Uncovered With Manoj Gairola: OBC Reservation से यादवों का हिस्सा कम करेगी BJP?
पूरे देश में फॉरवर्ड कास्ट आरक्षण के खिलाफ आवाज उठा रही हैं. लेकिन आने वाले समय में आरक्षण की असली लड़ाई ओबीसी वर्ग के अंदर ही होगी. इसका कारण ये है कि आरक्षण का अधिकतर फायदा कुछ मज़बूत जातियों को ही मिला है– जैसे कि यादव और कुर्मी. जबकि अधितर पिछड़ी जातियों को इसका कोई ख़ास फ़ायदा नहीं मिला.
merit बची और ना ही सामाजिक न्याय
कई राज्य सरकारों ने और केंद्र सरकार ने इस असमानता को दूर करने के लिए कमेटियां बनाईं. इन कमेटियों ने रिपोर्ट भी submit करी. और इन रिपोर्ट्स में कई चौकाने वाले आंकड़े हैं, जो हम आगे आपको बतायेंगे. लेकिन एक बात साफ़ है कि जिस उद्देश्य के लिए OBC आरक्षण लाया गया था, वो उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया. ओबीसी आरक्षण लाया गया था सामाजिक न्याय के लिए. इसका सबसे बड़ा विरोध इस बात को ले कर है कि इससे merit ख़त्म होती है. लेकिन कहा गया कि सामाजिक न्याय के लिए, merit का ट्रेड ऑफ करना जरूरी है. अब हालत ये हैं कि ना तो merit बची और ना ही सामाजिक न्याय.
राजनैतिक दल को सूट नहीं करता
ये रिपोर्ट्स ठंडे बस्ते में पड़ी हुई हैं. किसी की हिम्मत नहीं है कि इन reports के फ़ैसले को लागू कर सके. कुछ रिपोर्ट्स तो सार्वजनिक भी नहीं की गई. क्यों कि आरक्षण एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन चुका है. इसमें सुधार किसी भी राजनैतिक दल को सूट नहीं करता. ख़ासतौर से बीजेपी को जिसकी इन प्रदेशों में सरकार है.
पूरे आरक्षण को ही ख़त्म करना चाहती है
लेकिन अब OBC वर्ग में अत्यंत पिछड़ी जातियों के नेता आरक्षण के अंदर आरक्षण की माँग करने लगे हैं. जैसे की O P राजभर. वहीं दूसरी तरफ़ अखिलेश यादव जैसे नेता इसका विरोध करते हैं. वो लोगों को डर दिखाते हैं कि आरक्षण में सुधार तो एक बहाना है. बीजेपी तो पूरे आरक्षण को ही ख़त्म करना चाहती है.
नमस्कार...मैं हूं मनोज गैरोला...अनकवर्ड के आज के एपिसोड में हम बात करेंगे ओबीसी रिजर्वेशन की. कैसे इसका लाभ केवल कुछ ही जातियों को मिल पाया है. और क्यों ये मुद्दा आने वाले समय में बीजेपी के लिए मुसीबत पैदा कर सकता है.
OBC वर्ग को सही हिस्सेदारी दिलाना
हम शुरुआत करते हैं राजस्थान से. राजस्थान ने पिछले साल एक OBC Political Representation Commission बनाया था. इस Commission का मुख्य उद्देश्य था पंचायत और शहरी निकाय चुनावों में OBC वर्ग को सही हिस्सेदारी दिलाना. इसके अध्यक्ष justice मदन लाल भाटी ने इसी महीने सीएम भजन लाल शर्मा को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में OBC वर्ग की सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण की बात की गई है. सरकार ने ये रिपोर्ट पब्लिक तो नहीं की. लेकिन इसके कुछ आंकड़े लीक हो गए हैं.
12 जातियां OBC वर्ग में आती हैं
राजस्थान में कुल 12 जातियां OBC वर्ग में आती हैं. लेकिन आरक्षण की ७८% नौकरियाँ सिर्फ़ चार जातियों को ही मिली हैं - जाट, गुर्जर, सैनी और यादव. और 18 जातियां ऐसी हैं जिनके 100 से भी कम लोग सरकारी नौकरियों में हैं. इस रिपोर्ट के साथ ही ये बहस एक बार फिर से शुरू हो गई कि क्या आरक्षण का फायदा सिर्फ़ कुछ जातियों को ही मिलेगा? या फिर इसमें कुछ सुधार होगा. क्योंकि ये कहानी सिर्फ राजस्थान की नहीं है, बल्कि कमोबेश पूरे देश की है...
तीन categories में बांटने की सिफारिश की
उत्तर प्रदेश में तो ये एक बहुत बड़ा मुद्दा है. इसके लिए अब तक दो कमेटियां बन चुकी हैं. दोनों ने आरक्षण के लिए ओबीसी में sub-category बनाने की सिफारिश की है. 2017 में यूपी में योगी पहेली बार मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 2018 में एक कमेटी बनाई. इसके अध्यक्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज, राघवेंद्र कुमार थे. इस कमेटी ने OBC Reservation को तीन categories में बांटने की सिफारिश की.
पहला है पिछड़ा वर्ग - यानी Group A - जिसमें यादव, कुर्मी, चौरसिया, सोनार, जाट जैसी 12 जातियाँ हैं. और इनके लिए 7% आरक्षण रखा है. दूसरा है अधिक पिछड़ा वर्ग – यानी ग्रुप B जिसमें मौर्य, सैनी, लोध, गड़ेरिया, गुर्जर, तेली, जैसी 59 जातियां हैं. इनको 11% आरक्षण देने की बात कही गई थी.
तीसरा है अत्यंत पिछड़ा वर्ग – यानी Group C – इसमें मल्लाह, बिंद, कश्यप, कुम्हार, राजभर जैसी 8 जातियां हैं. इनको 9% रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी.इसमें सबसे interesting बात ये है कि कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि Group A वाली जातियां खुद को सवर्णों के समान ही मानती हैं. और वो अन्य जातियों से वैसे ही व्यवहार करती हैं. तो इससे एक और सवाल खड़ा उठता है कि क्या इस बात का रिव्यू होना चाहिए कि आज इन जातियों को आरक्षण मिले या नहीं. ख़ैर इस मुद्दे पर तो कोई बात भी नहीं करेगा.
इसकी वजह ये है कि इसमें यादवों के साथ-साथ कुर्मी और जाटों को भी Group A कैटेगरी में डाल दिया गया. और इनका टोटल रिजर्वेशन कम कर दिया. बीजेपी, कुर्मी और जाटों को अपना वोटबैंक मानती हैं. ऐसे में ये रिपोर्ट लागू करना योगी सरकार के लिए संभव नहीं है...
ओबीसी कोटे की लगभग 13% नौकरियां थीं
OBC आरक्षण के review को ले कर उत्तर प्रदेश में पहली रिपोर्ट २००१ में बनी थी. राजनाथ सिंह उस समय मुख्य मंत्री थे. उन्होंने हुकुम सिंह कमेटी बनाई थी. इस रिपोर्ट में बताया कि OBC category में यादवों की आबादी सिर्फ़ 19.4% थी. लेकिन उनके पास 32% OBC कोटे की नौकरियाँ थी. इसी तरह ओबीसी कैटेगरी में कुर्मियों की आबादी 7.46% थी लेकिन उनके पास ओबीसी कोटे की लगभग 13% नौकरियां थीं.
जबकि मल्लाह, राजभर और नाई जैसी जातियां बहुत पीछे छूट गईं. हुकुम सिंह कमेटी ने यूपी में ओबीसी रिजर्वेशन को 27% से बढ़ाकर 28% करने और ओबीसी की सभी 79 जातियों को तीन अलग-अलग सब-कैटेगरी में बांटने की सिफारिश की.
यादवों को लिस्ट 'ए' यानी पिछड़ा वर्ग मानते हुए 5% रिजर्वेशन की सिफारिश की गई. लिस्ट'बी' यानी अधिक पिछड़ा वर्ग में कुर्मी, जाट, लोध, गुर्जर, सैनी, सुनार जैसी 8 जातियां थीं जिनके लिए 9% रिजर्वेशन. और लिस्ट 'सी' अत्यंत पिछड़ा वर्ग की थी, जिसमें मल्लाह, राजभर, कुम्हार, पाल, नाई, बढ़ई, तेली जैसी 70 बेहद पिछड़ी जातियों को रखा गया. इनके लिए सबसे बड़े हिस्से यानी 14% रिजर्वेशन की सिफारिश की गई...
हालांकि इस कमेटी की सिफारिशों को लेकर काफी बवाल मचा और कोर्ट के दखल के बाद इस कमेटी की सिफारिशें लागू नहीं हो पाईं. लेकिन इन सिफारिशों ने उनक कमजोर पिछड़ी जातियों के मन में उम्मीद जरूर जगा दी.
कार्यकाल 14 बार बढ़ाया गया
यूपी तो छोड़िए केंद्र सरकार भी ओबीसी आरक्षण के स्ट्रक्चर को छेड़ने से बच रही है...मोदी सरकार ने ओबीसी रिजर्वेशन के सब-कैटेगराइजेशन 2017 में रोहिणी कमीशन बनाया. दिल्ली हाई कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस जी. रोहिणी को इसका अध्यक्ष बनाया गया. कमीशन को 3 महीने में रिपोर्ट देनी थी. लेकिन इसका कार्यकाल 14 बार बढ़ाया गया. आखिरकार करीब 6 साल बाद 2023 में रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी गई.
रिपोर्ट्स के मुताबिक इस कमीशन ने भी ये माना है कि ओबीसी रिजर्वेशन का बहुत बड़ा हिस्सा कुछ ताकतवर जातियों के पास ही है. केवल 25% जातियों के पास ओबीसी कोटे की 97% सरकारी नौकरियों और educational institutions में admissions हैं. 75% जातियां ऐसी हैं जो सरकारी नौकरियों में लगभग ना के बराबर हैं. इस कमीशन ने भी ओबीसी रिजर्वेशन को चार सब-कैटेगरी में बांटने की सिफारिश की है. लेकिन ये रिपोर्ट भी 2023 से लेकर अब तक धूल खा रही है...
आरक्षण की मांग और बढ़ेगी
बीजेपी भले ही कोटा विद इन कोटा के सवाल से बचना चाह रही हो, लेकिन यूपी में बीजेपी के सहयोगी ओपी राजभर और संजय निषाद जैसे नेता लगातार इसकी डिमांड कर रहे हैं. बाकी राज्यों से भी ऐसी ही आवाजें उठ रही हैं. और अब तो जातीय जनगणना भी हो रही है. तो जाहिर है आरक्षण में आरक्षण की मांग और बढ़ेगी और देखते हैं कब तक सरकारें इसे नजरअंदाज करेंगी.
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