भारत का टैबलेट बाजार 2026 की पहली छमाही में 15 प्रतिशत बढ़ा, प्रीमियम डिवाइसों की हिस्सेदारी 89 प्रतिशत रही
नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। भारत के टैबलेट बाजार में 2026 की पहली छमाही में सालाना आधार पर 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह वृद्धि प्रीमियम डिवाइसों की बढ़ती मांग और कंज्यूमर, शिक्षा और एंटरप्राइज क्षेत्रों में लगातार मांग के कारण हुई।
साइबरमीडिया रिसर्च (सीएमआर) की रिपोर्ट के मुताबिक, 20,000 रुपए से अधिक कीमत वाले प्रीमियम टैबलेट्स की बिक्री सालाना आधार पर 74 प्रतिशत बढ़ी और इनकी बाजार हिस्सेदारी 89 प्रतिशत रही। इससे बेहतर परफॉर्मेंस, बड़े डिस्प्ले और अधिक उत्पादकता वाले डिवाइसों की बढ़ती मांग का संकेत मिलता है।
रिपोर्ट में कहा गया कि 10 इंच से बड़े स्क्रीन वाले टैबलेट्स की कुल शिपमेंट में करीब 91 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। वहीं, वाई-फाई टैबलेट्स का शिपमेंट 30 प्रतिशत बढ़ा, 5जी टैबलेट्स में 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि 4जी टैबलेट्स की शिपमेंट में 19 प्रतिशत की गिरावट आई।
मांग का रुझान अधिक बेहतर परफॉर्मेंस वाले कॉन्फिगरेशन की ओर भी रहा। 6जीबी रैम वाले टैबलेट्स की बिक्री 73 प्रतिशत बढ़ी, जबकि 12जीबी रैम वाले वेरिएंट्स में 422 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई।
प्रीमियम सेगमेंट में एप्पल ने अपनी बढ़त और मजबूत की। अकेले एप्पल आईपैड 11 सीरीज की भारत में प्रीमियम टैबलेट शिपमेंट में करीब 23 प्रतिशत हिस्सेदारी रही।
साइबरमीडिया रिसर्च (सीएमआर) की वरिष्ठ विश्लेषक मेनका कुमारी ने कहा, “भारतीय टैबलेट बाजार तेजी से परिपक्व हो रहा है और इसमें ज्यादा बेहतर स्पेसिफिकेशन वाले डिवाइसों की ओर स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है। कंपोनेंट की बढ़ती लागत के साथ-साथ बड़े स्क्रीन, ज्यादा रैम और मजबूत वाई-फाई कनेक्टिविटी को लेकर उपभोक्ताओं की प्राथमिकता औसत बिक्री कीमतों को ऊपर ले जा रही है।”
कुमारी ने कहा, “भले ही कुल बिक्री में वृद्धि की रफ्तार धीमी हो रही है, लेकिन कंटेंट क्रिएशन, शिक्षा और एंटरप्राइज प्रोडक्टिविटी के लिए टैबलेट अभी भी महत्वपूर्ण डिवाइस बने हुए हैं।”
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कैलेंडर वर्ष 2026 में भारत का टैबलेट बाजार 10-12 प्रतिशत तक घट सकता है। कंपोनेंट की बढ़ती लागत, मेमोरी की आपूर्ति में कमी और संस्थागत खरीद को लेकर अनिश्चितता से साल की दूसरी छमाही में बाजार के प्रदर्शन पर दबाव पड़ने की संभावना है।
—आईएएनएस
एबीएस
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Explainer: तिब्बत की तरह ही भारत की भी 88 झीलें उफन रहीं, कभी भी फट सकती हैं; जानें 3 कारण
Explainer: नेपाल में तिब्बत की ओर से आई बाढ़ ने तबाही मचा दी है. बाढ़ में मरने वाले लोगों की संख्या 273 हो गई है, जिनमें 270 मृतक नेपाल से तो 3 मृतक नेपाल से हैं. नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर बुधवार सुबह अचानक बाढ़ आ गई थी. मौसमी तबाही में करीब 1500 लोग अब भी लापता है. सिर्फ नेपाल में 900 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी मिली है, जिनमें से 525 विदेशी पर्यटक थे, जो 32 अलग-अलग देशों के नागरिक हैं. वहीं, चीनी सरकारी वेबसाइट के अनुसार, तिब्बत में 550 से अधिक लोग अब भी लापता है.
भारत के विदेश मंत्रालय ने बताया कि नेपाल गए 288 भारतीयों से संपर्क नहीं हो पाया है, जिसमें 73 लोग त्रिशूली-1 पावर प्रोजेक्ट में काम करते हैं. अब तक 21 भारतीयों को सुरक्षित बचा लिया गया है. वहीं, तिब्बत में फंसे करीब 200 भारतीयों से भी लगातार संपर्क किया जा रहा है.
भारत की भी 88 झीलें फटने का खतरा
IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक साझा स्टडी की थी, जिसकी रिपोर्ट इसी महीने जारी की गई थी. रिपोर्ट के अनुसार, साल 1990 में हिमाचल प्रदेश में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं और यह आंकड़ा 2024 तक बढ़कर 669 हो गया, यानी 525% की बढ़ोत्तरी. 669 में से 88 झीलें ऐसी हैं, जिन पर ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा मंडरा रहा है. 9 झीलें को बहुत ज्यादा खतरनाक, 18 झीलों को ज्यादा खतरनाक और 26 झीलों को मध्यम खतरनाक की श्रेणी में रखा गया है.
बता दें, यह रिसर्च ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील पर की गई थी. रिपोर्ट के अनुसार, अगर ब्यास झील का नेचुरल डैम टूट जाता है तो 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड के हिसाब से बाढ़ आ जाएगी. यानी हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी बहेगा. इससे हर सेकेंड ओलंपिक साइज के 6 स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं. ऐसे ही सतलुज झील से 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी का सैलाब आएगा. यानी हर सेंकेंड लगभग 35 लाख लीटर पानी बहेगा, जिससे डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट सहित 588 इमारतों का खतरा है.
हिमालय का बढ़ता तापमान ब्रस्ट के खतरे को और बढ़ा रहा है. जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी के अनुसार, ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान पिछले 20 वर्षों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इससे ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव में बड़ा बदलाव आ सकता है.
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3 वजहों से फट सकती है ग्लेशियर की झीलें
1. ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना
ग्लोबल वार्मिंग के वजह से मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पर्वतीय इलाकों का तापमान अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है. इससे ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप नई झीलों का निर्माण हो रहा है और पुरानी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है. विज्ञान पत्रिका 'नेचर' के अनुसार, यदि तापमान इसी गति से बढ़ता रहा, तो अगले 70 वर्षों में हिमालय-काराकोरम क्षेत्र की लगभग 65% बर्फ पिघल सकती है, जिससे झीलों की संख्या और उनके आकार में अत्यधिक वृद्धि होगी.
2. झील में बर्फ या चट्टानों का गिरना
पहाड़ों पर भूस्खलन (Landslide) या हिमस्खलन (Avalanche) के कारण जब मिट्टी, चट्टानें या बर्फ के बड़े टुकड़े सीधे झील में गिरते हैं, तो झील में तीव्र लहरें उत्पन्न होती हैं. इससे झील का प्राकृतिक बांध क्षतिग्रस्त होकर टूट जाता है. नेचर पत्रिका के एक अध्ययन के अनुसार, हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में अब तक दर्ज 388 से अधिक GLOF (ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड) की घटनाओं में हिमस्खलन को ही सबसे मुख्य कारण पाया गया है.
3. अत्यधिक बारिश और मानवीय गतिविधियां
अतिवृष्टि के कारण झीलों में जलस्तर अचानक बढ़ जाता है, जिससे प्राकृतिक बांध टूट जाता है. उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष जुलाई में भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ का प्रमुख कारण यही था, जहाँ भारी बारिश के कारण एक नई झील बन गई और ओवरफ्लो हो गई. भूकंप के साथ-साथ पहाड़ों में हो रहे अवैध खनन, वनों की कटाई और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स जैसी मानवीय गतिविधियों से पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक स्थिरता प्रभावित होती है, जो झील के बांध टूटने का खतरा बढ़ा देती है.
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क्या भारत में इससे पड़ेगा कोई फर्क
भोटेकोशी नदी नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली एक प्रमुख हिमालयी नदी है, जो मुख्य रूप से सिंधुपालचोक क्षेत्र से होकर बहती है. नेपाल में आगे बढ़ते हुए यह सुनकोशी और फिर सप्तकोशी नदी में मिल जाती है. नेपाल के हनुमान नगर के पास स्थित भीमनगर बराज (सुपौल जिले के बीरपुर के समीप) से यह बिहार में प्रवेश करती है, जहाँ इसे कोसी नदी के नाम से जाना जाता है. आगे चलकर यह नदी कटिहार के कुरसेला के पास गंगा नदी में मिल जाती है.
कोसी नदी में कमला और बागमती जैसी नदियों का जल भी मिलता है. ऐसे में यदि भोटेकोशी का जलस्तर अत्यधिक बढ़ता है, तो वह पानी सुनकोशी के रास्ते पूरे कोसी नदी तंत्र को उफान पर ला सकता है. जलस्तर बढ़ने की स्थिति में बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिलों में गंभीर बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है.
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2008 में बिहार में हुआ था नुकसान
कोसी को अपने भीषण विनाशकारी स्वभाव के कारण 'बिहार की शोक नदी' कहा जाता है. वर्ष 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का मुख्य तटबंध टूट गया था. इसके परिणामस्वरूप नदी अपनी धारा बदलकर सैकड़ों वर्ष पुराने पूर्व दिशा वाले रास्ते पर बहने लगी थी, जिससे व्यापक जन-धन की हानि हुई थी.
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