राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने एक बार फिर भारत, भाजपा और आरएसएस को निशाने पर लिया है। 25 अगस्त से शुरू होने वाली भागवत की प्रस्तावित तीन देशों की यात्रा से पहले आयोग ने न केवल आरएसएस नेताओं को अमेरिका में “हाई-लेवल मीटिंग्स” और कूटनीतिक सम्मान नहीं देने की मांग की, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता के कथित उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार पाए जाने वाले आरएसएस सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने तक की वकालत कर दी।
USCIRF के अध्यक्ष और पाकिस्तानी-अमेरिकी चिकित्सक आसिफ महमूद तथा आयुक्त जीन मिल्स के बयानों को आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया। महमूद ने आरएसएस को सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक अभिभावक बताते हुए उसके संबद्ध संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप लगाए। वहीं जीन मिल्स ने कहा कि आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारतीय सरकार से जुड़े हों, उच्चस्तरीय मुलाकातें या कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं दिया जाना चाहिए। मिल्स ने कहा कि इसकी बजाय अमेरिका को उन लोगों पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन का जिम्मेदार माना जाता है।
देखा जाये तो यह कोई अचानक आया बयान नहीं है। मार्च में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भी USCIRF ने भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में कठघरे में खड़ा करते हुए आरएसएस और भारत की खुफिया एजेंसी RAW तक के खिलाफ लक्षित अमेरिकी प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। इनमें संपत्ति फ्रीज करने और अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंध जैसे कदम शामिल करने की बात कही गई। यह आयोग बार-बार भारत को “कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न” यानी CPC घोषित करने की सिफारिश करता रहा है। यह एक ऐसा वर्गीकरण है, जिसमें चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी शामिल किया जाता है।
वहीं भारत ने USCIRF की इस रिपोर्ट और उसके आरोपों को सिरे से खारिज किया था। विदेश मंत्रालय ने इसे “विकृत और चयनात्मक तस्वीर” पेश करने वाला दस्तावेज बताया था, जो संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक आख्यानों पर आधारित है। यह भी महत्वपूर्ण है कि USCIRF एक अमेरिकी संघीय सरकारी निकाय जरूर है, लेकिन उसकी भूमिका केवल सलाहकारी है और उसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। यही कारण है कि आयोग की लगातार कठोर सिफारिशों के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने भारत को CPC घोषित करने या आरएसएस अथवा RAW पर प्रतिबंध लगाने जैसी मांगों को स्वीकार नहीं किया है। इसके विपरीत, अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और भू-राजनीतिक साझेदारी लगातार विस्तार पाती रही है।
दूसरी ओर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आगामी यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में स्थानीय भारतीय संगठनों और प्रवासी संस्थाओं के निमंत्रण पर होने वाली इस यात्रा के दौरान भागवत भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से संवाद करेंगे।
यहीं से USCIRF के ताजा हमले के राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ पर सवाल खड़े होते हैं। आखिर जिस संगठन ने लगभग एक शताब्दी में भारत के सामाजिक जीवन में अपनी गहरी उपस्थिति बनाई, सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय चेतना के क्षेत्र में विशाल स्वयंसेवी नेटवर्क खड़ा किया, उसके प्रमुख की प्रवासी भारतीयों से मुलाकात को पहले ही संदेह और प्रतिबंध की भाषा में क्यों देखा जा रहा है?
देखा जाये तो आरएसएस को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना ही उसकी सबसे बड़ी गलत व्याख्या है। देशभर में स्वयंसेवकों का व्यापक सामाजिक और सेवा कार्य, प्राकृतिक आपदाओं में राहत अभियान, शिक्षा एवं सामाजिक उत्थान से जुड़े प्रयास और राष्ट्रहित को केंद्र में रखने वाली उसकी संगठनात्मक परंपरा उसके लंबे सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यही व्यापक सामाजिक आधार और प्रवासी भारतीय समाज के बीच बढ़ती स्वीकार्यता संभवतः उन समूहों को असहज करती है, जो भारत की राजनीति और समाज को केवल धार्मिक उत्पीड़न की एक पूर्वनिर्धारित कहानी के जरिए देखना चाहते हैं।
इसके अलावा, USCIRF के दस्तावेजों और बयानों पर नजर डालें तो भाजपा और आरएसएस के खिलाफ उसका नफरत भरा रुख स्पष्ट दिखाई देता है। यह आयोग भाजपा और आरएसएस के संस्थागत संबंधों को “भेदभाव के माहौल” से जोड़ता रहा है और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानूनों तथा गोहत्या निषेध से जुड़े प्रावधानों को भी इसी व्यापक राजनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर चुका है।
साथ ही इस आयोग की ओर से भारत के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और न्यायिक ढांचे को उसके अपने संदर्भ में समझने की बजाय हर नीति और कानूनी कार्रवाई को धार्मिक उत्पीड़न के पूर्वनिर्धारित फ्रेम में फिट करने की कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए भारत CAA को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले अल्पसंख्यकों के लिए तेज नागरिकता प्रक्रिया वाला मानवीय कानून बताता है। लेकिन USCIRF इसे लगातार घरेलू अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपकरण के रूप में पेश करता रहा है।
इसी तरह दंगों, आतंकवाद या वित्तीय अपराध जैसे गंभीर मामलों में आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई अथवा अदालतों द्वारा जमानत से इंकार को भी कई बार “धार्मिक अल्पसंख्यकों के मनमाने उत्पीड़न” की भाषा में पेश किया जाता है। इस दृष्टिकोण में भारत की स्वतंत्र न्यायपालिका, बहुस्तरीय अपील व्यवस्था और संवैधानिक प्रक्रिया को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
दूसरी ओर, भारत सरकार और कई भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने USCIRF के रवैये पर दोहरे मापदंडों का सवाल भी उठाया है। सवाल उठाया गया है कि यह आयोग भारत को धार्मिक स्वतंत्रता पर लगातार उपदेश देता है, लेकिन अमेरिका और कनाडा में हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़, आगजनी, भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ घृणा अपराधों और संगठित धमकी की घटनाओं पर खामोश रहता है। यही नहीं, इस आयोग के नेतृत्व की पृष्ठभूमि को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। साथ ही USCIRF की रिपोर्टिंग, स्रोत चयन और निष्कर्षों में लगातार दिखाई देने वाले पैटर्न इसकी निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं।
बहरहाल, USCIRF भले ही मोहन भागवत की विदेश यात्रा से पहले प्रतिबंधों, कूटनीतिक बहिष्कार और आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कितना भी शोर मचाता रहे, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग दिखाई दे रही है। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में रह रहे संघ से जुड़े स्वयंसेवक और भारतीय समुदाय के लोग अपने सरसंघचालक के स्वागत को उत्सुक नजर आ रहे हैं और उनके मार्गदर्शक संबोधन को सुनने के लिए आतुर हैं। संघ के शताब्दी वर्ष में मोहन भागवत की यह यात्रा वैश्विक भारतीय समाज के साथ संवाद का अवसर बन रही है। ऐसे में आलोचकों और USCIRF की ओर से उठाया जाने वाला विरोध का शोर, प्रवासी भारतीयों और स्वयंसेवकों के उत्साह तथा व्यापक जनसंपर्क के बीच दबकर रह जाने की संभावना है।
-नीरज कुमार दुबे
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युवा केवल उम्र की एक अवस्था नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस, कल्पना, परिवर्तन और नवसृजन की चेतना का नाम है। जिस समाज की युवा शक्ति जाग्रत, संवेदनशील और रचनात्मक होती है, वह समाज परिवर्तन की नई इबारत लिखता है। इसके विपरीत जब युवा ऊर्जा दिशाहीन हो जाती है तो वही शक्ति हिंसा, नशे, उग्रवाद, अपराध, निराशा और विध्वंस का कारण बन सकती है। इसलिए आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि युवा क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि उनकी विराट ऊर्जा को किस दिशा में लगाया जा रहा है। इसी चिंतन को वैश्विक स्तर पर महत्व देने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाता है। वर्ष 2000 से इस दिवस का आयोजन शुरू हुआ। इस वर्ष का विषय है-‘विभिन्न परिस्थितियाँ, साझा आकांक्षाएँ।’ यह विषय आज की युवा पीढ़ी की वास्तविकता को बहुत गहराई से अभिव्यक्त करता है। दुनिया के युवाओं की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। कहीं गरीबी और बेरोजगारी है, कहीं युद्ध और असुरक्षा, कहीं शिक्षा के अवसरों की कमी है, कहीं तकनीकी असमानता और पर्यावरण संकट है, लेकिन इन सबके बीच उनकी आकांक्षाएँ आश्चर्यजनक रूप से समान हैं। वे सम्मानजनक जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सार्थक रोजगार, सुरक्षा, मानसिक सुख-शांति, निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी और बेहतर भविष्य चाहते हैं।
दुनिया की सरकारों को यह समझना होगा कि युवा केवल चुनाव के समय याद आने वाला मतदाता नहीं है। वह राष्ट्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार है। जिस युवा के जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णय लिये जाते हैं, उसकी आवाज उन निर्णयों में कितनी शामिल है, यह लोकतंत्र की गुणवत्ता का भी महत्वपूर्ण पैमाना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 2250 युवाओं को शांति निर्माण और हिंसा की रोकथाम में महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्वीकार करता है। यह स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि युवा समस्या नहीं, बल्कि समाधान की शक्ति हैं। आज आवश्यकता है कि हर देश में ऐसी प्रभावी व्यवस्था बने, जिसमें विद्यार्थी, उद्यमी, किसान, वैज्ञानिक, कलाकार, खिलाड़ी और सामाजिक कार्यकर्ता युवा सीधे नीति-निर्माताओं से संवाद कर सकें। केवल युवाओं पर योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं के साथ योजनाएँ बनाना आवश्यक है। भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसकी युवा आबादी भी है। भारत के युवाओं ने अनेक बार सिद्ध किया है कि उनमें केवल नौकरी पाने की आकांक्षा नहीं, बल्कि कुछ नया करने की बेचैनी भी है। विज्ञान, खेल, तकनीक, उद्यमिता, कला, साहित्य और सामाजिक सेवा से लेकर अनेक क्षेत्रों में भारतीय युवा अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के पुनर्निर्माण में युवा शक्ति की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना था। उनका विश्वास था कि जाग्रत, चरित्रवान और संकल्पवान युवा राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी युवाओं के सपनों को भारत के भविष्य से जोड़ा। उनके चिंतन का मूल संदेश था कि बड़े सपने देखो, ज्ञान अर्जित करो और उन सपनों को कर्म में बदलो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी भारत के विकास विमर्श में युवा शक्ति, नवाचार, कौशल, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता को विशेष महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अब अगला चरण इससे आगे जाने का है। युवा को योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास का सह-निर्माता बनाना होगा।
युवा दिवस की सार्थकता तब होगी जब 12 अगस्त के बाद भी युवा के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे। क्यों न इस वर्ष प्रत्येक शहर में युवा स्वप्न संवाद आयोजित हों, जिसमें युवा लिखें कि वे अपने देश को अगले दस वर्षों में कैसा देखना चाहते हैं। उन सपनों को केवल कागज पर न रखा जाए, बल्कि सरकार, उद्योग, शिक्षण संस्थान और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर उनमें से व्यवहारिक योजनाओं को धरातल पर उतारें। प्रत्येक युवा कोई एक उपयोगी कौशल सीखे और समाज के लिए कोई एक जिम्मेदारी स्वीकार करे। प्रत्येक जिले में ऐसे युवा नवाचार केंद्र स्थापित हों, जहाँ स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए युवा अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता का उपयोग कर सकें। आज युवा शक्ति के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में नशा, डिजिटल लत, हिंसक प्रवृत्तियाँ, मानसिक तनाव, बेरोजगारी और उद्देश्यहीनता हैं। नशे का फैलता जाल केवल व्यक्ति को नहीं, परिवार और राष्ट्र की उत्पादक शक्ति को भी कमजोर करता है। युवाओं को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि नशा मत करो, बल्कि उन्हें जीवन का ऐसा उद्देश्य देना होगा कि नशे की आवश्यकता ही महसूस न हो। खेल, योग, ध्यान, कला, साहित्य, सेवा, उद्यमिता और सामाजिक गतिविधियों से युवाओं को जोड़ना होगा। खाली समय को रचनात्मक समय में बदलना नशामुक्ति की सबसे प्रभावी सामाजिक रणनीति हो सकती है।
आज की युवा पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच संवाद की कमी भी एक चुनौती है। बुजुर्ग अनुभव के प्रतीक हैं और युवा ऊर्जा के। अनुभव यदि ऊर्जा से नहीं जुड़ेगा तो वह जड़ हो सकता है और ऊर्जा यदि अनुभव से नहीं जुड़ेगी तो दिशाहीन हो सकती है। इसलिए आवश्यकता है अंतरपीढ़ी संवाद की। परिवारों, संस्थाओं और सरकारों को ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें युवा नई सोच प्रस्तुत करें और वरिष्ठ पीढ़ी अपने अनुभव से उनका मार्गदर्शन करे। अनुभव और ऊर्जा का यह समन्वय राष्ट्र निर्माण की बड़ी शक्ति बन सकता है। आज दुनिया के अनेक हिस्सों में युवा आंदोलन हो रहे हैं। युवाओं की आवाज सत्ता और व्यवस्था तक पहुँच रही है। भारत में भी समय-समय पर युवाओं ने अपनी आकांक्षाओं और असंतोष को आंदोलन का रूप दिया है। लेकिन युवा आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता तब होगी जब वह केवल विरोध की आवाज न रहकर विकल्प की आवाज बने। युवा कहे कि हमें केवल शिकायत नहीं करनी, समाधान भी देना है। हमें केवल रोजगार नहीं चाहिए, रोजगार सृजित करने की क्षमता भी चाहिए। हमें केवल अधिकार नहीं चाहिए, हम जिम्मेदारियाँ भी निभाएँगे। हम केवल सत्ता बदलने नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने आए हैं। यही युवा आंदोलन की नई परिभाषा हो सकती है।
यौवन अपने आप में उपलब्धि नहीं है। युवकत्व चेतना की अवस्था है। चेहरे पर जवानी हो और विचारों में जड़ता हो तो यौवन अधूरा है। ऊर्जा हो लेकिन दिशा न हो तो वही ऊर्जा संकट बन सकती है। इसलिए आज की युवा पीढ़ी को दो चीजों की सबसे अधिक आवश्यकता है-जोश और होश। जोश उसे ऊँचा उड़ाए और होश उसे सही दिशा दे। जोश उसे सपने दिखाए और विवेक उन सपनों को यथार्थ में बदले। जोश उसे संघर्ष करना सिखाए और करुणा उसे मनुष्य से जोड़े। स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा, सुकरात की प्रश्नाकुलता, महात्मा गांधी की करुणा और डॉ. कलाम के सपनों का समन्वय आज के युवा के व्यक्तित्व में होना चाहिए। दुनिया के युवाओं से यह कहना आसान है कि बड़े सपने देखो, लेकिन केवल सपने देखने के लिए कहना पर्याप्त नहीं है। सपनों को आकार देने के लिए अवसरों की संरचना भी करनी होगी।
अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 का विषय हमें एक महत्वपूर्ण सत्य बताता है कि हमारी परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारी आकांक्षाएँ साझा हैं। भारत का युवा अवसर चाहता है, अफ्रीका का युवा शिक्षा और रोजगार चाहता है, युद्धग्रस्त क्षेत्र का युवा शांति चाहता है, द्वीपीय देशों का युवा सुरक्षित पर्यावरण चाहता है और तकनीकी दुनिया का युवा समान अवसर चाहता है। अर्थात दुनिया के युवा अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं, अलग संस्कृतियों में रहते हैं, लेकिन उनके सपनों की भाषा बहुत कुछ समान है। इसलिए आज दुनिया को युवा शक्ति को नियंत्रित करने से अधिक उस पर विश्वास करने की जरूरत है। आइए इस अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस पर हम केवल युवाओं को बधाई न दें, बल्कि उन्हें अवसर दें-अपनी बात कहने का, अपनी प्रतिभा दिखाने का, निर्णय लेने का और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का। सरकारें युवाओं की सुनें, परिवार उनके सपनों को समझें, शिक्षण संस्थान उनकी प्रतिभा को पहचानें, समाज उनके प्रयोगों को अवसर दे और युवा स्वयं अपने भीतर के सामर्थ्य को पहचानें। क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल संसदों, सरकारी कार्यालयों या योजनाओं की फाइलों में नहीं लिखा जाता, वह युवाओं की आँखों में पल रहे सपनों में लिखा जाता है।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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