Explainer: सरकार क्यों चाहती है PMFME योजना में 5 साल का और विस्तार? छोटे फूड बिजनेस को कैसे मिलेगा फायदा?
PMFME Scheme Extension: भारत में छोटे स्तर पर फूड प्रोसेसिंग का कारोबार करने वाले उद्यमियों के लिए सरकार की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज (PMFME) को अगले पांच साल तक बढ़ाने की तैयारी है. खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने इस योजना के लिए पांच साल के विस्तार की मांग की है. इसके पीछे मकसद छोटे कारोबारों को ज्यादा समय तक वित्तीय मदद देना, उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ना और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को मजबूत करना है.
क्या है PMFME योजना?
PMFME योजना की शुरुआत 29 जून 2020 को हुई थी. शुरुआत में इसे वित्त वर्ष 2020-25 के लिए 10,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ शुरू किया गया था. बाद में योजना को वित्त वर्ष 2025-26 तक बढ़ाया गया और फिर इसे 30 सितंबर 2026 तक जारी रखा गया.
इस योजना के तहत नए माइक्रो फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने या पहले से चल रहे कारोबार को अपग्रेड करने के लिए वित्तीय, तकनीकी और कारोबारी सहायता दी जाती है.
सबसे अहम मदद 35% क्रेडिट-लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी है. इसके तहत अधिकतम 30 लाख रुपये तक की परियोजना लागत पर सब्सिडी उपलब्ध है.
छोटे कारोबारों को फॉर्मल बनाने की जरूरत क्यों?
देश में बड़ी संख्या में छोटे फूड प्रोसेसिंग कारोबार अनौपचारिक तरीके से चलते हैं. इनमें घर से चलने वाले कारोबार, छोटे पैमाने के खाद्य निर्माता और स्थानीय स्तर के प्रोसेसिंग यूनिट शामिल हैं.
फॉर्मल होने से इन कारोबारों को कई फायदे मिल सकते हैं.
- बैंक और संस्थागत वित्त तक पहुंच आसान हो सकती है.
- बेहतर मशीनरी और तकनीक में निवेश संभव होगा.
- पैकेजिंग और क्वालिटी में सुधार किया जा सकेगा.
- बड़े रिटेलर और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच बढ़ सकती है.
- कारोबार का बाजार और ग्राहक आधार बढ़ सकता है.
सरकार के लिए भी इसका फायदा है, क्योंकि फॉर्मल कारोबारों की जानकारी उपलब्ध होने से वित्तीय सहायता और दूसरी योजनाओं को ज्यादा बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है.
योजना का अब तक कितना फायदा हुआ?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 जून तक 2,00,421 माइक्रो फूड एंटरप्राइजेज को मंजूरी दी जा चुकी थी. इनके लिए करीब 5,954.57 करोड़ रुपये की क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी मंजूर हुई. इन परियोजनाओं में लगभग 14,480.24 करोड़ रुपये का निजी निवेश भी जुड़ा है.
एक खास बात यह है कि योजना के लाभार्थियों में 40% से ज्यादा महिलाएं हैं. इससे ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के छोटे कारोबार को बढ़ावा देने में भी योजना की भूमिका सामने आती है.
किन राज्यों में सबसे ज्यादा लाभार्थी?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार PMFME के तहत सबसे ज्यादा लाभार्थी बिहार में हैं.
| राज्य | लाभार्थी |
|---|---|
| बिहार | 33,123 |
| महाराष्ट्र | 31,955 |
| उत्तर प्रदेश | 27,681 |
| तमिलनाडु | 19,894 |
| मध्य प्रदेश | 16,475 |
| कर्नाटक | 10,672 |
| आंध्र प्रदेश | 10,342 |
| केरल | 10,267 |
| तेलंगाना | 8,004 |
| असम | 6,923 |
बिहार का प्रदर्शन खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में छोटे खाद्य प्रसंस्करण कारोबार इस योजना से जुड़े हैं.
सरकार पांच साल और क्यों चाहती है?
सरकार का मानना है कि योजना को पांच साल और जारी रखने से छोटे उद्यमियों को लंबे समय तक नीतिगत स्थिरता मिलेगी. फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने या मौजूदा कारोबार को बढ़ाने में समय और पूंजी दोनों की जरूरत होती है. ऐसे में लंबी अवधि की योजना कारोबारियों को निवेश के लिए ज्यादा भरोसा दे सकती है.
इसके अलावा सरकार को उन क्षेत्रों में भी सुधार करने का समय मिलेगा जहां अभी चुनौतियां बनी हुई हैं. इनमें फॉर्मलाइजेशन, तकनीक अपनाना और सस्ता वित्त हासिल करना प्रमुख हैं.
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किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है योजना
PMFME का असर केवल छोटे कारोबारियों तक सीमित नहीं है. फूड प्रोसेसिंग बढ़ने से किसानों को भी फायदा हो सकता है. कच्चे कृषि उत्पादों को सीधे बेचने के बजाय अगर उनका प्रसंस्करण, पैकेजिंग और वैल्यू एडिशन किया जाए तो उनकी बाजार कीमत बढ़ सकती है. इससे किसानों के लिए नए बाजार और खरीदार पैदा हो सकते हैं. साथ ही, फूड प्रोसेसिंग बढ़ने से फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान यानी पोस्ट-हार्वेस्ट लॉस को कम करने में भी मदद मिल सकती है.
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अभी कितनी बड़ी है संभावना?
भारत में फूड प्रोसेसिंग की क्षमता बढ़ाने की काफी गुंजाइश है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में अभी केवल करीब 17% खराब होने वाली कृषि उपज (perishable produce) ही प्रोसेस होती है.
इसका मतलब है कि बड़ी मात्रा में फल, सब्जियां और अन्य जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पाद बिना पर्याप्त प्रोसेसिंग के बाजार में पहुंचते हैं या नुकसान का शिकार हो जाते हैं. अगर छोटे स्तर की प्रोसेसिंग यूनिट बढ़ती हैं तो स्थानीय स्तर पर ही इन उत्पादों की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग संभव हो सकती है.
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पांच साल का विस्तार क्या बदल सकता है?
अगर सरकार की योजना के मुताबिक PMFME को पांच साल और बढ़ाया जाता है तो इसका सबसे बड़ा फायदा नीतिगत निरंतरता के रूप में मिल सकता है.
इससे छोटे उद्यमियों को नई यूनिट लगाने, मशीनरी खरीदने, कारोबार का विस्तार करने और संस्थागत कर्ज लेने में ज्यादा भरोसा मिल सकता है. साथ ही ग्रामीण और छोटे शहरों में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना है.
PMFME सिर्फ सब्सिडी देने वाली योजना नहीं है. इसका बड़ा उद्देश्य देश के छोटे और अनौपचारिक फूड कारोबारों को फॉर्मल, प्रतिस्पर्धी और वित्तीय रूप से मजबूत बनाना है.
अब तक 2 लाख से ज्यादा यूनिट को मंजूरी और हजारों करोड़ रुपये के निजी निवेश से योजना की पहुंच दिखाई देती है. लेकिन देश में फूड प्रोसेसिंग की अभी भी बड़ी क्षमता बाकी है. ऐसे में पांच साल का प्रस्तावित विस्तार छोटे कारोबार, किसानों, ग्रामीण रोजगार और भारत के फूड प्रोसेसिंग सेक्टर, चारों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
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महाराष्ट्र : स्वास्थ्य मंत्री ने सभी अस्पतालों में आग और बिजली सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए
मुंबई, 25 अगस्त (आईएएनएस)। सार्वजनिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री प्रकाश अबितकर ने मंगलवार को महाराष्ट्र भर के सभी सरकारी, निजी और चैरिटेबल हेल्थकेयर सेंटर्स को निर्देश दिया कि वे तुरंत आग, बिजली, स्ट्रक्चर और इक्विपमेंट से जुड़ी सुरक्षा ऑडिट करें और अपनी रिपोर्ट सीधे राज्य सरकार को सौंपें।
यह निर्देश पूरे राज्य में आग से बचाव के उपायों, आपातकालीन स्थिति में बाहर निकलने के नियमों और बिजली से जुड़ी सुरक्षा के मानकों को लागू करने की पहल का हिस्सा है।
अबितकर ने इस बात पर जोर दिया कि मरीजों की सुरक्षा सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और चेतावनी दी कि आग से सुरक्षा के मामले में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अस्पतालों के प्रमुखों, क्षेत्रीय उप-निदेशकों, सिविल सर्जनों, जिला स्वास्थ्य अधिकारियों, नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारियों और मेडिकल सुपरिटेंडेंट को अपने-अपने क्षेत्रों में नियमों के पालन की जांच के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार बनाया गया है।
स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह ज्यादा जोखिम वाले यूनिटों, जैसे आईसीयू, एनआईसीयू, नर्सरी और ऑपरेशन थिएटर की सघन समीक्षा करे। निरीक्षक बिजली की वायरिंग और लोड मैनेजमेंट, मेडिकल गैस पाइपलाइन सिस्टम, बाहर निकलने के रास्ते, आग बुझाने वाले उपकरणों की तैयारी और स्टाफ़ की ट्रेनिंग की जाँच करेंगे। किसी भी कमी को तुरंत ठीक किया जाना चाहिए।
हर अस्पताल की इमारत और ब्लॉक की हर छह महीने में आग से सुरक्षा के लिहाज से भौतिक जांच होनी चाहिए। हर संस्थान को बिजली सुरक्षा, बाहर निकलने की योजनाओं और मॉक ड्रिल की निगरानी करने और नियमित रूप से अनुपालन रिपोर्ट जमा करने के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा।
अबितकर ने साफ किया कि अगर ऑडिट में देरी या कमियों को ठीक न करने की वजह से कोई बुरी घटना होती है, तो संस्थान के प्रमुख सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे। सभी सुविधाओं को आग और जीवन सुरक्षा से जुड़े राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा और सरकार को प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी।
यह निर्देश अमरावती अस्पताल की उस दुखद घटना के बाद आया है जिसमें ज्यादा धुंए के कारण दम घुटने से तीन नवजात शिशुओं की मौत हो गई थी। बचाव दल ने 36 बच्चों को बाहर निकाला, जिनमें से छह को जरूरी इलाज के लिए निजी अस्पताल में भेजा गया।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही, राजस्व मंत्री और अमरावती के प्रभारी मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने चेतावनी दी है कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, जिसमें गैर-इरादतन हत्या के आरोप भी शामिल हो सकते हैं।
--आईएएनएस
एससीएच
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