Sawan Somwar 2026: सावन के आखिरी सोमवार पर जरूर पढ़ें मार्कंडेय ऋषि की कथा, महादेव ने ऐसे बचाया था भक्त का जीवन
Sawan Somwar 2026: सावन का आखिरी सोमवार 24 अगस्त 2026 को मनाया जा रहा है। भगवान शिव को समर्पित इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और पूजा के साथ सोमवार व्रत की कथा सुनते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सावन सोमवार पर शिव आराधना के साथ कथा सुनने से भक्ति और विश्वास का भाव मजबूत होता है। इसी से जुड़ी मार्कंडेय ऋषि की कथा भगवान शिव की अपने भक्त के प्रति करुणा और संरक्षण का संदेश देती है।
जब महर्षि मृकंडु ने मांगा था पुत्र का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि मृकंडु और उनकी पत्नी सुव्रता संतान प्राप्ति की इच्छा रखते थे। इसके लिए दोनों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा।
भगवान शिव ने उनके सामने दो विकल्प रखे। पहला ऐसा पुत्र जो लंबी आयु वाला हो, लेकिन गुणों से रहित हो। दूसरा ऐसा पुत्र जो अत्यंत गुणवान और ज्ञानी हो, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष हो। महर्षि मृकंडु ने गुणवान और तेजस्वी पुत्र का विकल्प चुना। इसके बाद उनके घर मार्कंडेय का जन्म हुआ।
बचपन से ही शिव भक्ति में लीन थे मार्कंडेय
मार्कंडेय बचपन से ही भगवान शिव के अनन्य भक्त बन गए थे। वह नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा करते और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करते थे।
समय बीतता गया और वह दिन भी करीब आ गया जब मार्कंडेय की आयु 16 वर्ष होने वाली थी। परिवार को उस भविष्यवाणी की चिंता सताने लगी, लेकिन मार्कंडेय लगातार शिव भक्ति में लीन रहे।
जब प्राण लेने पहुंचे यमराज
कथा के अनुसार, मार्कंडेय के 16 वर्ष पूरे होने पर यमराज के दूत उनके प्राण लेने पहुंचे। उस समय मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटकर भगवान शिव की आराधना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रहे थे।
शिव भक्ति के प्रभाव के कारण यमदूत उन्हें अपने साथ नहीं ले जा सके। इसके बाद यमराज स्वयं वहां पहुंचे। यमराज ने जब मार्कंडेय के प्राण लेने के लिए अपना पाश फेंका तो वह बालक के साथ शिवलिंग पर भी पड़ गया।
शिवलिंग से प्रकट हुए महादेव
अपने भक्त पर आए संकट को देखकर भगवान शिव शिवलिंग से प्रकट हुए। पौराणिक कथा के अनुसार, महादेव ने यमराज को रोक दिया और मार्कंडेय की रक्षा की।
भगवान शिव ने अपने भक्त की अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु और अमरता का वरदान दिया। इसके बाद मार्कंडेय आगे चलकर महान ऋषि के रूप में प्रसिद्ध हुए।
क्या संदेश देती है मार्कंडेय की कथा?
मार्कंडेय ऋषि की यह कथा भगवान शिव और उनके भक्त के बीच अटूट विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से की गई भक्ति व्यक्ति को मुश्किल परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास देती है।
इसी वजह से सावन सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ने और सुनने की परंपरा है। भक्त इस दिन महादेव से सुख, शांति, आरोग्य और जीवन में आने वाली परेशानियों से मुक्ति की कामना करते हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई कथा और धार्मिक मान्यताएं पौराणिक एवं आस्था से जुड़ी हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
Raksha Bandhan 2026: पंचक में पड़ रहा रक्षाबंधन, क्या इस दौरान भाई को बांध सकते हैं राखी? जानें नियम
रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का पर्व है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसके सुखी जीवन की कामना करती है। हालांकि, इस बार रक्षाबंधन के आसपास पंचक का संयोग होने के कारण शुभ कार्यों को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति है।
ज्योतिषीय मान्यताओं में पंचक को पांच नक्षत्रों का विशेष संयोग माना गया है। इस अवधि में कुछ कार्यों को वर्जित बताया गया है। हालांकि, पंचक का अर्थ यह नहीं है कि इस दौरान हर काम अशुभ होता है।
क्या पंचक में बांध सकते हैं राखी?
हां, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान भाई को राखी बांधी जा सकती है। पंचक को रक्षाबंधन जैसे पर्व पर राखी बांधने में बाधक नहीं माना जाता। इसलिए बहनें पंचक के दौरान भी भाई की कलाई पर राखी बांध सकती हैं। हालांकि, राखी बांधने का समय तय करते समय स्थानीय पंचांग और उस दिन के शुभ मुहूर्त को देखना बेहतर माना जाता है।
क्या होता है अग्नि पंचक?
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार जब पंचक की शुरुआत मंगलवार या गुरुवार से होती है तो इसे अग्नि पंचक कहा जाता है। अग्नि पंचक के दौरान विशेष रूप से निर्माण कार्य, नई मशीनरी खरीदने या औजारों से जुड़े काम करने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस अवधि में आग, दुर्घटना या नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं, विवाद या कानूनी मामलों से जुड़े कुछ कार्यों को इस अवधि में किया जा सकता है, ऐसी भी ज्योतिषीय मान्यता है।
पंचक में किन कामों से बचना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान कुछ कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है।
दक्षिण दिशा में यात्रा
पंचक में दक्षिण दिशा की यात्रा को शुभ नहीं माना जाता। धार्मिक मान्यता में दक्षिण दिशा को यम की दिशा से जोड़कर देखा जाता है।
लकड़ी और ज्वलनशील सामान जमा करना
धनिष्ठा नक्षत्र से जुड़े पंचक में लकड़ी, घास और अन्य ज्वलनशील सामग्री इकट्ठा करने से बचने की मान्यता है।
नया पलंग या चारपाई बनवाना
पंचक के दौरान पलंग या चारपाई बनवाने अथवा खरीदने को लेकर भी धार्मिक मान्यताओं में सावधानी बरतने की बात कही गई है।
घर की छत का निर्माण
इस अवधि में घर की छत या लेंटर डालने जैसे निर्माण कार्यों को भी वर्जित माना जाता है। मान्यता के अनुसार ऐसा करने से घर में परेशानी या आर्थिक नुकसान हो सकता है।
अंतिम संस्कार
धार्मिक मान्यताओं में पंचक के दौरान मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं। ऐसी स्थिति में स्थानीय परंपरा और विद्वान की सलाह के अनुसार निर्धारित शांति कर्म किए जाते हैं।
पंचक में क्या खरीदना नहीं चाहिए?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान लकड़ी, लोहा, चारपाई और नए कपड़े खरीदने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस अवधि में इन चीजों की खरीदारी करने से नुकसान हो सकता है। हालांकि, इन मान्यताओं का पालन व्यक्ति अपनी आस्था और पारिवारिक परंपरा के अनुसार करता है।
क्या पंचक में शुभ काम किए जा सकते हैं?
पंचक को पूरी तरह अशुभ अवधि नहीं माना जाता। हालांकि, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और बड़े निर्माण कार्य जैसे कुछ मांगलिक कार्यों को पंचक में करने से बचने की सलाह दी जाती है।
वहीं सामान्य दिनचर्या, पूजा-पाठ और कुछ जरूरी कार्य पंचक के दौरान किए जा सकते हैं। किसी विशेष शुभ कार्य के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना बेहतर होता है।
पंचक को अशुभ क्यों माना जाता है?
ज्योतिष में धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती इन पांच नक्षत्रों के संयोग को पंचक कहा जाता है। इस दौरान चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में रहता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार पंचक में किए गए कुछ कार्यों का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है या उनकी पुनरावृत्ति हो सकती है। इसी वजह से इस अवधि में कुछ विशेष कामों को लेकर सावधानी बरतने की परंपरा चली आ रही है।
डिस्क्लेमर: पंचक, उसके नियम और शुभ-अशुभ प्रभाव से जुड़ी बातें धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता। अलग-अलग पंचांग और परंपराओं में नियमों में अंतर हो सकता है।
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