Raksha Bandhan Story: सबसे पहली राखी किसने बांधी? इंद्राणी से द्रौपदी तक, जानिए रक्षा सूत्र से जुड़ी 5 रोचक कथाएं
Raksha Bandhan First Rakhi Story: हर साल सावन की पूर्णिमा पर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि राखी बांधने की परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई? रक्षाबंधन की शुरुआत को लेकर कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक कहानी नहीं मिलती।
इसके बजाय हिंदू धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं में रक्षा सूत्र से जुड़ी कई कहानियां मिलती हैं। जानिए राखी से जुड़ी 5 ऐसी कहानियां जो प्रेम और रक्षा का संदेश देती हैं।
1. इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांधा था रक्षा सूत्र
रक्षाबंधन से जुड़ी पुरानी मान्यताओं में इंद्र और इंद्राणी की कहानी का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था। युद्ध में देवताओं की स्थिति कमजोर पड़ने लगी तो इंद्राणी ने भगवान विष्णु की प्रार्थना की।
मान्यता है कि मंत्रोच्चार के साथ इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर राखी बांधी। इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। इसी वजह से रक्षा सूत्र को रक्षाबंधन की शुरुआती परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है।
2. कृष्ण और द्रौपदी की कहानी
मान्यता है कि एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने से खून निकलने लगा। यह देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह से कृष्ण प्रभावित हुए और उन्होंने उनकी रक्षा करने का वचन दिया। आगे चलकर जब द्रौपदी को कौरव सभा में अपमानित किया गया, तब कृष्ण ने उनकी लाज बचाई।
3. माता लक्ष्मी ने राजा बलि को माना भाई
राखी की पौराणिक कथा माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि को वचन दिया था और इसी कारण वे बलि के राज्य में रहने लगे।
भगवान विष्णु को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी राजा बलि के पास पहुंचीं। कहा जाता है कि लक्ष्मी ने बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। राजा बलि ने भी इस रिश्ते को स्वीकार किया।
4. यमराज और यमुना की कहानी भी है खास
मान्यता है कि यमुना अपने भाई यमराज से मिलने के लिए काफी समय से इंतजार कर रही थीं। जब यमराज उनके घर पहुंचे तो यमुना ने उनका स्वागत किया, पूजा की और उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।
यमुना के प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। इसी कथा से भाई-बहन के बीच प्रेम, लंबी उम्र और सुरक्षा की कामना की परंपरा को भी जोड़ा जाता है।
5. कर्णावती और हुमायूं की कहानी का सच?
रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं की कहानी भी अक्सर सुनाई जाती है। कहा जाता है कि चित्तौड़ पर संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद की गुहार लगाई थी।
हालांकि इस घटना के ऐतिहासिक प्रमाणों को लेकर मतभेद हैं। इसलिए इसे पक्के ऐतिहासिक तथ्य की बजाय प्रचलित ऐतिहासिक कथा के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
भाई- बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक है राखी
रक्षाबंधन से जुड़ी इन कथाओं में अपनों की रक्षा, भरोसा, स्नेह और रिश्ते को निभाने का वचन है। राखी भाई-बहन के रिश्ते की पहचान है।भाई-बहन दोनों एक-दूसरे की खुशियों और सुरक्षा की कामना करते हैं।
इसलिए यह कहना मुश्किल है कि दुनिया में सबसे पहली राखी किसने बांधी थी। लेकिन पौराणिक कथाओं में इंद्राणी का इंद्र को रक्षा सूत्र बांधना, कृष्ण-द्रौपदी का प्रसंग और यम-यमुना की कहानी इस परंपरा की प्राचीन जड़ों की ओर इशारा करती हैं।
(Disclaimer): इस लेख में शामिल पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंग विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और प्रचलित कथाओं पर आधारित हैं। इन सभी घटनाओं को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
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Sawan Somwar 2026: सावन के आखिरी सोमवार पर जरूर पढ़ें मार्कंडेय ऋषि की कथा, महादेव ने ऐसे बचाया था भक्त का जीवन
Sawan Somwar 2026: सावन का आखिरी सोमवार 24 अगस्त 2026 को मनाया जा रहा है। भगवान शिव को समर्पित इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और पूजा के साथ सोमवार व्रत की कथा सुनते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सावन सोमवार पर शिव आराधना के साथ कथा सुनने से भक्ति और विश्वास का भाव मजबूत होता है। इसी से जुड़ी मार्कंडेय ऋषि की कथा भगवान शिव की अपने भक्त के प्रति करुणा और संरक्षण का संदेश देती है।
जब महर्षि मृकंडु ने मांगा था पुत्र का वरदान
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि मृकंडु और उनकी पत्नी सुव्रता संतान प्राप्ति की इच्छा रखते थे। इसके लिए दोनों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा।
भगवान शिव ने उनके सामने दो विकल्प रखे। पहला ऐसा पुत्र जो लंबी आयु वाला हो, लेकिन गुणों से रहित हो। दूसरा ऐसा पुत्र जो अत्यंत गुणवान और ज्ञानी हो, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष हो। महर्षि मृकंडु ने गुणवान और तेजस्वी पुत्र का विकल्प चुना। इसके बाद उनके घर मार्कंडेय का जन्म हुआ।
बचपन से ही शिव भक्ति में लीन थे मार्कंडेय
मार्कंडेय बचपन से ही भगवान शिव के अनन्य भक्त बन गए थे। वह नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा करते और भगवान शिव के मंत्रों का जाप करते थे।
समय बीतता गया और वह दिन भी करीब आ गया जब मार्कंडेय की आयु 16 वर्ष होने वाली थी। परिवार को उस भविष्यवाणी की चिंता सताने लगी, लेकिन मार्कंडेय लगातार शिव भक्ति में लीन रहे।
जब प्राण लेने पहुंचे यमराज
कथा के अनुसार, मार्कंडेय के 16 वर्ष पूरे होने पर यमराज के दूत उनके प्राण लेने पहुंचे। उस समय मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटकर भगवान शिव की आराधना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रहे थे।
शिव भक्ति के प्रभाव के कारण यमदूत उन्हें अपने साथ नहीं ले जा सके। इसके बाद यमराज स्वयं वहां पहुंचे। यमराज ने जब मार्कंडेय के प्राण लेने के लिए अपना पाश फेंका तो वह बालक के साथ शिवलिंग पर भी पड़ गया।
शिवलिंग से प्रकट हुए महादेव
अपने भक्त पर आए संकट को देखकर भगवान शिव शिवलिंग से प्रकट हुए। पौराणिक कथा के अनुसार, महादेव ने यमराज को रोक दिया और मार्कंडेय की रक्षा की।
भगवान शिव ने अपने भक्त की अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु और अमरता का वरदान दिया। इसके बाद मार्कंडेय आगे चलकर महान ऋषि के रूप में प्रसिद्ध हुए।
क्या संदेश देती है मार्कंडेय की कथा?
मार्कंडेय ऋषि की यह कथा भगवान शिव और उनके भक्त के बीच अटूट विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से की गई भक्ति व्यक्ति को मुश्किल परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास देती है।
इसी वजह से सावन सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ने और सुनने की परंपरा है। भक्त इस दिन महादेव से सुख, शांति, आरोग्य और जीवन में आने वाली परेशानियों से मुक्ति की कामना करते हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई कथा और धार्मिक मान्यताएं पौराणिक एवं आस्था से जुड़ी हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
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