Explainer: चीन के साथ सीमा विवाद में 'डिलिमिटेशन' पर चर्चा, 3488 किलोमीटर लंबे LAC के सटीक निर्धारण पर फंसा पेंच
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर 25वें दौर की स्पेशल रिप्रेजेनटेटिव (SR) वार्ता मंगलवार को यानि 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में हुई. NSA अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की बातचीत में पहली बार बाउंड्री Delimitation यानी सीमा के सटीक निर्धारण पर आगे बढ़ने पर जोर दिया गया. दोनों देशों ने इसके लिए एक्पर्ट ग्रुप और बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए वर्किंग ग्रुप को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है.
सबसे बड़ा पेंच क्या है?
भारत और चीन के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबा LAC मौजूद है. मगर दोनों देशों के बीच इसकी पूरी तरह साझा और स्वीकृत रेखा मौजूद नहीं है. भारत LAC की लंबाई करीब 3,488 किमी मानता है. वहीं चीन की गणना करीब 2,000 किमी की है.
यही अंतर सीमा पर विवाद का मूल कारण है. कई इलाकों में दोनों देशों की LAC को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं. इसलिए जिस जमीन को भारत अपनी तरफ मानता है, वहां चीन की सेना की मौजूदगी या गश्त भारत के लिए अतिक्रमण मानी जा सकती है, जबकि चीन उसे अपनी धारणा वाली LAC के भीतर मान सकता है.
LAC और अंतरराष्ट्रीय सीमा में क्या अंतर है?
LAC कोई अंतिम अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है. यह वह रेखा है जहां तक दोनों देशों का वास्तविक नियंत्रण है. दूसरी ओर Boundary Delimitation का मतलब दोनों देशों के बीच सीमा की राजनीतिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य रेखा तय करना है.
सरल शब्दों में समझे अर्थ
LAC-अभी जमीन पर किसका नियंत्रण है. Delimitation - भविष्य में दोनों देशों के बीच सीमा कहां होगी. भारत सरकार पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि पूरी LAC की कोई साझा delineation नहीं हुई है. दोनों देशों की पूरी LAC को लेकर आम धारणा नहीं है. आखिर 3,488 किमी की LAC तय क्यों नहीं हो पाई?
इसके पीछे कई कारण हैं
1. दोनों देशों के अलग-अलग सीमा दावे: भारत और चीन सीमा के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग क्षेत्रों पर दावा करते हैं. खासतौर पर पश्चिमी सेक्टर यानी लद्दाख और पूर्वी सेक्टर यानी अरुणाचल प्रदेश में मतभेद काफी गंभीर हैं.
2. ऐतिहासिक नक्शों की अलग व्याख्या: भारत सीमा निर्धारण के लिए ऐतिहासिक समझौतों, परंपरागत सीमा और भौगोलिक सिद्धांतों को आधार मानता है. चीन की सीमा संबंधी व्याख्या अलग है. भारत सरकार के अनुसार चीन पारंपरिक और प्रचलित सीमा-संरेखण को स्वीकार नहीं करता.
3. LAC को लेकर अलग-अलग धारणा: 1990 के दशक में दोनों देशों ने LAC की clarification और confirmation की प्रक्रिया शुरू की थी. कुछ क्षेत्रों में दोनों पक्षों ने अपनी धारणा वाले नक्शे साझा भी किए है. मगर यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकी.
4. जमीन पर बदलते हालात: हिमालयी क्षेत्र में ऊंचे पहाड़, दर्रे, नदियां और दुर्गम भूगोल सीमा को जमीन पर स्पष्ट रूप से चिह्नित करना मुश्किल बनाते हैं. ऐसे में किसी पहाड़ी रिज, नदी या watershed को सीमा मानने को लेकर भी मतभेद हो सकते हैं.
डिलिमिटेशन पर अभी क्या सहमति बनी है?
25 अगस्त की वार्ता के बाद दोनों देशों ने आठ सूत्रीय सहमति में कहा कि Boundary Delimitation के Expert Group और Border Management Working Group अलग-अलग स्तर पर काम को आगे बढ़ाएंगे. दोनों समूहों का पहला काम अपने-अपने टर्म आफ रिफ्रेंस पर सहमति बनाना होगा.
इसके अलावा दोनों देशों ने LAC को बेहतर समझने वाले कुछ क्षेत्रों में काम करने,अतिरिक्त सैन्य बैठक बिंदु बनाने और पूर्वी तथा मध्य सेक्टर में दो अतिरिक्त सैन्य हॉटलाइन को स्थापित करने पर सहमति जताई.
क्या भारत-चीन सीमा अब तय होगी?
अभी ऐसा कहना जल्दबाजी मानी जाएगी. यह महत्वपूर्ण जरूर है क्योंकि बातचीत अब केवल सैनिकों की वापसी या तनाव कम करने तक सीमित नहीं है. यह सीमा के निर्धारण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर केंद्रित हो रही है.
मगर वास्तविक सीमा तय करने के लिए दोनों देशों को यह तय करना होगा कि अलग-अलग सेक्टरों में सीमा की रेखा कहां होनी है. दोनों पक्ष उसे राजनीतिक रूप से स्वीकार करेंगे या नहीं. चीन और भारत अभी भी सीमा विवाद के अंतिम समाधान की तलाश में हैं. दोनों पक्षों ने 2005 के Political Parameters and Guiding Principles के तहत निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई है.
गलवान विवाद के बाद बड़ा दावा
2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन के रिश्तों में काफी समय तक तनाव रहा. 2024 के बाद सैन्य डिसइंगेजमेंट और सीमा पर शांति बहाली की दिशा में बड़ा कदम है. अब 2026 की SR वार्ता में delimitation को आगे बढ़ाने की बात सामने आना बातचीत के एजेंडे के अगले चरण की ओर बड़ा संकेत है. हालांकि, LAC की स्पष्टता और अंतिम अंतरराष्ट्रीय सीमा का तय करना करना दो अलग प्रक्रियाएं हैं. इसलिए 3,488 किमी की पूरी सीमा को लेकर सहमति बनने में अभी लंबी कूटनीतिक की जरूरत है.
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भर्ती प्रक्रिया में एआई का तेजी से बढ़ रहा प्रभाव, 86 प्रतिशत भारतीय संगठनों ने माना बदलाव ला रही है नई तकनीक: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। भारत में भर्ती प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और एजेंटिक एआई का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 86 प्रतिशत भारतीय संगठनों का मानना है कि एआई उनकी भर्ती प्रक्रिया को बदल रही है। रिज्यूमे की जांच, उम्मीदवारों का मूल्यांकन और भर्ती प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों के साथ संवाद जैसे क्षेत्र एआई के प्रमुख उपयोग के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
डेलॉइट इंडिया की कैंपस वर्कफोर्स ट्रेंड्स 2026 रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कैंपस भर्ती अब पहले की तुलना में अधिक रणनीतिक, कौशल-आधारित और प्रौद्योगिकी संचालित हो गई है। कंपनियां शुरुआती करियर वाले प्रतिभाशाली युवाओं को आकर्षित करने के लिए अधिक निवेश कर रही हैं और इंटर्नशिप से स्थायी नौकरी तक पहुंचाने वाले कार्यक्रमों को मजबूत बना रही हैं।
अध्ययन में पाया गया कि भर्ती बजट में 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि 80 प्रतिशत संगठनों के पास अब कैंपस भर्ती के लिए समर्पित टीमें हैं। इससे स्पष्ट है कि कंपनियां भविष्य की कार्यबल तैयार करने के लिए संस्थागत स्तर पर निवेश बढ़ा रही हैं।
एआई के उपयोग में रिज्यूमे स्क्रीनिंग सबसे प्रमुख क्षेत्र बना हुआ है, जहां 72 प्रतिशत कंपनियां इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। इसके अलावा, 35 प्रतिशत संगठनों का कहना है कि एआई के बढ़ते उपयोग के चलते नई शुरुआती स्तर की नौकरियां (एंट्री-लेवल पद) और नए कौशलों की मांग पैदा हो रही है, जो पिछले वित्त वर्ष 2025 में 21 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट के अनुसार, एआई और डेटा से जुड़े कौशल रखने वाले उम्मीदवारों को भर्ती के दौरान 20 से 25 प्रतिशत तक अधिक वेतन मिलने की संभावना है। वहीं विश्लेषणात्मक सोच और समस्या समाधान क्षमता जैसे कौशल रखने वाले उम्मीदवारों को भी 10 से 15 प्रतिशत तक अतिरिक्त वेतन प्रीमियम मिल रहा है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि इंटर्नशिप अब स्थायी नौकरी का अधिक प्रभावी माध्यम बन रही है। विभिन्न शैक्षणिक श्रेणियों में प्री-प्लेसमेंट ऑफर में रूपांतरण की दर बेहतर हुई है। कंपनियों के अनुसार, किसी इंटर्न को स्थायी नौकरी मिलने की संभावना का सबसे बड़ा आधार उसकी व्यवहारिक दक्षता (75 प्रतिशत) और सीखने की क्षमता (72 प्रतिशत) है।
बेहतर प्रतिभा चयन और कौशल मिलान के कारण शुरुआती स्तर पर नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों की संख्या में भी कमी आई है। शीर्ष संस्थानों और टियर-1 कॉलेजों से भर्ती किए गए कर्मचारियों में शुरुआती त्याग दर 18 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत रह गई है।
रिपोर्ट में बताया गया कि वित्त वर्ष 2022 से 2026 के बीच वेतन वृद्धि की औसत वार्षिक दर 2 से 4 प्रतिशत रही है। हालांकि अब वेतन निर्धारण में संस्थान की श्रेणी, विशेषज्ञता और महत्वपूर्ण तकनीकी कौशल की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
लैंगिक विविधता के मोर्चे पर भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। वित्त वर्ष 2026 के कैंपस भर्ती लक्ष्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो कार्यस्थलों पर बढ़ती समावेशिता को दर्शाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, संगठनों का फोकस अब केवल बड़ी संख्या में भर्ती करने पर नहीं है, बल्कि ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं को शामिल करने पर है जो भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था और एआई-आधारित कार्य वातावरण में सफलता हासिल कर सकें। इसी कारण कंपनियां एआई, डेटा विश्लेषण, समस्या समाधान और अनुकूलन क्षमता जैसे कौशलों को तेजी से प्राथमिकता दे रही हैं।
--आईएएनएस
डीबीपी
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