आजकल युवाओ से लेकर बड़ों में भी मानसिक तनाव देखने को मिल रहा है। दिनभर में फोन में बिजी रहना और खराब लाइफस्टाइल के कारण हर कोई कहीं न कहीं मेंटल हेल्थ से परेशान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, क मेंटल हेल्थ समझें तो एक मानसिक रुप से सेहतमंद इंसान अपनी क्षमता को जनता है, प्रतिदिन के तनाव को झेल सकता है और प्रोडक्टिविटी के साथ काम भी कर सकता है।
हालांकि, आजकल लोगों की मानसिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है, इन दिनों ट्ब्लू स्पेस जैसी थेरेपी भी दवा का कार्य कर रही है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं ब्लू स्पेस थेरेपी के बारे में और यह क्या है?
क्या है ब्लू स्पेस थेरेपी?
मेंटल हेल्थ से संबंधित मामले में डिजिटल दौर में काफी तेजी देखी जा रही है। जबकि इंटरनेट के दौर से पहले न तो किसी ने डिप्रेशन, अकेलेपन और एंग्जाएटी जैसी बीमारियों के नाम सुने भी नहीं थे। अब हर कोई इन नामों को जानने के साथ-साथ इनके बुरे अनुभव से भी परेशान है। इसलिए आजकल ब्लू स्पेस थेरेपी ट्रेंड में है। इसके नाम से आपको पता चल रहा होगा कि यह ब्लू स्पेस अर्थ पानी से जुड़ी चीजों से हैं, जैसे कि झील, नदी और समंदर।
कुछ रिपोर्ट्स में यह पता चला है कि ब्लू स्पेस के ज्यादा संपर्क में रहने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि तटीय इलाकों में रहने वाले और वहां जाने वाले लोगों में साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस यानी मेंटल हेल्थ से संबंधित परेशानियों कम करती है।
किताब ने भी किया साबित
दरअसल, साल 2014 में मरीन बायोलॉजिस्ट वालेस जें. निकोलस की किताब ब्लू माइंड थी, इस किताब में यह साबित कर दिया था कि पानी के आसपास रहने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल कम हो जाता है और व्यक्ति खुद को लेकर पॉजिटिव महसूस करता है।
पानी के अंदर थेरेपी
खासकर ब्लू स्पेस थेरेपी पानी के आसपास रहने से दिखने वाले सकारात्मक बदलावों की बात करती है, लेकिन इसके फायदों को देखते हुए पानी के अंदर भी इस थेरेपी को दिया जाने लगा है। वहीं, विदेशों में डिप्रेशन, ट्रॉमा और नशे की लत जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए स्कूबा और फ्री-डाइविंग, वेटलेसनेस के अनुभव, ब्रीदवर्क के साथ मेडिटेशन जैसी थेरेपी लोगों को दी जाती हैं। वहीं, सबसे खास एहसास वेटलेसनेस का है, जो कि नर्वस और ब्रेन सिस्टम को दोबारा से रेगुलेट करने में काफी सहायक साबित होता है।
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सुबह का नाश्ता यकीनन काफी मायने रखता है। अधिकतर लोग सुबह उठकर चाय-बिस्कुट, ब्रेड या नमकीन खाना पसंद करते हैं। लेकिन शरीर में आयरन की कमी है, तो नाश्ते का चुनाव सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आप आयरन रिच फूड्स को अपने नाश्ते का हिस्सा बनाएं।
साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि सिर्फ आयरन से भरपूर खाना खाना ही पर्याप्त नहीं होता। शरीर उस आयरन को कितना अवशोषित कर पाता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि आयरन की कमी में “क्या खाएं” के साथ-साथ “किसके साथ खाएं और कब खाएं” जानना ज्यादा काम का है।
बेसन चीला और नींबू का कॉम्बिनेशन
आयरन की कमी वाले लोगों के लिए बेसन से बना चीला एक बेहतरीन नाश्ता हो सकता है। चना और दूसरी दालें प्लांट बेस्ड सोर्स में शामिल हैं। लेकिन यहां एक छोटी-सी गलती पूरी प्लेट को कम इफेक्टिव बना सकती है। आप चीले के साथ सिर्फ दही और चाय लेने के बजाय इसे टमाटर, शिमला मिर्च, हरी धनिया और नींबू के साथ खाएं। विटामिन सी प्लांट बेस्ड आयरन के अब्जॉर्बशन में मदद करता है।
इस तरह खाएं पोहा
नाश्ते में पोहा खाना एक अच्छा आइडिया हो सकता है। लेकिन इसे सही इंग्रीडिएंट्स के साथ बनाया जाए तो यह ज्यादा बैलेंस्ड ब्रेकफास्ट बन सकता है। पोहा बनाते समय इसमें मूंगफली, मटर, थोड़ी मात्रा में चना और हरी सब्जियां जोड़ी जा सकती हैं। इसके साथ नींबू और ताजा टमाटर डालना भी एक अच्छा तरीका है। याद रखें कि नींबू सिर्फ स्वाद के लिए नहीं है। विटामिन सी प्लांट बेस्ड आयरन को अब्जॉर्ब करने में मदद करता है।
खाएं स्प्राउट्स चाट
अगर आप सुबह कुछ हल्का और जल्दी तैयार होने वाला नाश्ता चाहिए, तो मूंग या चने की स्प्राउट्स चाट अच्छा विकल्प हो सकती है। इसे सिर्फ अंकुरित दानों और नमक तक सीमित रखने के बजाय इसमें टमाटर, शिमला मिर्च, धनिया, नींबू, थोड़े भुने चने या मूंगफली डालें। अगर स्प्राउट्स या दालें आपके लिए पचने में भारी लगती हैं, तो मात्रा कम रखें। आयरन बढ़ाने के चक्कर में ऐसा ब्रेकफास्ट चुनने की जरूरत नहीं है जिससे पेट ही परेशान हो जाए।
- मिताली जैन
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