डोनाल्ड ट्रंप पिछले दिनों चीन की यात्रा कर चुके हैं और अब उन्होंने दावा किया है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो सप्ताह के भीतर अमेरिका आने वाले हैं। सामने से दिख रहा है कि दोनों देशों के नेता बातचीत कर रहे हैं, उच्चस्तरीय संपर्क बनाए हुए हैं और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं तनाव को नियंत्रित करने का संदेश दे रही हैं। लेकिन इस कूटनीतिक मुस्कान के पीछे हकीकत बिल्कुल अलग है। वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच एक नया शीत युद्ध पूरी रफ्तार से चल रहा है और उससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि दोनों पक्ष भविष्य के संभावित युद्ध की तैयारी अभी से कर रहे हैं।
हम आपको बता दें कि व्यापार, तकनीक, ताइवान, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक में प्रभाव की लड़ाई अब कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गयी है। चीन अपनी मिसाइल और हाइपरसोनिक ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, जबकि अमेरिका प्रशांत महासागर के द्वीपों, सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों के नेटवर्क के जरिए बीजिंग को घेरने की रणनीति तैयार कर रहा है। यानी सामने बातचीत है, लेकिन पर्दे के पीछे युद्ध की शतरंज बिछ चुकी है।
चीन का नया हाइपरसोनिक दांव, अमेरिका की युद्ध मशीन पर सीधा निशाना
इस उभरते टकराव में चीन का सबसे नया और सबसे खतरनाक कदम उसकी हाइपरसोनिक क्षमता से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक चीनी सेना ने ऐसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल विकसित किए हैं, जो हवा से हवा में मार करने वाले हथियार लॉन्च कर सकते हैं। यह क्षमता अमेरिका के उन महंगे और अत्यंत महत्वपूर्ण विमानों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है, जो अब तक युद्धक्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर रहकर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे।
चीन का निशाना केवल किसी लड़ाकू विमान को गिराना नहीं है। उसकी रणनीति अमेरिका की पूरी एयर ऑपरेशन आर्किटेक्चर को चोट पहुंचाने की है। अमेरिकी टैंकर विमान, एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम और E-4B Nightwatch जैसे उड़ते कमांड पोस्ट अमेरिका की सैन्य ताकत की रीढ़ हैं। टैंकर लड़ाकू विमानों को लंबी दूरी तक पहुंच देते हैं, AWACS दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है और एयरबोर्न कमांड प्लेटफॉर्म युद्ध संचालन को नियंत्रित करते हैं। अगर चीन इन “दूर लेकिन निर्णायक” लक्ष्यों तक पहुंचने की क्षमता हासिल कर लेता है, तो अमेरिका की पूरी हवाई युद्ध प्रणाली दबाव में आ सकती है।
चीन की मिसाइल ताकत का पैमाना भी इस खतरे को और गंभीर बनाता है। अमेरिकी आकलन के अनुसार चीन के पास 2024 तक कम से कम 3,150 बैलिस्टिक मिसाइलें और लगभग 300 ग्राउंड लॉन्च्ड क्रूज मिसाइलें थीं। DF-17 से लॉन्च किया गया हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल लगभग 1,500 मील तक जा सकता है, जबकि DF-27 की अनुमानित रेंज लगभग 5,000 मील है। यानी चीन अब केवल अपने तटीय क्षेत्र की रक्षा की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दूरस्थ ऑपरेशनल नेटवर्क को भी खतरे में लाने की क्षमता बढ़ा रहा है।
हालांकि इस हथियार के इस्तेमाल की अपनी जटिलताएं भी हैं। हजारों किलोमीटर दूर उड़ते विमान को निशाना बनाने के लिए बेहद सटीक और लगातार अपडेट होने वाली टारगेटिंग जानकारी चाहिए। मिसाइल की लंबी “किल चेन” को बाधित किया जा सकता है और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च को परमाणु हमले के रूप में गलत समझे जाने का खतरा भी मौजूद है। लेकिन अगर चीन इन तकनीकी चुनौतियों को प्रभावी ढंग से पार कर लेता है, तो अमेरिका के लिए यह रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है।
अमेरिका की घेराबंदी, चीन का जवाब
अमेरिका की रणनीति भी कम आक्रामक नहीं है। वॉशिंगटन प्रशांत क्षेत्र में जापान, ताइवान और फिलीपींस जैसे सहयोगियों के सहारे चीन को पहली द्वीप श्रृंखला के भीतर सीमित रखने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर गुआम, कैरोलाइन द्वीप और टिनियन जैसे ठिकाने अमेरिकी सैन्य अभियानों के महत्वपूर्ण लॉन्चपैड हैं।
अमेरिका की योजना है कि छोटे-छोटे द्वीपों और ठिकानों पर अपनी सैन्य क्षमता को फैलाया जाए ताकि चीन के सामने एक ही बड़ा लक्ष्य न रहे, बल्कि उसे असंख्य ठिकानों और लॉन्च पोजीशन से जूझना पड़े। इन द्वीपों को समुद्र में किलों की तरह इस्तेमाल करने की तैयारी है। NMESIS जैसे लगभग 300 किलोमीटर रेंज वाले हथियारों के जरिए चीन की नौसेना के लिए समुद्री इलाकों को खतरनाक बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है। इसके पीछे अंतरिक्ष, हवा, जमीन और समुद्र के नीचे तक फैला निगरानी नेटवर्क काम करेगा।
लेकिन चीन भी इस अमेरिकी घेराबंदी को समझ चुका है। बीजिंग की रॉकेट फोर्स अब उन्हीं अमेरिकी एयरबेस और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रही है, जिनके सहारे वॉशिंगटन भविष्य के किसी संघर्ष में चीन पर दबाव बनाना चाहता है। यही इस नए हथियारों के मुकाबले की असली तस्वीर है। यानि अमेरिका चीन को द्वीपों से घेरना चाहता है, जबकि चीन मिसाइलों से उन द्वीपों और अमेरिकी ठिकानों को निशाने पर लेना चाहता है।
ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात, लेकिन तनाव जस का तस
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि शी जिनपिंग दो सप्ताह में अमेरिका आ सकते हैं। ट्रंप ने अपने चीन दौरे और बीजिंग के ग्रेट हॉल का उल्लेख करते हुए व्हाइट हाउस परिसर में नए निर्माण, बॉलरूम और एक सैन्य परिसर की योजना का भी जिक्र किया। हालांकि जिनपिंग की प्रस्तावित यात्रा को लेकर चीन की ओर से उपलब्ध सामग्री में कोई अलग आधिकारिक घोषणा नहीं थी।
यह संभावित मुलाकात दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहने का संकेत जरूर है, लेकिन इससे रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता खत्म होने के कोई संकेत नहीं मिलते। ताइवान, व्यापार, तकनीक, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक पर दोनों देशों के हित सीधे टकराते हैं। इसलिए कूटनीतिक बातचीत का एक उद्देश्य तनाव को नियंत्रित करना भी है, ताकि यह प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित सैन्य टकराव में न बदल जाए।
अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी है खाली होते हथियार भंडार
उधर, शिंगटन के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जिस समय वह चीन के साथ संभावित लंबे संघर्ष की तैयारी कर रहा है, उसके हथियार भंडार पहले ही भारी दबाव में हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगियों ने बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराए। इसके बाद ईरान के साथ संघर्ष ने प्रिसिजन हथियारों और एयर डिफेंस इंटरसेप्टर की मांग और बढ़ा दी। स्थिति इतनी गंभीर है कि अमेरिका के सामने अब केवल महंगे और अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। कई सिस्टमों की उत्पादन अवधि तीन से चार साल तक हो सकती है। इसलिए अब “प्रिसाइज मास” की सोच पर जोर दिया जा रहा है। यानी बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन, सेंसर और ऐसे हथियार तैयार करना जिन्हें तेजी से बनाया जा सके और युद्ध में बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सके।
बहरहाल, ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकातें दुनिया को तनाव कम होने का संदेश दे सकती हैं, लेकिन जमीन पर अमेरिका और चीन दोनों भविष्य के संघर्ष के लिए अपनी-अपनी सैन्य मशीन को तैयार कर रहे हैं। चीन हाइपरसोनिक हथियारों और विशाल मिसाइल शक्ति से अमेरिकी सैन्य नेटवर्क की नसों पर वार करने की क्षमता विकसित कर रहा है। वहीं अमेरिका द्वीपों, गठबंधनों, पनडुब्बियों और फैले हुए सैन्य ठिकानों के जरिए चीन को घेरने की कोशिश कर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि बातचीत की मेज के पीछे दोनों महाशक्तियां जिस युद्ध की तैयारी कर रही हैं, अगर वह कभी वास्तविक संघर्ष में बदल गया तो प्रशांत महासागर में पहला वार कौन करेगा और कौन उसे सहने के लिए ज्यादा तैयार होगा?
-नीरज कुमार दुबे
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ईरान की आधिकारिक 'फार्स समाचार एजेंसी' ने सुप्रीम लीडर मोजतबा अली खामेनेई का एक दुर्लभ और अप्रत्याशित वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में 56 वर्षीय ईरानी नेता एक धार्मिक शैक्षणिक अध्ययन सत्र की अध्यक्षता करते नजर आ रहे हैं। इस फुटेज के सामने आने के बाद वैश्विक स्तर पर मोजतबा खामेनेई की सेहत को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर एक नया मोड़ आ गया है। इस रिकॉर्डिंग में पहली बार मोजतबा की आवाज सार्वजनिक रूप से सुनी गई है, जिसमें वे अपने छात्रों के साथ ईरानी शासन के 'इस्लामिक सुरक्षा मॉडल' पर चर्चा करते और एक छात्र की थीसिस का मूल्यांकन करते दिखाई दे रहे हैं।
ईरान की फार्स समाचार एजेंसी द्वारा साझा किए गए इस वीडियो में पहली बार मोजतबा की आवाज़ सार्वजनिक रूप से सुनी गई है, जिसमें वे छात्रों के साथ ईरानी शासन के "इस्लामिक सुरक्षा मॉडल" पर चर्चा कर रहे हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह रिकॉर्डिंग कब की गई थी। यह वीडियो ऐसे समय में जारी किया गया है जब ऐसी खबरें आ रही हैं कि 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल के समन्वित हमलों में मोजतबा गंभीर रूप से घायल हो गए थे; इन्हीं हमलों में उनके पिता और पूर्ववर्ती नेता अली खामेनेई मारे गए थे।
मोजतबा खामेनेई की दुर्लभ झलक
वीडियो में, मोजतबा एक छात्र की थीसिस प्रस्तुति सुनते हुए दिखाई देते हैं और फिर उसे 20 में से 19.5 अंक देते हैं तथा काम को "बेदाग" बताते हैं। यह वीडियो ईरानी नेता की एक दुर्लभ सार्वजनिक झलक पेश करता है, जो युद्ध शुरू होने के बाद से ही ज़्यादातर लोगों की नज़र से दूर रहे हैं।
56 वर्षीय मोजतबा को ईरान का सुप्रीम लीडर तब नामित किया गया था जब उनके पिता, 86 वर्षीय अली खामेनेई, अमेरिका-इज़राइल हमलों के पहले ही दिन मारे गए थे। इन हमलों ने पश्चिम एशिया में बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ दिया था।
सार्वजनिक रूप से दिखाई न देने के कारण उनकी सेहत और ईरान के राजनीतिक व सैन्य ढांचे में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कई अमेरिकी अधिकारियों और मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि 28 फरवरी के हमलों के दौरान उन्हें "चेहरे और पैर" पर गंभीर चोटें आई थीं और तब से वे ठीक हो रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, मध्य तेहरान में सुप्रीम लीडर के परिसर पर हुए हमले में मोजतबा का चेहरा बुरी तरह प्रभावित हुआ था और उनके एक या दोनों पैरों में गंभीर चोट आई थी। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि घावों से उबरने के दौरान भी वे "मानसिक रूप से सतर्क" रहे।
वे ऑडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकों में भाग लेते रहे हैं और युद्ध तथा वाशिंगटन के साथ बातचीत से जुड़े अहम फैसलों में शामिल रहते हैं।
अमेरिका-ईरान तनाव
यह नया वीडियो ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल ही में दोनों देशों के बीच एक शुरुआती समझौता ज्ञापन (MoU) की समय-सीमा खत्म हो गई, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि तेहरान के साथ आगे कोई बातचीत नहीं हो रही है।
वॉशिंगटन ने ईरान पर आर्थिक दबाव भी बढ़ा दिया है। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने प्रतिबंधों का एक अभियान शुरू किया है, जिसका मकसद तेहरान की आर्थिक जीवन-रेखाओं को काटना है, क्योंकि युद्ध को छह महीने पूरे होने वाले हैं।
एक और बड़ा विवादित मुद्दा रणनीतिक 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' से शिपिंग को फिर से शुरू करने का है, जहाँ से दुनिया का लगभग पाँचवां हिस्सा तेल और गैस का व्यापार होता है। यह मुद्दा दोनों पक्षों के बीच मतभेद का एक बड़ा कारण बना हुआ है।
बेसेंट ने यह भी घोषणा की कि वॉशिंगटन 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' (secondary sanctions) का दायरा बढ़ाएगा और ईरान के साथ व्यापार जारी रखने वाले देशों को चेतावनी दी कि उन्हें भी तेहरान की तरह 'अलग-थलग' होना पड़ सकता है।
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