शरीर और दिमाग के लिए फायदेमंद रोना, तनाव घटाने से लेकर आंखों की सफाई तक, जानें आंसुओं के फायदे
नई दिल्ली, 25 अगस्त (आईएएनएस)। रोते हुए किसी को देखकर हम अक्सर मान लेते हैं कि वह बहुत कमजोर है या अपनी इमोशन्स को संभाल नहीं पा रहा। खासकर बचपन से हमें कई बार कहा जाता है कि रोओ मत, मजबूत बनो, लेकिन सच यह है कि रोने से शरीर और मन पर इसके कुछ अच्छे असर भी हो सकते हैं। जब इंसान बहुत ज्यादा परेशान या तनाव में होता है, तो उसका शरीर भी इसका असर महसूस करता है।
दिल तेजी से धड़कता है, बेचैनी बढ़ती है और दिमाग में एक ही बात बार-बार घूमती रहती है। ऐसे समय में रो लेने के बाद कई लोगों को कुछ राहत महसूस होती है। इसका एक कारण यह है कि रोने के दौरान हम अपने अंदर छिपी भावनाओं को बाहर आने देते हैं। इससे मन पर बना दबाव कुछ कम महसूस हो सकता है।
तनाव के बाद शरीर को शांत करने में मदद करता है रोना- वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब हम तनाव में होते हैं, तो शरीर का स्ट्रेस सिस्टम सक्रिय हो जाता है। दिल की धड़कन बढ़ सकती है, मांसपेशियों में खिंचाव आता है और दिमाग लगातार परेशान करने वाली बातों के बारे में सोचता रहता है। भावनात्मक रूप से रोने के बाद कुछ लोगों में शरीर के शांत होने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम शरीर को आराम की स्थिति में वापस लाने में भूमिका निभाता है।
इमोशन्स को बाहर निकालने का तरीका हैं आंसू- कई बार हम किसी बात से बहुत परेशान होते हैं, लेकिन उसे शब्दों में समझा नहीं पाते। ऐसी स्थिति में रोना इमोशन्स को जाहिर करने का एक स्वाभाविक तरीका बन जाता है। किसी भरोसेमंद व्यक्ति के सामने रोने से बातचीत शुरू हो सकती है और सामने वाला यह समझ सकता है कि हम अंदर से परेशान हैं। इस तरह आंसू कभी-कभी लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाने का काम भी करते हैं।
अब सवाल आता है कि रोने के बाद मन हल्का क्यों लगता है?, दरअसल, भावनात्मक रोने के दौरान शरीर में कई तरह की प्रक्रियाएं चलती हैं। कुछ शोधों में पाया गया है कि रोने के बाद लोगों को शांत और भावनात्मक रूप से बेहतर महसूस होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि व्यक्ति कुछ देर के लिए अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें स्वीकार करता है। आंसुओं में तनाव के हार्मोन निकलते हैं और इसी वजह से तनाव खत्म हो जाता है, जिससे नींद आसानी से आ जाती है।
आंखों के लिए आंसू बेहद जरूरी हैं। वे आंखों की सतह को नम रखते हैं और पलक झपकने के साथ आंखों पर एक पतली परत बनाए रखते हैं। यही परत आंखों को सूखने से बचाने और बाहरी कणों को हटाने में मदद करती है। धूल या किसी जलन पैदा करने वाली चीज के आंख में जाने पर अचानक आंसू आना भी शरीर की सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि लगातार आंखों से पानी आना किसी दूसरी समस्या का संकेत भी हो सकता है।
कभी-कभार रोना बिल्कुल सामान्य है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को रोज या बहुत बार रोने का मन करता है, वह खुद को रोक नहीं पाता और इसका असर उसके काम, रिश्तों या रोज की जिंदगी पर पड़ने लगा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना मददगार हो सकता है।
--आईएएनएस
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कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई आज, जानें क्या है विवाद, अब तक क्या-क्या हुआ?
Krishna Janmabhoomi: मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद से जुड़े मामले में आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई प्रस्तावित है. न्यायमूर्ति अविनाश सक्सेना की अदालत में दोपहर 2 बजे से मामले पर सुनवाई होनी है. इस सुनवाई पर दोनों पक्षों की नजरें टिकी हैं, क्योंकि अदालत के सामने विवाद से जुड़े अलग-अलग कानूनी पहलू हैं.
लोक अदालत में समझौते की कोशिश नाकाम
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की कोशिश भी की गई थी. स्थानीय स्तर पर तीन बार बातचीत कराने का प्रयास हुआ. अंतिम बातचीत के लिए 18 अगस्त को लोक अदालत में दोनों पक्षों को बुलाया गया था. हिंदू पक्ष की ओर से प्रतिनिधि मौजूद रहे, लेकिन मुस्लिम पक्ष की ओर से कोई प्रतिनिधि वार्ता में शामिल नहीं हुआ. इसके बाद लोक अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर समझौता वार्ता को विफल मान लिया. हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, समझौता वार्ता से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट में 21, 22 और 23 अगस्त को सुनवाई प्रस्तावित थी. हालांकि, इन तारीखों पर मामला अदालत के सामने सुनवाई के लिए नहीं आ सका. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई पर इसलिए भी नजर है कि आगे की न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है.
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आखिर क्या है पूरा विवाद?
यह विवाद करीब 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक और धार्मिक स्थल से जुड़े दावों को लेकर है. हिंदू पक्ष का दावा है कि यह भूमि भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है. उसके मुताबिक, इस परिसर के एक हिस्से में श्रीकृष्ण मंदिर है, जबकि करीब 2.37 एकड़ हिस्से में शाही ईदगाह मस्जिद स्थित है. हिंदू पक्ष मस्जिद को हटाने की मांग कर रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष की ओर से इस मामले में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 समेत विभिन्न कानूनी दलीलें दी जाती रही हैं. हिंदू पक्ष इस विवाद को मुगल काल से जोड़ता है. उसका दावा है कि 1670 में औरंगजेब के शासनकाल में मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर स्थित मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया गया था और बाद में वहां शाही ईदगाह का निर्माण हुआ. इस दावे के समर्थन में ऐतिहासिक दस्तावेजों और यात्रियों के विवरणों का भी हवाला दिया जाता है. हालांकि, इस पूरे ऐतिहासिक पक्ष को लेकर अलग-अलग दावे और व्याख्याएं मौजूद हैं. इसलिए इसे अदालत में चल रहे कानूनी विवाद से अलग ऐतिहासिक संदर्भ के तौर पर देखना जरूरी है.
जमीन की खरीद से लेकर मंदिर निर्माण तक
1944 में इस जमीन को उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने राजा पटनीमल के वारिसों से खरीदा था. इसके बाद 1951 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट का गठन हुआ और जमीन ट्रस्ट को सौंपे जाने की बात सामने आती है. 1953 में ट्रस्ट के सहयोग से मंदिर निर्माण का काम शुरू हुआ और 1958 में मंदिर बनकर तैयार हुआ. इसी दौरान 1958 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान नाम की संस्था अस्तित्व में आई. विवाद में 1968 का समझौता भी एक अहम मुद्दा है. श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और मुस्लिम पक्ष के बीच हुए समझौते में मंदिर और मस्जिद दोनों के अस्तित्व को स्वीकार किए जाने की बात कही जाती है. हालांकि, हिंदू पक्ष का कहना है कि यह समझौता श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट ने नहीं किया था और वह इसे मान्यता नहीं देता. इसी वजह से 1968 के समझौते की कानूनी वैधता भी विवाद का हिस्सा बनी हुई है.
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2022 के सर्वे से फिर गरमाया मामला
मामले में 2022 में उस समय नया मोड़ आया, जब सिविल जज ने शाही ईदगाह मस्जिद का अमीन के जरिए सर्वे कराने का आदेश दिया था. इसके बाद विवाद अदालतों में और आगे बढ़ा. अब हिंदू पक्ष मस्जिद हटाने और भूमि पर अपने दावे को लेकर न्यायिक समाधान चाहता है, जबकि मुस्लिम पक्ष अपने कानूनी अधिकारों और Places of Worship Act का हवाला दे रहा है.
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