Shahi Paneer Recipe: घर पर बनाएं रेस्टोरेंट जैसा शाही पनीर, काजू और इस खास चीज से मिलेगी क्रीमी ग्रेवी
Food At Home On Raksha Bandhan : शाही पनीर बनाने की आसान विधि. घर पर रेस्टोरेंट जैसा स्वाद पाने के लिए पनीर, काजू, टमाटर, प्याज और मसालों का उपयोग करें. ग्रेवी को क्रीमी बनाने के लिए काजू और क्रीम डालें. तैयार शाही पनीर को सर्विंग बाउल में निकालकर ऊपर से धनिया और थोड़ी सी क्रीम से गार्निश करें. गरमा-गरम शाही पनीर को रोटी, चपाती, नान या पराठे के साथ सर्व किया जा सकता है.
Google Mosquito Project: 3.2 करोड़ मच्छर छोड़ने की तैयारी में Google! वजह जानकर रह जाएंगे हैरान
'लोहा ही लोहे को काटता है' वाली कहावत अब विज्ञान की दुनिया में भी सच होती नजर आ रही है। दुनिया भर में डेंगू, जीका और अन्य मच्छरजनित बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच Google से जुड़ी बायोटेक पहल एक अनोखे समाधान पर काम कर रही है। इसके तहत प्रयोगशाला में तैयार किए गए करोड़ों विशेष मच्छरों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़कर खतरनाक मच्छरों की आबादी को नियंत्रित करने की योजना बनाई गई है।
फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया में हो सकता है बड़ा प्रयोग
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगले दो वर्षों में अमेरिका के फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में करीब 3.2 करोड़ विशेष नर मच्छरों को छोड़ने की योजना पर विचार किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में गर्म और नम मौसम के कारण मच्छरों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे संक्रमण का खतरा भी बढ़ा है।
कैसे काम करेगी वोल्बाचिया तकनीक?
इस परियोजना की सबसे खास बात 'वोल्बाचिया' (Wolbachia) नामक बैक्टीरिया है। वैज्ञानिक प्रयोगशाला में तैयार किए गए नर मच्छरों को इस बैक्टीरिया से संक्रमित करते हैं।
जब ये नर मच्छर प्राकृतिक वातावरण में मौजूद मादा मच्छरों के साथ प्रजनन करते हैं, तो उनके अंडों का विकास नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी के मच्छरों की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगती है और समय के साथ उनकी आबादी नियंत्रित हो जाती है।
मंजूरी का इंतजार
यह प्रस्ताव फिलहाल अमेरिकी पर्यावरण और स्वास्थ्य एजेंसियों की समीक्षा प्रक्रिया में है। विशेषज्ञ इसकी सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव और दीर्घकालिक परिणामों का अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि वोल्बाचिया तकनीक का उपयोग पहले भी कई देशों में मच्छरजनित बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए किया जा चुका है।
क्या डेंगू पर लगेगी लगाम?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो डेंगू, जीका और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि यह परियोजना दुनियाभर के वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
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