दुनिया की नजरें टिकी है सिर्फ और सिर्फ भारत पर क्योंकि बहुत जल्द दिल्ली की धरती पर वो हलचल मचने वाली है जिसकी गूंज सीधे बीजिंग और वाशिंगटन तक सुनाई देगी। रूस के राष्ट्रपति पुतिन एक बार फिर भारत आ रहे हैं और वह भी महज 9 से 10 महीने के भीतर। जैसे ही यह खबर बाहर आई ग्लोबल पॉलिटिक्स में भूचाल आ गया है और वजह बिल्कुल साफ है। सितंबर के महीने में भारत में सजने जा रहा है ब्रिक्स का ऐसा महामंच जो दुनिया का पूरा पावर बैलेंस बदल कर रख देगा। दरअसल आपको बता दें कि 12 से 13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का बड़ा सम्मेलन होने जा रहा है। इसमें हिस्सा लेने के लिए रूस के राष्ट्रपति पुतिन खुद भारत आ रहे हैं। आपको बता दें कि इस दौरे पर दोनों देशों के बीच दो बहुत बड़े रक्षा सौदों पर मोहर लग सकती है जो दुश्मन के होश उड़ाने के लिए काफी है। रूस आपको बता दें कि भारत के सामने एक बहुत बड़ा ऑफर रखने वाला है। इसके तहत भारतीय वायु सेना के 100 से ज्यादा Sukhoi 30 फाइटर जेट्स को आधुनिक बनाया जाएगा और साथ ही रूस अपनी पांचवी पीढ़ी का सबसे खतरनाक स्टेल्थ फाइटर 57 भी भारत को देने की पेशकश कर सकता है।
इस डील की सबसे खास बात यह होगी कि यह सिर्फ विमान खरीदना नहीं होगा बल्कि भारत में ही उन्हें बनाने और पूरी तकनीक ट्रांसफर करने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल होगा। बात करते हैं सुपर सुखोई प्रोजेक्ट की। हमारे Sukhoi 30 फाइटर जेट्स ने ऑपरेशन सिंदूर समेत कई मोर्चों पर अपनी ताकत साबित की है। अब इन विमानों को और भी ज्यादा घातक बनाया जाएगा। इनके इंजन, हथियार और अंदर की तकनीक पूरी तरह अपग्रेड की जाएगी। इसके लिए रूस के एक्सपर्ट्स की जो टीम है यह पहले से ही नासिक में एचए एएल की यूनिट का दौरा कर चुकी है। आपको बता दें कि करीब 63 थाउजेंड करोड़ की लागत से 84 sukhhoi 30 जेट्स को पहले ही सुपर सुखोई में बदलने का काम चल रहा है और इस दौरे से इस काम को और भी ज्यादा तेजी मिलने वाली है। लेकिन इस दौरे का सबसे बड़ा गेम चेंजर होने वाला है Suhoi 57. सवाल यह है कि भारत के लिए यह विमान इतना जरूरी क्यों है? जवाब बिल्कुल साफ है।
चीन और पाकिस्तान की चालबाजी। चीन अपना स्टेल्थ फाइटर पहले ही तैनात कर चुका है। और पाकिस्तान को भी ऐसी तकनीक दे रहा है। तो दूसरी तरफ भारत का अपना पांचवा जनरेशन का फाइटर जेट एएमसीए साल 2032 तक ही तैयार हो पाएगा। और इसी बीच देश की सुरक्षा को मजबूत रखना बेहद जरूरी है। याद रखिए साल 2018 में भारत इस प्रोजेक्ट से अलग हो गया था। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। रूस का यह Sukoi 57 फाइटर जेट रफ्तार के मामले में अमेरिका के F35A से भी 25% ज्यादा तेज है। वहीं आपको यह भी बता दें कि इसके पहले पुतिन दिसंबर 2025 में भारत आए थे। जब दोनों देशों ने अपनी दोस्ती के 25 साल पूरे होने का जश्न मनाया था और अब सितंबर 2026 में उनका यह दौरा एशियाई राजनीति का पूरा नक्शा बदल कर रख देगा।
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क्या खाड़ी के दो सबसे बड़े दुश्मन सऊदी अरब और ईरान अब एक ही सैन्य छाते के नीचे आने वाले हैं? क्या अमेरिका और इसराइल को घेरने के लिए मुस्लिम देशों का एक ऐसा अमेद्य किला तैयार हो रहा है जिसकी कमान पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी और ईरान के हाथों में होगी? ईरान की संसदीय समाचार एजेंसी खाना मिल्लत के प्रमुख मेहंदी रहीमी ने अलमयादीन को एक दिए इंटरव्यू में यह कहकर सनसनी फैला दी कि ईरान को मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने का न्योता मिला है। तेहरान इस पर गंभीरता से विचार भी कर रहा है।
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में स्पष्ट नियम है। अगर एक पर हमला हुआ तो सब पर हमला माना जाएगा। ईरानी संसद की मीडिया विंग के प्रमुख मेहंदी रहीमी ने दावा किया है कि तीनों देशों ने ईरान को भी इस ऐतिहासिक गुट में शामिल होने का प्रस्ताव भेजा है। रहीमी के मुताबिक क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए स्वदेशी ढांचा खड़ा होना ईरान की कूटनीतिक जीत है। हालांकि अभी तक ना तो ईरानी विदेश मंत्रालय और ना ही सऊदी, तुर्की या पाकिस्तान के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने इस न्योते को औपचारिक पुष्टि की है। ऐसे में अगर यह दावा सच साबित हो गया तो तेहरान इस ब्लॉक में शामिल होता है तो मध्य पूर्व के तमाम पुराने समीकरण एक बार में ही ध्वस्त हो जाएंगे। दशकों तक एक दूसरे के प्रतिद्वंदी रहे सऊदी अरब और ईरान का एक रक्षा मंच पर आना अमेरिका और इसराइल के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा।
तुर्की पहले ही साफ कर चुका है कि वह यह समझौता पूरी तरह रक्षात्मक और किसी देश के खिलाफ नहीं कर रहा है। ऐसे में अगर पाकिस्तान की परमाणु ताकत, तुर्की की आधुनिक सेना, सऊदी की वित्तीय शक्ति और ईरान की मिसाइल क्षमता एक साथ आती है तो इसराइल की रणनीतिक घेराबंदी पूरी तरह पस्त हो जाएगी। लेकिन सवाल यह भी है कि जो तीनों देश अमेरिका के मित्र देश हैं, चाहे वो पाकिस्तान, सऊदी या फिर तुर्की हो। वो क्या ईरान जैसे दुश्मन को अपने गुट में शामिल करेंगे? एक तरफ पाकिस्तान खुद को इस्लामिक नाटो का मुख्य रणनीतिकार पिलर बताकर शेखी बगारने में लगा है। दूसरी तरफ खाड़ी देशों में उसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। हाल ही में मार्च से जुलाई के बीच छह खाड़ी देशों ने 20,000 से अधिक पाकिस्तानियों को वापस डिपोर्ट कर दिया है। पाकिस्तान नागरिकों पर भीख मांगने, ओवरस्टे करने और अपराधों में लिप्त होने के गंभीर आरोप लगे हैं। एक तरफ पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर अपनी सैन्य साख चमकाने की कोशिश कर रहा है।
वहीं दूसरी तरफ उसके नागरिकों के साथ खाड़ी देशों का यह सलूक इस्लामाबाद के लिए अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी का कारण बन चुका है। ईरान के इस नए सैन्य ब्लॉक में एंट्री अगर हकीकत बनती है तो यह अमेरिका के एक क्षेत्र प्रभाव को खत्म कर सकता है और एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा युग की शुरुआत करेगी। अब देखना यह हो जाता है कि रियाद और वाशिंगटन इस दावे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं या फिर अंकारा या इस्लामाबाद की ओर से क्या इस पर कोई आधिकारिक तौर पर बयान जारी किया जाएगा।
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