर भी है, क्योंकि सड़कें बंद होने की वजह से ये इलाके कट गए हैं। नेपाल के वित्त मंत्री का कहना है कि एक बड़ी चुनौती उन शवों को संभालना है जो बहकर चितवन और नवलपुर की ओर और शायद सीमा के पार चले गए हैं।
अगले चरण में जल्द संकट से उबरने पर ध्यान दिया जाएगा, जिसमें अस्थायी आश्रय और काम के बदले नकद (कैश-फॉर-वर्क) जैसे कार्यक्रम शामिल होंगे; इसके बाद पुनर्निर्माण का मुश्किल काम होगा। जब उनसे पूछा गया कि क्या नेपाल दूसरे देशों से मदद लेगा, तो वागले ने कहा, बिल्कुल। भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी बहुत उदार रहे हैं।
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2015 में जब भूकंप आया था, तब मैं सरकार में था और मुझे याद है कि भारत सरकार की उदारता वास्तव में सराहनीय थी।’’ उन्होंने कहा कि इस समय नयी दिल्ली से विशिष्ट सामान भी हवाई जहाज़ से मंगाया गया है। वागले ने कहा कि पुनर्निर्माण के लिए भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह उदारता से मदद करेगी। उन्होंने कहा कि सभी पड़ोसी देशों से भी ऐसी ही मदद मिल रही है।
Donald Trump ने Lake Ontario का नाम बदलकर Lake America करने का दिया आदेश
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 27 अगस्त, 2026 को एक कार्यकारी आदेश जारी कर ‘‘लेक ओंटारियो’’ का नाम बदलकर “लेक अमेरिका” करने का आदेश दिया। उन्होंने दावा किया कि उनका प्रशासन पहले ही ‘‘उन सभी संबंधित लोगों को सूचित कर चुका है, जिन्हें सूचित किया जाना आवश्यक है।’’ ऐसा पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने किसी स्थान का नाम बदला हो। वर्ष 2025 में उन्होंने एक कार्यकारी आदेश जारी कर मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ करने और देश की सबसे ऊंची चोटी अलास्का स्थित डेनाली का नाम फिर से ‘माउंट मैकिनले’ करने का आदेश दिया था।
कुछ लोगों को हालांकि इस तरह नाम बदलना देश के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों की तुलना में कम महत्वपूर्ण लग सकता है, लेकिन अमेरिका में स्थानों के नाम बदलने की एक औपचारिक प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को गंभीरता से लिया जाता है। आमतौर पर लोगों को भ्रमित न होना पड़े, इसलिए सरकार आधिकारिक और सर्वमान्य नामों का इस्तेमाल करती है। अमेरिका में, स्थानों के नामों का मानकीकरण अमेरिकी भौगोलिक नामकरण बोर्ड द्वारा किया जाता है, जो अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण का हिस्सा है।
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यह एजेंसी मानचित्र बनाने का काम करती है। ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकारी आदेश में अमेरिकी भौगोलिक नामकरण बोर्ड से कहा था कि वह “दूरदर्शी और देशभक्त अमेरिकियों के योगदान का सम्मान करे” और इसे ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों और प्रक्रियाओं में बदलाव करे। ‘लेक ओंटारियो’ उन कई बड़ी झीलों में से एक है, जिनके साथ अमेरिका और कनाडा की सीमाएं लगती हैं।
किसी स्थान का नाम बदलने की शुरुआत स्थानीय स्तर पर होती है। राज्य या काउंटी के लोग नाम बदलने का प्रस्ताव रखते हैं और इसके समर्थन में लोगों को लामबंद करते हैं। हर राज्य में इसकी प्रक्रिया अलग-अलग होती है।
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मिनेसोटा ने 2018 में मिनियापोलिस की एक बड़ी झील का नाम बदलकर ‘ब्डे माका स्का’ कर दिया था। डेनाली का नाम बदलने में 40 साल लग गये थे। इसका नाम 19वीं सदी के अंत में रखे गए नाम ‘माउंट मैकिनले’ से बदलकर डेनाली किया गया था।
अलास्का राज्य ने 1975 में नाम बदलने का अनुरोध किया था, लेकिन भौगोलिक नामकरण बोर्ड ने इसपर कोई कार्रवाई नहीं की। वर्ष 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आंतरिक मामलों के विभाग के लिए एक नयी प्रमुख सैली ज्वेल को नियुक्त किया। जिस समय ओबामा अगस्त 2015 के अंत में अलास्का की यात्रा पर गए, उसी समय ज्वेल ने नाम बदलने को आधिकारिक घोषित कर दिया।
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उन्होंने ऐसा एक ऐसे कानून के तहत किया, जो आंतरिक मामलों के मंत्री को किसी नाम को बदलने की अनुमति देता है, यदि बोर्ड उचित समय के भीतर उस प्रस्ताव पर कार्रवाई नहीं करता। मेक्सिको की खाड़ी का नाम बदलना, हालांकि एक अलग तरह का मामला है, क्योंकि यह अमेरिका की सीमाओं के भीतर स्थित किसी भौगोलिक स्थान का नाम बदलने से अलग है। मेक्सिको की पूरी खाड़ी अमेरिका के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।
तट से समुद्र की ओर शुरुआती 12 मील उस देश के क्षेत्र का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन उसके बाहर का क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र है। भौगोलिक नामकरण बोर्ड ने हालांकि आधिकारिक अमेरिकी मानचित्रों में इसका नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ कर दिया है, और भले ही वह ओंटारियो झील के नाम में बदलाव को मंजूरी दे दे, लेकिन स्थानों के नाम तय करने के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय बोर्ड नहीं है। हर देश यह तय करता है कि वह किसी स्थान को किस नाम से पुकारेगा और अमेरिका के पास दूसरे देशों को अपने मानचित्रों पर उन स्थानों के नाम बदलने के लिए मजबूर करने का कोई आधिकारिक तरीका नहीं है।
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