नेपाल में भारी बारिश के कारण बिहार में बाढ़ के खतरे को देखते हुए, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से फ़ोन पर बात की। गृह मंत्री ने राज्य सरकार को संभावित संकट से निपटने के लिए हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (NDRF) को तैनात किया जा रहा है। बिहार CMO का कहना है है कि एक हाई-लेवल मीटिंग की अध्यक्षता करते हुए, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने नेपाल से बिहार में बाढ़ का पानी आने की आशंका को देखते हुए संबंधित जिलों में खास सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। जिला अधिकारियों को स्थिति पर कड़ी नज़र रखने के लिए कहा गया है।
इसमें यह भी कहा गया है कि सभी तटबंधों की मज़बूती और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उनकी लगातार निगरानी की जानी चाहिए। बांधों और तटबंधों की चौबीसों घंटे निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसमें रात में गश्त पर खास ज़ोर दिया गया है। जोखिम वाले और प्रभावित इलाकों में लाउडस्पीकर या माइक्रोफ़ोन का इस्तेमाल करके लोगों तक ज़रूरी जानकारी और चेतावनी लगातार पहुँचाने के निर्देश दिए गए हैं। किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए NDRF और SDRF की टीमें तैनात की गई हैं।
केंद्रीय राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि बिहार में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी की सरकार देश के किसी भी राज्य की मदद के लिए तैयार है, जहां ऐसी स्थिति पैदा हो। मॉनसून से पहले ही, गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। बाढ़ का सामना कर रहे किसी भी राज्य या इलाके की मदद की जाएगी। NDRF की टीम स्टैंडबाय पर है और बाढ़ प्रभावित इलाकों में टीमें पहले ही भेजी जा चुकी हैं।
आपदा प्रबंधन विभाग के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, नेपाल में गंडक नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अचानक बाढ़ (flash flood) का खतरा पैदा होने और पानी के बहाव में अचानक तेज़ी आने की संभावना को देखते हुए बिहार में विशेष सतर्कता बरती जा रही है। अधिकारियों ने बताया है कि गंडक नदी के किनारे बसे ज़िलों में बाढ़ की संभावित स्थिति से निपटने के लिए सभी ज़रूरी तैयारियाँ की जा रही हैं।
पूर्वानुमान में नेपाल के गंडक जलग्रहण क्षेत्र में आने वाले रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा, लमजुंग और तनहुँ ज़िलों के साथ-साथ कोसी जलग्रहण क्षेत्र के दोलखा और सिंधुपालचोक ज़िलों में भी अचानक बाढ़ का ज़्यादा खतरा होने की चेतावनी दी गई है। मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल समीक्षा बैठक हुई, जिसमें प्रभावित जिलों के जिला मजिस्ट्रेट, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और पुलिस अधीक्षक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए शामिल हुए।
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नेपाल के हिमालयी सीमावर्ती जिले रसुवा में आज सुबह आई अचानक और भीषण बाढ़ ने तबाही की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने नेपाल के साथ-साथ भारत की चिंता भी कई गुना बढ़ा दी है। चीन की सीमा और तिब्बत की दिशा से भोटेकोशी नदी में अचानक आए उफान ने देखते ही देखते बस्तियों, बाजारों, पुलों, वाहनों, सीमा व्यापार ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। दर्जनों लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। सबसे गंभीर खबर यह है कि लापता लोगों की प्रारंभिक सूची में 105 भारतीय नागरिक शामिल हैं, जिनमें बड़ी संख्या कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले श्रद्धालुओं की बताई जा रही है। साथ ही यह भी बताया जा रहा है कि नेपाल में आई आपदा के चलते बिहार के कम से कम आधा दर्जन जिलों पर खतरा मंडरा रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक, बाढ़ का सबसे विनाशकारी असर रसुवागढ़ी-तिमुरे क्षेत्र में सुबह करीब नौ बजे दिखाई दिया। भोटेकोशी नदी का जलस्तर अचानक असामान्य रूप से बढ़ा और पानी का तेज बहाव तिमुरे तथा स्याफ्रुबेसी क्षेत्रों में फैल गया। नेपाल सेना के अनुसार, इस अचानक आई जलप्रलय ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। वाहन, व्यापारिक सामान और अन्य संपत्तियां बह गईं। सीमा शुल्क परिसर में खड़े वाहन और वहां रखा सामान भी पानी की भेंट चढ़ गया, जबकि हाल ही में बनाया गया एक पुल तक बह गया। धादिंग जिले के गजुरी में भी एक पुल के बहने की खबर है।
रसुवा जिला प्रशासन ने शुरुआत में ही स्वीकार किया कि तिमुरे और स्याफ्रुबेसी समेत बाजार और आवासीय क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ है। आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रसुवा के अलावा नुवाकोट और धादिंग के निचले इलाकों तक खतरा फैल गया। बाढ़ से प्रभावित बस्तियों में स्याफ्रुबेसी, बेत्रावती, मैलुंग, सल्लेतार, शांतिबाजार, पैरेबेसी, खाल्टी बस्ती, सोले, त्रिशूली और बत्तार जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
वहीं इस आपदा ने कैलाश मानसरोवर यात्रा पर निकले लोगों को लेकर सबसे बड़ी चिंता पैदा की है। नेपाल पर्यटन बोर्ड द्वारा तैयार की गई प्रारंभिक सूची के अनुसार, 384 यात्री लापता बताए गए हैं, जिनमें 291 विदेशी और 93 नेपाली नागरिक शामिल हैं। विदेशी यात्रियों में 105 भारतीय हैं। सूची में ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड, अमेरिका, मलेशिया, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका के नागरिकों के नाम भी शामिल हैं। हालांकि नेपाल पर्यटन बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि यह सूची प्रारंभिक है और ट्रैवल एजेंसियों, गाइडों, स्थानीय प्रशासन तथा सुरक्षा एजेंसियों के साथ इसका सत्यापन किया जा रहा है।
बताया गया है कि बुधवार को करीब 390 यात्रियों को तिब्बत सीमा पार करनी थी। इनमें 93 नेपाली नागरिक भी शामिल थे। दोपहर तक अधिकांश यात्रियों से संपर्क स्थापित नहीं हो सका था। इसीलिए 105 भारतीयों के लापता होने की सूचना ने भारत में उनके परिवारों की चिंता बढ़ा दी है। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस को बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव कार्य में लगाया गया है। हेलीकॉप्टरों की मदद से दुर्गम इलाकों में खोज अभियान चलाया जा रहा है। कई रिपोर्टों के अनुसार हेलीकॉप्टर, ड्रोन और खोजी कुत्तों की मदद ली जा रही है।
उधर, बाढ़ की प्रकृति ने इस आपदा को और रहस्यमय तथा चिंताजनक बना दिया है। नेपाल के जल एवं मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि रसुवा में हुई बारिश इस बाढ़ का कारण नहीं थी। यानी पानी का यह प्रचंड सैलाब स्थानीय वर्षा से पैदा नहीं हुआ। शुरुआती संकेत बताते हैं कि घटना का स्रोत तिब्बत की ओर हो सकता है। आशंका जताई जा रही है कि वहां भूस्खलन से किसी नदी का प्रवाह अस्थायी रूप से रुक गया और बाद में जमा पानी अचानक टूटकर नेपाल की ओर बह निकला। ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट यानी हिमनदीय झील के अचानक फटने की संभावना भी जांच के दायरे में है। हालांकि अभी तक वास्तविक कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
देखा जाये तो यह आशंका इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पिछले वर्ष भी इसी भोटेकोशी नदी में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ में कम से कम 10 लोगों की मौत हुई थी। उस समय जांच में सामने आया था कि एक पहले से पहचानी न गई ‘सुप्राग्लेशियल’ झील के अचानक खाली होने से बाढ़ आई थी। अब एक बार फिर बिना स्थानीय बारिश के नदी का अचानक उफान इस पूरे हिमालयी क्षेत्र में बदलते जलवायु पैटर्न, ग्लेशियरों की अस्थिरता और सीमा पार से आने वाले जल खतरों की ओर इशारा कर रहा है।
इस आपदा का आर्थिक असर भी गहरा है। रसुवा और नुवाकोट क्षेत्र की आठ चालू जलविद्युत परियोजनाएं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 354 मेगावाट है, प्रभावित हुई हैं। इनमें 111 मेगावाट की रसुवागढ़ी जलविद्युत परियोजना, 78 मेगावाट की संजेन खोला परियोजना और 60 मेगावाट की अपर त्रिशूली-3ए परियोजना प्रमुख हैं। इसके अलावा पांच निर्माणाधीन परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचने की सूचना है। नेपाल के लिए यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि ऊर्जा ढांचे और सीमा व्यापार पर सीधा प्रहार है। रसुवागढ़ी सीमा चौकी, जो नेपाल और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है, उसका बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हुआ है।
भारत की दृष्टि से सबसे बड़ा और तात्कालिक संकट 105 भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है। कैलाश मानसरोवर यात्रा धार्मिक आस्था से जुड़ी है और हर वर्ष बड़ी संख्या में भारतीय श्रद्धालु नेपाल के रास्ते तिब्बत पहुंचते हैं। ऐसे में यात्रियों का संपर्क टूटना, सीमावर्ती मार्गों का बह जाना और संचार व्यवस्था का प्रभावित होना भारत के लिए बड़ी चुनौती है। भारतीय नागरिकों की सही स्थिति का जल्द पता लगाने के प्रयास शुरू हो गये हैं तथा नेपाल प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित किया जा रहा है और आवश्यकता पड़ने पर बचाव और निकासी में सहयोग करने की तैयारी भी तेज हो गयी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक चिंताजनक पहलू सीमा पार जल आपदाओं का भी है। यदि बाढ़ का वास्तविक स्रोत तिब्बत में भूस्खलन, ग्लेशियल झील का फटना या किसी नदी का अवरुद्ध होकर अचानक टूटना साबित होता है, तो यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी है। हिमालय में बनने वाली ऐसी झीलें, अचानक भूस्खलन और जल प्रवाह में अवरोध केवल नेपाल तक सीमित खतरा नहीं हैं। नेपाल की नदियां अंततः भारत की विशाल नदी प्रणालियों से जुड़ती हैं। इसलिए ऊपरी हिमालय में किसी भी बड़े जल विस्फोट का प्रभाव नीचे बसे भारतीय क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
उधर, नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन और गोरखा जिलों में नदी किनारे रहने वाले लोगों को हाई अलर्ट पर रहने को कहा है। लेकिन असली सवाल इससे आगे का है। सवाल यह है कि क्या हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों, भूस्खलन से बनने वाली अस्थायी झीलों और सीमा पार जल प्रवाह की निगरानी पर्याप्त है? भोटेकोशी की यह त्रासदी एक बार फिर बता रही है कि हिमालय में आपदा की चेतावनी केवल मौसम पूर्वानुमान से नहीं मिल सकती।
फिलहाल राहत और बचाव अभियान जारी है, मृतकों और लापता लोगों की संख्या बदल सकती है तथा 105 भारतीयों की सूची का सत्यापन अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि रसुवा की यह जलप्रलय केवल नेपाल की एक स्थानीय आपदा नहीं है। यह भारत, नेपाल और पूरे हिमालयी क्षेत्र के सामने खड़े उस नए खतरे की चेतावनी है, जिसमें पिघलते ग्लेशियर, अस्थिर पर्वत, अचानक बनने वाली झीलें और सीमा पार से आने वाला अनियंत्रित जल प्रवाह किसी भी समय हजारों लोगों की जिंदगी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को संकट में डाल सकता है। भोटेकोशी का उफान थम भी जाए, लेकिन इसके पीछे उठे सवाल अब लंबे समय तक शांत नहीं होंगे।
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