Explainer: शी जिनपिंग के भारत दौरे से पहले एलएसी पर चीन की नई चाल, समझिए बीजिंग की दबाव वाली रणनीति
LAC Border Tension: भारत और चीन के रिश्तों में सीमा विवाद सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है. खासकर अरुणाचल प्रदेश से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर होने वाली गतिविधियों पर दोनों देशों की नजर रहती है. अब जब सितंबर में नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना जताई जा रही है, ऐसे समय में अरुणाचल सीमा से जुड़ी खबरों ने फिर सवाल खड़े कर दिए हैं.
हालांकि, किसी खास सीमा घटना को चीन की सोची-समझी रणनीति कहना तभी उचित होगा जब उसके ठोस प्रमाण सामने हों. लेकिन पिछले वर्षों के घटनाक्रम यह जरूर दिखाते हैं कि भारत-चीन के बड़े कूटनीतिक दौरों के आसपास सीमा पर तनाव कई बार सामने आया है.
हाई-लेवल बैठक से पहले तनाव क्यों बढ़ता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, LAC पर सीमित दबाव बनाना चीन के लिए कई उद्देश्यों को साधने का माध्यम हो सकता है. सबसे पहला है रणनीतिक संकेत देना. चीन यह संदेश देना चाहता है कि भारत के साथ उसके रिश्तों में सबसे बड़ा विवाद सीमा ही है और जब तक इस मुद्दे पर उसकी चिंताओं को ध्यान में नहीं रखा जाता, तब तक द्विपक्षीय संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकते.
दूसरा मकसद भारत को बातचीत की मेज पर दबाव में लाना हो सकता है. सीमा पर तनाव पैदा होने के बाद भारत को सैन्य तैनाती बढ़ानी पड़ती है, निगरानी मजबूत करनी पड़ती है और कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय होना पड़ता है. यानी बीजिंग के लिए सीमा केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव बनाने का साधन भी है.
क्या हर बार हाई-लेवल दौरे से पहले चीन तनाव बढ़ाता है?
ऐसा दावा पूरी तरह सही नहीं होगा कि चीन हर बड़े दौरे से पहले जानबूझकर सीमा पर तनाव पैदा करता है. लेकिन कुछ घटनाओं के समय को लेकर जरूर चर्चा होती रही है.
- 2013: चीनी सैनिकों की डेपसांग क्षेत्र में मौजूदगी उस समय सामने आई, जब तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग के भारत दौरे की तैयारी चल रही थी.
- 2014: शी जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान चुमार क्षेत्र में भारत-चीन सैनिकों के बीच तनाव की खबरें आईं.
- 2017: डोकलाम में भारत और चीन की सेनाएं लंबे समय तक आमने-सामने रहीं.
- 2020: गलवान हिंसा के बाद दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा तनाव पैदा हुआ.
- 2022: तवांग क्षेत्र में दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई.
इन घटनाओं से यह जरूर पता चलता है कि कूटनीतिक बातचीत और सीमा पर तनाव कई बार समानांतर रूप से चलते रहे हैं.
चीन की 'दबाव बनाओ और बातचीत करो' रणनीति क्या है?
चीन की रणनीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू सीमित दबाव है. बीजिंग अक्सर ऐसा माहौल बना सकता है जिसमें सीमा पर लगातार तनाव बना रहे, लेकिन स्थिति पूर्ण युद्ध तक न पहुंचे. इससे सामने वाले देश को लंबे समय तक सैन्य और आर्थिक संसाधन सीमा पर लगाए रखने पड़ते हैं. इसे सरल भाषा में 'थकाकर बातचीत के लिए मजबूर करने' की रणनीति कहा जा सकता है. भारत के लिए चुनौती यह होती है कि उसे एक तरफ सीमा पर मजबूत सैन्य मौजूदगी बनाए रखनी होती है, वहीं दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता भी खुला रखना पड़ता है.
भारत-अमेरिका-जापान की नजदीकी से चीन को क्या परेशानी?
चीन की चिंता केवल भारत-चीन सीमा तक सीमित नहीं है. भारत की अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी भी बीजिंग की नजर में महत्वपूर्ण है. क्वाड जैसे मंचों के जरिए चारों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहे हैं. रक्षा, समुद्री सुरक्षा, तकनीक, सप्लाई चेन और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ रहा है. ऐसे में LAC पर दबाव बनाकर चीन भारत को यह संकेत दे सकता है कि पश्चिमी देशों के साथ उसकी रणनीतिक नजदीकी की एक कीमत भी हो सकती है.
भारत के सीमा निर्माण से चीन क्यों परेशान होता है?
सीमा पर सड़क, पुल, सुरंग और हवाई पट्टी बनाना भारत की सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है. उदाहरण के लिए, दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) रोड ने लद्दाख के अग्रिम क्षेत्रों तक भारत की पहुंच बेहतर की है. इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में सड़क और पुलों का नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है.
चीन लंबे समय से अपने हिस्से में सीमा के करीब सड़कें और दूसरी सुविधाएं विकसित करता रहा है. इसलिए भारत की तेज होती इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियों को वह रणनीतिक नजरिए से देखता है. यही कारण है कि सीमा पर भारत के बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ चीनी आपत्तियां भी सामने आती रही हैं.
भारत की रणनीति क्या है?
भारत अब केवल रक्षात्मक रणनीति पर निर्भर नहीं है. LAC पर भारत की रणनीति के कई हिस्से हैं. पहला ये कि सैन्य ताकत. सीमा पर पर्याप्त सैनिकों, निगरानी उपकरणों, ड्रोन, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती की गई है.
दूसरा ये कि तेज इंफ्रास्ट्रक्चर. हर मौसम में इस्तेमाल होने वाली सड़कें, पुल और सुरंगें बनाई जा रही हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सैनिकों और हथियारों की आवाजाही तेजी से हो सके. तीसरा ये कि एयर कनेक्टिविटी. न्योमा जैसे एडवांस लैंडिंग ग्राउंड और दूसरे हवाई ठिकानों को विकसित किया जा रहा है.
चौथा ये कि कूटनीति. सैन्य तनाव के बावजूद भारत बातचीत के रास्ते को खुला रखता है. भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते. पांचवां ये कि आर्थिक सुरक्षा. भारत ने चीनी निवेश, तकनीकी कंपनियों और ऐप्स को लेकर भी कई कड़े कदम उठाए हैं. इसका उद्देश्य सीमा विवाद को आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा से अलग-अलग करके न देखना है.
क्या चीन ताइवान के कारण भारत से बड़ा टकराव नहीं चाहता?
यह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सवाल है. चीन की सबसे बड़ी सैन्य प्राथमिकताओं में ताइवान शामिल है. अगर भविष्य में बीजिंग ताइवान के खिलाफ कोई बड़ा सैन्य कदम उठाता है, तो उसके लिए एक साथ भारत के साथ बड़े सैन्य टकराव में जाना जोखिम भरा होगा.
इसलिए यह संभावना समझ में आती है कि चीन LAC पर दबाव बनाए रखे, लेकिन पूर्ण युद्ध से बचे. हालांकि, इसे निश्चित चीनी रणनीति मानना सही नहीं होगा. किसी भी समय स्थानीय सैन्य घटना गलत आकलन के कारण बड़े संकट में बदल सकती है.
असली चुनौती क्या है?
भारत के सामने चुनौती सिर्फ चीनी सैनिकों की गतिविधियों पर नजर रखना नहीं है. असली चुनौती है सीमा पर मजबूत प्रतिरोध और बातचीत के बीच संतुलन बनाए रखना.
अगर भारत कमजोर दिखाई देता है तो चीन दबाव बढ़ा सकता है. लेकिन अगर हर छोटी घटना सैन्य टकराव में बदलती है तो स्थिति नियंत्रण से बाहर भी जा सकती है. इसलिए भारत की मौजूदा नीति को मोटे तौर पर 'मजबूत सीमा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और खुली बातचीत' के संतुलन के रूप में देखा जा सकता है.
चीन का LAC पर दबाव बनाने का तरीका केवल सैनिकों की आवाजाही तक सीमित नहीं है. इसमें नक्शों में दावे, सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर, गश्त, कूटनीतिक बयान और भारत की रणनीतिक साझेदारियों पर नजर ये सब शामिल हैं.
इसलिए किसी बड़े कूटनीतिक सम्मेलन से पहले सीमा पर होने वाली हर गतिविधि को युद्ध की तैयारी मानना सही नहीं होगा. लेकिन भारत के लिए यह जरूरी है कि वह किसी भी संभावित दबाव का जवाब देने के लिए सैन्य रूप से तैयार, आर्थिक रूप से मजबूत और कूटनीतिक रूप से सक्रिय रहे. यही रणनीति चीन की 'दबाव बनाकर बढ़त हासिल करने' की कोशिश को सीमित कर सकती है.
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