सरकार ने गेहूं के आटे, मैदा और सूजी के निर्यात पर लगी पाबंदियां हटाईं
India lifts Ban on Flour and Wheat Export: केंद्र सरकार ने गेहूं से बने कई उत्पादों की निर्यात नीति में बदलाव करते हुए उन्हें प्रतिबंधित श्रेणी से मुक्त श्रेणी में डाल दिया है. यह जानकारी विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना में दी गई. संशोधित नीति के तहत अब गेहूं या मेस्लिन आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा और मिश्रित गेंहू के आटा के निर्यात की अनुमति बिना किसी प्रतिबंध के होगी.
2022 में लगाया गया था निर्यात प्रतिबंध
घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए केंद्र सरकार ने 2022 में गेहूं और गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए थे. 13 मई 2022 को गेहूं की निर्यात नीति को मुक्त से प्रतिबंधित श्रेणी में कर दिया गया था. इसके बाद उसी साल अगस्त में गेहूं के आटे के निर्यात पर भी प्रतिबंध लागू कर दिए गए.
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद बढ़ी थी मांग
यह फैसला रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद वैश्विक स्तर पर गेहूं की आपूर्ति में आए व्यवधान के बीच लिया गया था. इससे भारतीय गेहूं की विदेशी मांग बढ़ गई थी और घरेलू कीमतों पर भी दबाव बढ़ा था. उस दौरान सरकार ने कहा था कि देश की 1.4 अरब आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और गेहूं तथा गेहूं के आटे की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए निर्यात प्रतिबंध जरूरी थे.
हालांकि, प्रतिबंध के बावजूद गेहूं से बने कुछ विशेष उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी गई थी. इस साल फरवरी में सरकार ने बेहतर स्टॉक उपलब्धता का हवाला देते हुए 25 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) गेहूं और अतिरिक्त 5 एलएमटी गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी.
देश में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन
मई में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 2025-26 में 5.3 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 37.6563 करोड़ टन हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह 35.7732 करोड़ टन था.
फसलवार आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में चावल का उत्पादन 15.4024 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2024-25 के 15.0184 करोड़ टन से 38.4 लाख टन अधिक है. वहीं, गेहूं का उत्पादन 12.0657 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 11.7945 करोड़ टन की तुलना में 27.12 लाख टन अधिक है.
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(DISCLAIMER: समरी और सबहेड के अलावा, पूरी खबर IANS न्यूज फीड से ली गई है. न्यूजनेशन खबर में किए गए किसी भी डेटा और फैक्ट्स की पुष्टि नहीं करता है.)
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 'मेडिकल डिवाइसेस रूल्स 2017' में संशोधन का रखा प्रस्ताव
नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। सरकार ने मेडिकल डिवाइस सेक्टर में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (ईओडीबी) को बढ़ावा देने, रेगुलेटरी प्रक्रियाओं को आसान बनाने, पारदर्शिता बढ़ाने और देश में एडवांस्ड मेडिकल टेक्नोलॉजी तक समय पर पहुंच आसान बनाने के मकसद से अहम रेगुलेटरी सुधार किए हैं।
इस मकसद को पूरा करने के लिए हाल ही में चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 (मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017) में बदलाव किए गए हैं। इन बदलावों का मकसद मेडिकल डिवाइस की आउटसोर्स स्टरलाइजेशन प्रक्रिया के लिए रेगुलेटरी नियमों को आसान बनाना और क्लिनिकल जांच की ज़रूरतों से छूट के लिए मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी अधिकार-क्षेत्रों की सूची का विस्तार करना है।
मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 के नियम 44 में बदलाव को सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक बातचीत के बाद अंतिम रूप दिया गया है। इसका मकसद उन मेडिकल डिवाइस निर्माताओं के लिए रेगुलेटरी नियमों का पालन आसान बनाना है जो आउटसोर्स स्टरलाइज़ेशन सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं।
बदले हुए नियमों के तहत, जो निर्माता मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 के तहत वैध लाइसेंस वाली किसी दूसरी सुविधा से प्रोडक्ट स्टरलाइजेशन का काम आउटसोर्स करते हैं, उन्हें अब आउटसोर्स स्टरलाइजेशन गतिविधि के लिए अलग से लोन लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी।
इस संशोधन से ऐसे मामलों में अलग लोन लाइसेंसिंग प्रक्रिया की जरूरत खत्म हो जाएगी, जिससे दोहराव, प्रशासनिक बोझ, अनुपालन लागत और उससे जुड़े समय में कमी आएगी, खासकर उन निर्माताओं के लिए जिनके पास इन-हाउस स्टरलाइजेशन सुविधाएं नहीं हैं।
संशोधित प्रावधान नई लेबलिंग आवश्यकता को लागू करने के लिए छह महीने की ट्रांजिशन अवधि भी देता है। इससे निर्माताओं को प्रावधान के लागू होने से पहले अपनी लेबलिंग, पैकेजिंग और संबंधित प्रक्रियाओं में जरूरी बदलाव करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
इस सुधार का मकसद लाइसेंसिंग ढांचे को आसान बनाकर रेगुलेटरी निगरानी और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (कारोबार में आसानी) के बीच संतुलन बनाना है। साथ ही, आउटसोर्स स्टरलाइजेशन के लिए जरूरी ट्रेसेबिलिटी मैकेनिज्म को बनाए रखना है।
इस कदम से निर्माताओं को अधिक ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी मिलने, तेजी से और ज्यादा कुशल मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को बढ़ावा मिलने और भारत के मेडिकल डिवाइस उद्योग के विकास और प्रतिस्पर्धात्मकता को समर्थन मिलने की उम्मीद है।
इसके अलावा, मेडिकल डिवाइसेस रूल्स, 2017 के नियम 63 में संशोधन किया गया है ताकि बिना प्रेडिकेट डिवाइस वाले मेडिकल डिवाइस के लिए क्लिनिकल जांच की जरूरतों से छूट के लिए मान्यता प्राप्त सख्त रेगुलेटरी अधिकार-क्षेत्रों में यूरोपीय संघ (ईयू) को शामिल किया जा सके।
इस प्रावधान में अभी अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल हैं। यूरोपियन यूनियन के शामिल होने से यूरोपीय संघ में पहले से मंजूर हो चुके मेडिकल डिवाइस छूट के नियमों का फायदा उठा सकेंगे, जिससे भारत में मरीजों को एडवांस्ड मेडिकल टेक्नोलॉजी तेजी से मिल पाएगी।
इस बदलाव से इम्पोर्ट करने वालों और मैन्युफैक्चरर्स पर रेगुलेटरी बोझ और उससे जुड़ी समय-सीमा कम होने की उम्मीद है। साथ ही, मेडिकल डिवाइस सेक्टर में इंटरनेशनल रेगुलेटरी तालमेल भी मज़बूत होगा। इन सुधारों से रेगुलेटरी प्रक्रियाओं के आसान होने, लागत कम होने, पारदर्शिता और पूर्वानुमान की क्षमता बढ़ने और भारत में एडवांस्ड और इनोवेटिव मेडिकल डिवाइस के समय पर उपलब्ध होने की उम्मीद है।
ये उपाय मेडिकल डिवाइस रेगुलेटरी इकोसिस्टम को मजबूत करने और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम हैं। साथ ही, ये मेडिकल डिवाइस की क्वालिटी, सुरक्षा और परफार्मेंस के मजबूत स्टैंडर्ड्स को भी बनाए रखते हैं।
--आईएएनएस
ओपी/पीएम
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