Explainer: अचानक इतना महंगा क्यों हो गया प्याज? समझिए कीमतों में ‘आग’ लगने की पूरी कहानी
भारतीय रसोई में प्याज सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खाने का अहम हिस्सा है. ऐसे में जब प्याज के दाम अचानक बढ़ते हैं तो इसका सीधा असर आम आदमी की रसोई के बजट पर पड़ता है. अगस्त 2026 में देश के कई हिस्सों में प्याज की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है. दिल्ली-NCR समेत कई बड़े शहरों में खुदरा कीमतें 50-60 रुपये प्रति किलो या उससे ऊपर पहुंच गई हैं.
सरकारी आंकड़ों और बाजार रिपोर्टों के मुताबिक, 24 अगस्त तक देश में प्याज की औसत खुदरा कीमत करीब 43.53 रुपये प्रति किलो पहुंच गई थी, जो एक साल पहले की तुलना में लगभग 59 प्रतिशत अधिक थी. कीमतों में तेजी के बीच केंद्र सरकार ने बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारने और सप्लाई बढ़ाने के लिए 'कांदा एक्सप्रेस' जैसी पहल शुरू की है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्याज अचानक इतना महंगा क्यों हुआ? क्या आने वाले दिनों में कीमतें और बढ़ेंगी? और आम लोगों को सस्ता प्याज कब मिल सकता है? आइए समझते हैं पूरी कहानी….
प्याज की कीमत अचानक क्यों बढ़ी?
प्याज की कीमत में मौजूदा उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह आपूर्ति और नई फसल के बाजार में आने के बीच पैदा हुआ अंतर है. प्याज की अलग-अलग फसलें साल के अलग-अलग समय पर बाजार में आती हैं. जब पुरानी फसल का स्टॉक कम होने लगता है और नई फसल की आवक अभी पर्याप्त नहीं होती, तब कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है.
महाराष्ट्र के नासिक स्थित लासलगांव मंडी को प्याज के दाम का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है. यहां कीमतों में तेजी का संबंध रबी सीजन की फसल की घटती उपलब्धता और आगामी खरीफ फसल की देरी से जुड़ा है. हाल में लासलगांव में प्याज का भाव 4,250 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर चला गया था. यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि देश में प्याज पैदा कम हुआ है. असली समस्या यह है कि मंडी तक पर्याप्त मात्रा में प्याज सही समय पर नहीं पहुंच रहा है.
मानसून ने भी बढ़ाई परेशानी
प्याज की कीमतों पर मौसम का बड़ा असर पड़ता है. इस साल बारिश के पैटर्न में बदलाव और कई इलाकों में मौसम की अनिश्चितता ने प्याज की खेती और सप्लाई को प्रभावित किया है. नई खरीफ फसल की आवक में देरी होने से बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ा है. दक्षिण भारत से आने वाली खरीफ फसल की आवक भी उम्मीद के मुताबिक समय पर नहीं हो पाई है. बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले हफ्तों में बारिश की स्थिति और नई फसल की आवक प्याज की कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
क्या प्याज की कमी हो गई है?
यह समझना जरूरी है कि मौजूदा महंगाई का मतलब देश में प्याज पूरी तरह खत्म हो गया है, ऐसा नहीं है. केंद्र सरकार का कहना है कि आने वाले महीनों में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए प्याज की आपूर्ति पर्याप्त है. सरकार के पास बफर स्टॉक भी मौजूद है और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इसे बाजार में उतारा जा रहा है. समस्या मुख्य रूप से स्थानीय और मौसमी सप्लाई गैप की है. जिन मंडियों में आवक कम है, वहां कीमत तेजी से बढ़ रही है. दूसरी ओर, सरकार की ओर से बफर स्टॉक बाजार में पहुंचने के बाद कुछ मंडियों में कीमतों में गिरावट के संकेत भी मिले हैं.
सरकार ने क्या कदम उठाए?
प्याज की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल तेज कर दिया है. सरकार के पास करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक होने की जानकारी सामने आई है. इसके अलावा प्याज की सप्लाई को तेजी से बड़े शहरों तक पहुंचाने के लिए 'कांदा एक्सप्रेस' शुरू की गई है. 26 अगस्त को नासिक के लासलगांव से करीब 450 टन प्याज लेकर एक विशेष ट्रेन दिल्ली के लिए रवाना हुई. 28 अगस्त को यह खेप दिल्ली पहुंची, जिसका उद्देश्य राजधानी और आसपास के इलाकों में सप्लाई बढ़ाकर कीमतों पर दबाव कम करना है.
दिल्ली में सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बफर स्टॉक का प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर से बेचने की व्यवस्था भी शुरू की है. इसके लिए राजधानी में निर्धारित आउटलेट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है.
क्या कांदा एक्सप्रेस से सस्ता होगा प्याज?
कांदा एक्सप्रेस का मुख्य उद्देश्य प्याज को सड़क मार्ग की तुलना में बड़ी मात्रा में और तेजी से बाजार तक पहुंचाना है. अगर इससे मंडियों में उपलब्धता बढ़ती है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है. हालांकि, सिर्फ एक ट्रेन या कुछ खेपों से पूरे देश में प्याज की कीमत तुरंत नीचे नहीं आएगी. कीमतों में स्थायी गिरावट के लिए नई खरीफ फसल की पर्याप्त आवक जरूरी है.
सरकार ने प्याज की आवाजाही बढ़ाने के लिए इस रेल पहल को बड़े स्तर पर विस्तार देने की योजना बनाई है. इससे खासकर दिल्ली जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में सप्लाई बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
क्या आने वाले दिनों में प्याज और महंगा होगा?
यह सवाल अभी पूरी तरह तय नहीं किया जा सकता. प्याज की कीमत अगले कुछ हफ्तों में मुख्य रूप से तीन चीजों पर निर्भर करेगी-
पहला, नई खरीफ फसल मंडियों में कितनी जल्दी और कितनी मात्रा में आती है.
दूसरा, सितंबर में बारिश की स्थिति कैसी रहती है.
तीसरा, केंद्र सरकार कितनी मात्रा में बफर स्टॉक बाजार में जारी करती है.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार नई फसल की आवक बढ़ने पर कीमतों में राहत मिल सकती है. वहीं, अगर फसल की आवक में और देरी होती है या मौसम से नुकसान बढ़ता है तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है.
क्या नवंबर तक राहत मिल सकती है?
मौजूदा संकेतों के आधार पर तुरंत बड़ी गिरावट की उम्मीद करना मुश्किल है, लेकिन सप्लाई में सुधार होने पर आने वाले हफ्तों में कीमतों में नरमी आ सकती है. सरकार की ओर से बफर स्टॉक जारी किए जाने के बाद लासलगांव में कीमतों में हाल के दिनों में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट भी दर्ज की गई है. इससे संकेत मिलता है कि बाजार में अतिरिक्त सप्लाई पहुंचने पर कीमतों पर असर पड़ सकता है.
हालांकि, कुछ बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्याज की कीमतें नवंबर तक ऊंची रह सकती हैं, क्योंकि नई फसल की आवक और पुराने स्टॉक की गुणवत्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
आम आदमी की जेब पर क्या असर?
प्याज की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ प्याज खरीदने तक सीमित नहीं रहता. रेस्टोरेंट, ढाबे, स्ट्रीट फूड और तैयार खाद्य पदार्थों की लागत पर भी इसका असर पड़ सकता है. घरों में भी सब्जियों, दाल और अन्य खाने की चीजों के साथ प्याज का इस्तेमाल होने के कारण मासिक रसोई बजट बढ़ सकता है.
हालांकि प्याज की कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी को फिलहाल मौसमी और सप्लाई से जुड़ी समस्या के तौर पर देखा जा रहा है. यदि नई फसल समय पर बाजार में आती है और सरकार का बफर स्टॉक हस्तक्षेप प्रभावी रहता है, तो कीमतों में धीरे-धीरे राहत मिलने की संभावना है.
सज्जन कुमार के लिए इतनी हमदर्दी, लेकिन 1984 के पीड़ितों पर चुप्पी, यह दोहरा रवैया क्यों?: बलतेज पन्नू
आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब के मीडिया इंचार्ज बलतेज पन्नू ने कांग्रेस के साथ अन्य पार्टियों पर हमला बोलते हुए कहा कि माइनॉरिटी, खासकर सिख भाईचारे के प्रति पार्टियों का रवैया एक जैसा है. पार्टियां 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ितों का दर्द समझने में पूरी तरह फेल रही हैं.
कांग्रेस का रिएक्शन सबने देखा था
पन्नू ने याद दिलाया कि 1984 के सिख नरसंहार में कोर्ट की ओर से दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार की मौत के बाद कांग्रेस का रिएक्शन सबने देखा था. कांग्रेस लीडर दीपिंदर हुड्डा ने तो सज्जन कुमार को अपना "आदर्श" तक कह दिया था, हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलटते दिखे थे. उस समय भारतीय जनता पार्टी ने भी दीपिंदर हुड्डा और कांग्रेस की कड़ी आलोचना की थी. सज्जन कुमार के अंतिम भोग में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तीन-तीन मेंबर शामिल हुए थे. इनमें वेस्ट दिल्ली से सांसद कमलजीत सेहरावत, साउथ दिल्ली से सांसद रामबीर सिंह बिधूड़ी और नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से सांसद योगिंदर चंदोलिया शामिल हैं.
माइनॉरिटी के प्रति रवैया एक जैसा
बलतेज पन्नू ने तीखे लहजे में कहा कि ये वही लोग हैं जिन्होंने 1984 में विस्थापित सिख समुदाय की बस्तियों में जाकर या उनके परिवारों से मिलकर कभी कोई दुख नहीं बांटा, लेकिन कोर्ट से दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार की मौत उनके लिए सबसे ज़्यादा दुख देने वाली है. उन्होंने कहा कि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा दोनों पार्टियों का माइनॉरिटी के प्रति रवैया एक जैसा रहा है और यह अब पूरे देश के सामने उजागर हो गया है.
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