'प्रचार में बच्चे', DMK के दांव पर CM विजय का पलटवार, मद्रास हाईकोर्ट से कहा- रद्दी की टोकरी में डालें याचिका
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और TVK प्रमुख सी. जोसेफ विजय ने अपनी चुनावी जीत को चुनौती देने वाली DMK उम्मीदवार की याचिका के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया है. विजय ने 'रिजेक्ट द प्लेंट' आवेदन दाखिल कर याचिका को शुरुआती स्तर पर खारिज करने की मांग की है. मामला चुनाव प्रचार में बच्चों की कथित भागीदारी से जुड़ा है. विजय की टीम का कहना है कि यह आरोप Representation of the People Act के तहत चुनाव रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है. अदालत 31 अगस्त को मामले को सूचीबद्ध करेगी.
Explainer: नेपाल में इतनी भयानक तबाही क्यों हुई और क्या ग्लेशियर व मोरेन के खतरे की पहले से चेतावनी संभव थी?
26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले और तिब्बत सीमा से लगे ऊंचाई वाले इलाकों में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है- क्या इस आपदा के खतरे को पहले से पहचाना जा सकता था? क्या नीचे रहने वाले लोगों को समय रहते चेतावनी दी जा सकती थी?
किसी ग्लेशियर, चट्टान या पहाड़ी ढलान के टूटने का सटीक समय और स्थान पहले से बता पाना आज भी बेहद मुश्किल है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे खतरों की पहचान संभव नहीं है। ग्लेशियरों की स्थिति, उनके पीछे हटने से बने मोरेन, प्रोग्लेशियल झीलों, अस्थिर ढलानों और नदी घाटियों की निगरानी से संवेदनशील इलाकों को चिन्हित किया जा सकता है।
यही वजह है कि नेपाल की इस त्रासदी के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बाढ़ क्यों आई? सवाल यह भी है कि क्या खतरे के संकेत पहले से पहचाने जा सकते थे और क्या उनसे लोगों को समय रहते आगाह किया जा सकता था?
क्या वैज्ञानिक ऐसी आपदा की पहले से भविष्यवाणी कर सकते हैं?
यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा- पूर्वानुमान (prediction) और पूर्व चेतावनी (early warning) एक ही चीज नहीं हैं।
वैज्ञानिक उपलब्ध आंकड़ों और निगरानी के आधार पर किसी ग्लेशियर, ग्लेशियर झील, पहाड़ी ढलान या नदी घाटी में संभावित खतरे का आकलन कर सकते हैं। सैटेलाइट तस्वीरों, सेंसर, मौसम और नदी के जलस्तर के आंकड़ों तथा जमीन पर निगरानी से इन इलाकों में होने वाले बदलावों को ट्रैक किया जा सकता है।
लेकिन यह सटीक तौर पर बताना कि किसी खास जगह पर ग्लेशियर या चट्टान किस दिन और किस समय टूटेगी, आज भी बेहद मुश्किल है। इसलिए वैज्ञानिक जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और निगरानी पर ज्यादा जोर देते हैं, न कि किसी घटना के सटीक समय की भविष्यवाणी पर।
26 अगस्त की घटना में क्या हुआ था?
USGS के विश्लेषण के अनुसार, 26 अगस्त को स्थानीय समयानुसार सुबह 8:37 बजे दर्ज हुई घटना से इतनी भूकंपीय ऊर्जा पैदा हुई, जो 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर थी। बाद के विश्लेषण में इसका संबंध ग्लेशियर के ढहने से शुरू हुए मलबे के बहाव से जोड़ा गया। यानी इसे सामान्य टेक्टोनिक भूकंप नहीं माना गया।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि वैज्ञानिक इस घटना का सटीक समय पहले से बता सकते थे या नहीं, बल्कि यह है कि:
क्या जोखिम वाले इलाके की पहले से पहचान की जा सकती थी और क्या अचानक आने वाले जलप्रवाह या मलबे के बहाव की चेतावनी नीचे रहने वाले लोगों तक समय रहते पहुंचाई जा सकती थी?
यहीं आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम महत्वपूर्ण हो जाता है। इसका उद्देश्य किसी प्राकृतिक घटना को रोकना नहीं, बल्कि खतरे के संकेत मिलते ही लोगों और प्रशासन को कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय देना है।
आखिर खतरा बनता कैसे है?
यह हिमालयी क्षेत्रों में संभावित खतरे की एक सामान्य प्रक्रिया है; हर घटना में ये सभी चरण एक साथ नहीं होते।
इसे एक आसान श्रृंखला से समझिए:
ग्लेशियर पीछे हटता है → चट्टान और मलबा खुलता है → मोरेन अस्थिर हो सकता है → कुछ परिस्थितियों में पानी जमा हो सकता है→ प्राकृतिक अवरोध बन सकता है → अवरोध टूटता है → पानी और मलबा तेजी से नीचे आता है।
अगर इस दौरान भारी बारिश, बर्फ के तेजी से पिघलने या किसी बड़े हिमस्खलन/रॉकफॉल जैसी घटना का योगदान हो जाए तो बाढ़ की ताकत कई गुना बढ़ सकती है।
ग्लेशियर क्या है और इसके पीछे हटने से खतरा क्यों बढ़ता है?
ग्लेशियर पहाड़ों पर लंबे समय से जमा बर्फ का विशाल द्रव्यमान है, जो अपने वजन और गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे नीचे की ओर बहता/खिसकता है।
तापमान बढ़ने पर ग्लेशियरों का द्रव्यमान कम हो सकता है और वे पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसका असर केवल बर्फ की मात्रा तक सीमित नहीं रहता।
ग्लेशियर के पीछे हटने पर उसके किनारों और तल से चट्टान, बजरी, मिट्टी और गाद का बड़ा हिस्सा खुल जाता है। यही सामग्री आगे चलकर अस्थिर ढलानों और जलाशयों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
मोरेन क्या है?
मोरेन (Moraine) को आसान भाषा में ग्लेशियर का छोड़ा हुआ मलबा कहा जा सकता है।
ग्लेशियर अपने साथ चट्टान, मिट्टी, बजरी और दूसरे अवसाद ला सकता है। इसके आगे बढ़ने या पीछे हटने के दौरान यह सामग्री अलग-अलग हिस्सों में जमा हो जाती है। ऐसे जमाव को मोरेन कहते हैं।
कुछ परिस्थितियों में मोरेन का ढीला मलबा पानी को रोकने वाली प्राकृतिक संरचना का हिस्सा बन सकता है। अगर ऐसी संरचना कमजोर होकर टूटे, तो अचानक जलप्रवाह का खतरा पैदा हो सकता है।
प्रोग्लेशियल झील क्या होती है?
जब ग्लेशियर पीछे हटता है तो उसके सामने या आसपास पानी जमा होकर प्रोग्लेशियल झील (Proglacial Lake) बना सकता है।
यह पानी ग्लेशियर के पिघलने, बारिश और आसपास की बर्फ से आ सकता है। कई बार झील का एक हिस्सा मोरेन या बर्फ से बने प्राकृतिक बांध से घिरा होता है।
ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा खतरा है- प्राकृतिक बांध का टूटना।
अगर बांध टूटता है तो झील का पानी अचानक नीचे की ओर निकल सकता है।
इसी घटना को Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है।
क्या हर ग्लेशियर झील से GLOF का खतरा होता है?
नहीं। यह एक सामान्य GLOF प्रक्रिया है; 26 अगस्त की घटना को अभी सीधे GLOF कहना उचित नहीं है।
किसी झील का आकार बड़ा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह जल्द फटने वाली है। जोखिम कई चीजों पर निर्भर करता है- झील की संरचना, प्राकृतिक बांध की मजबूती, आसपास की ढलानें, उसमें आने वाले पानी की मात्रा और किसी अचानक भूस्खलन या हिमस्खलन की संभावना।
यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए केवल झील की निगरानी करना पर्याप्त नहीं है। पूरे कैचमेंट की निगरानी जरूरी होती है।
ध्यान रहे, 26 अगस्त की नेपाल घटना को अभी सीधे GLOF के रूप में वर्गीकृत करना जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिक फिलहाल ice-rock avalanche और उसके बाद बने संभावित अस्थायी अवरोध की भूमिका की जांच कर रहे हैं।
नेपाल की घटना में मलबे का बहाव इतना खतरनाक क्यों था?
ऊंचाई से आने वाला पानी और मलबा जब नीचे की ओर बहता है तो वह रास्ते में मौजूद ढीली चट्टानों और मलबे को काट सकता है।
इससे पानी में बड़ी मात्रा में पत्थर, बजरी, मिट्टी और गाद मिल जाती है। नतीजा साफ पानी की बाढ़ से अलग होता है।
यह बहाव debris flow यानी मलबे की बेहद घनी और भारी धारा में बदल सकता है, जो रास्ते में आने वाली सड़क, पुल, इमारत या दूसरे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।
यही कारण है कि हिमालय में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि “कितना पानी आ रहा है?” यह भी देखना जरूरी है कि “उस पानी के साथ कितना मलबा नीचे आ सकता है?”
क्या जलवायु परिवर्तन ने इस खतरे को बढ़ाया है?
जलवायु परिवर्तन को इस तरह की हर घटना का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा। किसी खास बाढ़ या ग्लेशियर-ढहने की घटना में स्थानीय मौसम, भू-आकृति, चट्टानों की संरचना और दूसरी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
लेकिन गर्म होता वातावरण हिमालयी क्षेत्र में जोखिम की पृष्ठभूमि जरूर बदल रहा है।
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों का द्रव्यमान कम हो सकता है। बर्फ पिघलने के साथ उन इलाकों में पानी की उपलब्धता और ढलानों की स्थिरता भी बदल सकती है।
इसके अलावा, तापमान बढ़ने से कुछ ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ की जगह बारिश होने की संभावना बढ़ सकती है। बारिश और तेजी से पिघलती बर्फ का पानी मिलकर पहाड़ी ढलानों और मोरेन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
यानी जलवायु परिवर्तन को सीधे “आपदा का कारण” कहने के बजाय इसे कई मामलों में जोखिम बढ़ाने वाला कारक समझना ज्यादा उचित है।
ICIMOD के वैज्ञानिकों ने भी कहा है कि इस खास घटना में जलवायु परिवर्तन की भूमिका तय करने के लिए अभी और विश्लेषण की जरूरत है।
तो क्या 26 अगस्त जैसी तबाही में नुकसान कम किया जा सकता है?
इस सवाल का जवाब फिलहाल सीधा हां या नहीं में देना उचित नहीं होगा।
किसी प्राकृतिक घटना को रोकना संभव नहीं हो सकता। अगर ऊंचाई पर विशाल चट्टान या बर्फ का हिस्सा अचानक टूटता है तो उसे रोकना बेहद मुश्किल है। लेकिन उससे होने वाली मानवीय क्षति को कम करना संभव हो सकता है।
इसके लिए तीन स्तर महत्वपूर्ण हैं:
पहला- खतरे की पहचान।
कौन-सी झील, ग्लेशियर, ढलान और नदी घाटी सबसे अधिक संवेदनशील है?
दूसरा- रियल-टाइम निगरानी।
क्या पानी का स्तर, मौसम, झील का फैलाव, भूस्खलन और नदी का बहाव लगातार मॉनिटर हो रहा है?
तीसरा- तेज चेतावनी।
अगर ऊपर कुछ टूटता है तो नीचे रहने वाले लोगों तक चेतावनी कितनी जल्दी पहुंचती है?
यही तीनों कड़ियां मिलकर एक प्रभावी Early Warning System बनाती हैं।
क्या चेतावनी मिलने के लिए ग्लेशियर का टूटना जरूरी है?
नहीं।
एक बेहतर सिस्टम घटना होने के बाद अलर्ट देने के बजाय खतरे के बढ़ने के संकेत पकड़ने की कोशिश करता है। मसलन, अगर किसी नदी के ऊपरी हिस्से में जलस्तर तेजी से बढ़ रहा हो या किसी ढलान/झील में असामान्य बदलाव दिखाई दे रहा हो, तो उस क्षेत्र को पहले ही हाई-अलर्ट पर रखा जा सकता है।
इसी तरह नदी के ऊपरी हिस्से में अचानक जलस्तर बढ़ने पर नीचे के इलाकों में सायरन, मोबाइल अलर्ट या प्रशासनिक संदेश के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या चेतावनी सिस्टम सीमा के पार काम कर सकता है?
हिमालय की एक बड़ी चुनौती इसकी भौगोलिक और राजनीतिक सीमा है।
ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र एक देश में हो सकता है, जबकि उसी नदी के किनारे हजारों लोग दूसरे देश में रहते हैं। ऐसे में सिर्फ स्थानीय प्रशासन की निगरानी पर्याप्त नहीं होती।
रियल-टाइम डेटा शेयरिंग, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और सीमा-पार अर्ली वार्निंग सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
अगर ऊपर के इलाके में अचानक पानी या मलबे की बड़ी हलचल का पता चलता है तो नीचे के आबादी वाले क्षेत्रों को चेतावनी देने के लिए हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या नेपाल की त्रासदी से सबसे बड़ी सीख यही है?
हां, लेकिन इसे सिर्फ “ग्लेशियर पिघल रहे हैं इसलिए बाढ़ आ रही है” तक सीमित करना इस घटना को बहुत सरल बना देना होगा।
असल कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
गर्म होता वातावरण + पीछे हटते ग्लेशियर + अस्थिर मोरेन + बदलता बारिश का पैटर्न + पहाड़ी ढलानों की अस्थिरता + संकरी नदी घाटियां
इनमें से कई कारक एक साथ काम कर सकते हैं।
इसलिए भविष्य की तैयारी भी केवल बाढ़ नियंत्रण तक सीमित नहीं रह सकती।
सवाल आपदा को रोकने का नहीं, नुकसान घटाने का है
26 अगस्त की नेपाल त्रासदी यह सवाल जरूर छोड़ती है कि क्या ऐसे खतरों को पहले पहचाना जा सकता है।
वैज्ञानिक किसी ग्लेशियर या चट्टान के टूटने का सटीक समय बताने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन जोखिम वाले ग्लेशियर, झील, मोरेन, ढलानों और नदी घाटियों की पहचान, उनकी लगातार निगरानी और तेज अर्ली वार्निंग से आपदा के मानवीय नुकसान को कम करने की संभावना बढ़ाई जा सकती है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “क्या वैज्ञानिक बाढ़ को रोक सकते थे?” बल्कि यह है कि “क्या खतरे को पहले पहचानकर लोगों को समय रहते सुरक्षित जगह पहुंचाया जा सकता था?”
नेपाल की इस त्रासदी का सबसे बड़ा सबक शायद यही है- प्राकृतिक खतरे को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन बेहतर विज्ञान, निगरानी और समय पर चेतावनी से उसके असर को कम किया जा सकता है।
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