आजकल कॉर्पोरट लाइफस्टाइल और डेस्क जॉब में घंटों तक लैपटॉप के सामने बैठे रहना सामान्य नहीं होता है। करीब 7 और 8 घंटे एक ही जगह बैठकर काम करना लोग अपनी आदत बना रहे हैं। आप भी ऑफिस में लगातार 8 घंटे तक लैपटॉप पर वर्क करते होंगे।
अक्सर होता है कि लगातार ऐसे बैठे रहने से न सिर्फ पीठ दर्द और गर्जन में खिंचाव आता है, बल्कि दिमाग भी थक जाता है और कई शारीरिक समस्याएं होने लगती हैं। सुबह के दौरान माइड फ्रेश रहता है, जिससे वर्क भी अच्छे से होता है, लेकिन दोपहर के समय ध्यान भटकने लगता है और आपको थकान महसूस जरुर होती होगी। इन सभी दिक्कतों से बचने के लिए आप 2 मिनट वाला माइक्रो ब्रेक ट्रेंड आजमा सकती हैं। वैसे आजकल वर्किंग लोगों के बीच यह काफी लोकप्रिय है।
2 मिनट वाला 'माइक्रो ब्रेक' ट्रेंड
अब आप भी सोचे रहे होंगे कि क्या है, यह ट्रेंड। दो मिनट की हल्की बॉक या बॉडी स्ट्रैचिंग की यह आसान ट्रिक आपके दिमाग को तुरंत रीफ्रेश कर सकती है। आइए आपको इस ट्रेंड के बारे में जानकारी देते हैं।
क्या है माइक्रो ब्रेक ट्रेंड?
दरअसल, माइक्रो ब्रेक का मतलब है काम के बीच में लिया जाने वाला एक छोटा सा ब्रेक। अगर कोई व्यक्ति ऑफिस में लगतार 30 से 45 मिनट या 1 घंटे तक कार्य करता है, तो इस ट्रेंड के तहत वह बीच-बीच में उठकर 2 मिनट के लिए टहलने लगता है या हल्की मूवमेंट करता है। इसलिए इस एक्टिविटी को माइक्रो ब्रेक कहा जाता है। इसमें आपको घंटों का लंबा ब्रेक लेने की जरुरत नहीं है, आप बस 2 मिनट में ही थोड़ा बहुत घूमकर वापस आकर अपनी सीट पर वर्क कर सकते हैं।
सिटिंग जॉब में कैसे मदद करता है यह ट्रेंड?
बता दें कि, यूके की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा और नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार जब आप हर आधे या एक घंटे में 2 मिनट वाला यह ट्रेंड करते हैं, तो इससे काम का तनाव कम हो जाता है। इस तरह की आदत आपकी आंखों को भी डिजिटल स्क्रीन से कुछ समय के लिए आराम दे सकती है। वहीं, इन छोटे ब्रेक की मदद से आंखों में जलन और सिरदर्द की शिकायत भी कम हो जाती है। असल में यह ट्रेंड उन लोगों के लिए बेहद खास है, जिनको वर्कलोड की वजह से सिर में दर्द बना रहता है।
वर्कप्लेस पर 2 मिनट का माइक्रो ब्रेक कैसे लें?
- जब आप ऑफिस में काम करें, तो हर समय एक घंटे के लिए अलार्म या रिमाइंडर सेट करें।
- फोन पर अलार्म बजते ही अपनी डेस्क से उठें और 2 मिनट के लिए हाथों और कंधों की हल्की स्ट्रैचिंग करें।
- इसके अलावा, आप ऑफिस में थोड़ा बहुत चल-फिर चल सकते हैं, जैसे सीट से उठकर पानी पीने या कैंटीन तक जा सकते हैं।
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आजकल युवाओ से लेकर बड़ों में भी मानसिक तनाव देखने को मिल रहा है। दिनभर में फोन में बिजी रहना और खराब लाइफस्टाइल के कारण हर कोई कहीं न कहीं मेंटल हेल्थ से परेशान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, क मेंटल हेल्थ समझें तो एक मानसिक रुप से सेहतमंद इंसान अपनी क्षमता को जनता है, प्रतिदिन के तनाव को झेल सकता है और प्रोडक्टिविटी के साथ काम भी कर सकता है।
हालांकि, आजकल लोगों की मानसिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है, इन दिनों ट्ब्लू स्पेस जैसी थेरेपी भी दवा का कार्य कर रही है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं ब्लू स्पेस थेरेपी के बारे में और यह क्या है?
क्या है ब्लू स्पेस थेरेपी?
मेंटल हेल्थ से संबंधित मामले में डिजिटल दौर में काफी तेजी देखी जा रही है। जबकि इंटरनेट के दौर से पहले न तो किसी ने डिप्रेशन, अकेलेपन और एंग्जाएटी जैसी बीमारियों के नाम सुने भी नहीं थे। अब हर कोई इन नामों को जानने के साथ-साथ इनके बुरे अनुभव से भी परेशान है। इसलिए आजकल ब्लू स्पेस थेरेपी ट्रेंड में है। इसके नाम से आपको पता चल रहा होगा कि यह ब्लू स्पेस अर्थ पानी से जुड़ी चीजों से हैं, जैसे कि झील, नदी और समंदर।
कुछ रिपोर्ट्स में यह पता चला है कि ब्लू स्पेस के ज्यादा संपर्क में रहने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि तटीय इलाकों में रहने वाले और वहां जाने वाले लोगों में साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस यानी मेंटल हेल्थ से संबंधित परेशानियों कम करती है।
किताब ने भी किया साबित
दरअसल, साल 2014 में मरीन बायोलॉजिस्ट वालेस जें. निकोलस की किताब ब्लू माइंड थी, इस किताब में यह साबित कर दिया था कि पानी के आसपास रहने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल कम हो जाता है और व्यक्ति खुद को लेकर पॉजिटिव महसूस करता है।
पानी के अंदर थेरेपी
खासकर ब्लू स्पेस थेरेपी पानी के आसपास रहने से दिखने वाले सकारात्मक बदलावों की बात करती है, लेकिन इसके फायदों को देखते हुए पानी के अंदर भी इस थेरेपी को दिया जाने लगा है। वहीं, विदेशों में डिप्रेशन, ट्रॉमा और नशे की लत जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए स्कूबा और फ्री-डाइविंग, वेटलेसनेस के अनुभव, ब्रीदवर्क के साथ मेडिटेशन जैसी थेरेपी लोगों को दी जाती हैं। वहीं, सबसे खास एहसास वेटलेसनेस का है, जो कि नर्वस और ब्रेन सिस्टम को दोबारा से रेगुलेट करने में काफी सहायक साबित होता है।
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