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Bone Health: Menopause के बाद महिलाओं में बढ़ जाता है Osteoporosis का खतरा, ये उपाय बचाएंगे आपकी Bone Health

महिलाओं के जीवन में मेनोपॉज एक नेचुरल प्रोसेस है। आमतौर 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच से मेनोपॉज शुरू होता है। इस दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल तेजी से कम होने लगता है। एस्ट्रोजन सिर्फ फर्टिलिटी के लिए जरूरी नहीं है। बल्कि यह हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब इसका लेवल घटता है, तो बोन डेंसिटी भी कम होने लगती है और हड्डियों में खोखले होने का जोखिम बढ़ जाता है।

मेनोपॉज के शुरू होने के बाद 5 से 10 सालों में महिलाओं की बोन मिनरल डेंसिटी तेजी से कम हो सकती है। जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि महिलाओं को इस दौरान क्या लक्षण महसूस हो सकते हैं। साथ ही इससे कैसे बचाव कर सकते हैं।

इसे भी पढ़ें: Women Health: बार-बार लगने वाली भूख और Weight Gain पर कैसे लगाएं लगाम? जानें Mindful Eating टिप्स


जानिए मेनोपॉज और हड्डियों का संबंध

हमारे शरीर की हड्डियां के टूटने या फ्रैक्चर होने पर वह दोबारा बन सकती हैं। युवावस्था में नई हड्डियां बनने का प्रोसेस ज्यादा एक्टिव होता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ और मेनोपॉज के बाद यह प्रोसेस बिगड़ने लगता है। एस्ट्रोजन हड्डियों को टूटने से बचाता है। इसकी कमी होने पर हड्डियों का डैमेज तेजी से होने लगता है। यही वजह है कि मेनोपॉज के बाद महिलाओं को हड्डियों के खोखले और कमजोर होने की समस्या का सामना करना पड़ता है।

जानें कमजोर हड्डियों के शुरुआती संकेत


लगातार कमर दर्द होना

रीढ़ की हड्डियों में कमजोरी आने पर कमर और पीठ में लगातार दर्द हो सकता है। बता दें कि यह हड्डी से जुड़े रोग जैसे ऑस्टियोपोरोसिस का भी संकेत हो सकता है।

कम लंबाई होना

अगर बढ़ती उम्र के साथ ऊंचाई कम होती जा रही है। तो यह रीढ़ की हड्डियों के कमजोर होने या सिकुड़ने का भी संकेत हो सकता है। जब बोन डेंसिटी कम होती है, इसका प्रभाव रीढ़ पर देखने को मिलता है। इस कारण व्यक्ति झुककर चलने लगता है। ऐसे में हाइट कम लगने लगता है।

मामूली चोट में फ्रैक्चर होना

ज्यादा उम्र में मेनोपॉज के बाद हड्डियों के प्रभावित होने से कहीं पर साधारण चोट या हल्का गिरने पर भी कूल्हे, कलाई या रीढ़ की हड्डी टूटने का खतरा होता है।

मेनोपॉज के बाद क्यों कमजोर होती हैं हड्डियां

बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों के दोबारा बनने का प्रोसेस स्लो हो जाता है।

विटामिन डी और कैल्शियम की कमी होने पर बोन डेंसिटी कम होने लगती है।

उम्र की वजह से महिलाएं ज्यादा काम नहीं करती हैं, जिस कारण बोन हेल्थ प्रभावित होती है।

शराब और धूम्रपान का सेवन भी महिलाओं में बोन लॉस को तेज कर सकता है।

अगर महिला की फैमिली में किसी को पहले से ऑस्टियोपोरोसिस रोग रहा है, तो खतरा बढ़ सकता है।

मेनोपॉज के बाद कैसे मजबूत करें हड्डियां


कैल्शियम है जरूरी

महिलाओं को अपनी डाइट में दूध, पनीर, रागी, दही, तिल और हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना चाहिए। यह सभी चीजें कैल्शियम का अच्छा सोर्स मानी जाती हैं।

विटामिन डी है जरूरी

सुबह की धूप और विटामिन डी युक्त खाद्य पदार्थ कैल्शियम के अवशोषण में सहायता करते हैं। इससे हड्डियों के डैमेज होने का खतरा कम होता है।

एक्सरसाइज

तेज चलना, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और सीढ़ियां चढ़ना आदि हड्डियों को मजबूत बनाता है। वहीं ऐसा करने से मोटापा भी कंट्रोल होता है।

पर्याप्त प्रोटीन लेना जरूरी

प्रोटीन मांसपेशियों और हड्डियों दोनों के लिए जरूरी है। बढ़ती उम्र में मेनोपॉज के बाद हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए विटामिन डी, कैल्शियम के साथ प्रोटीन लेना जरूरी होता है।

नियमित हेल्थ चेकअप

समय-समय पर बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट और डॉक्टर की सलाह से हड्डियों की स्थिति का पता किया जा सकता है। एक्सपर्ट के मुताबिक 65 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं और जोखिम वाले मामलों में BMD टेस्ट कराना फायदेमंद हो सकता है। इस जांच से हड्डियों के कमजोर, हेल्दी और ऑस्टियोपोरोसिस की स्थिति का पता चलता है।

मेनोपॉज के बाद महिलाओं की हड्डियों के कमजोर होने का जोखिम अधिक बढ़ जाता है। लेकिन सही समय पर पहचान होने और सही लाइफस्टाइल अपनाकर इस खतरे को कम किया जा सकता है। झुकी हुई पीठ, कमर दर्द या बार-बार फ्रैक्चर जैसे संकेतों को इग्नोर नहीं करना चाहिए। विटामिन डी और कैल्शियम से भरपूर डाइट, एक्सरसाइज और बोन मिनरल डेंसिटी की जांच हेल्थ और मजबूत हड्डियों के लिए बेहद जरूरी है।

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जनेऊ धारण करने का क्या है धार्मिक महत्व? जानें इसे पहनने के नियम और इससे जुड़ी मान्यताएं

Janeu dharan karne ka mahatva: हिंदू धर्म में जनेऊ, जिसे यज्ञोपवीत भी कहा जाता है, को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व का प्रतीक माना जाता है। यह एक पवित्र धागा होता है, जिसे उपनयन संस्कार के दौरान धारण कराया जाता है। मान्यता है कि जनेऊ धारण करने के बाद ही व्यक्ति को वेद अध्ययन और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेने का अधिकार प्राप्त होता है, इसी वजह से इसे हिंदू संस्कारों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म माना जाता है।

जनेऊ के तीन धागों का धार्मिक अर्थ
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जनेऊ में तीन धागे होते हैं, जो व्यक्ति के तीन ऋणों - देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जनेऊ धारण करने के बाद व्यक्ति इन तीनों ऋणों को चुकाने का संकल्प लेता है। इसके अलावा इन तीन धागों को सत्व, रज और तम - इन तीन गुणों का भी प्रतीक माना जाता है, जिन्हें संतुलित रखने की सीख जनेऊ के जरिए दी जाती है।

कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि जनेऊ को त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का भी प्रतीक माना जाता है, इसी वजह से इसे धारण करना अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।

उपनयन संस्कार से जुड़ी परंपरा
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, उपनयन संस्कार को हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है, जिसमें बालक को पहली बार जनेऊ धारण कराई जाती है। मान्यता है कि इस संस्कार के बाद बालक को शिक्षा ग्रहण करने और गुरु के सान्निध्य में वेदों का अध्ययन करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसी वजह से इसे बालक के जीवन के दूसरे जन्म के समान भी माना जाता है, इसलिए जनेऊ धारण करने वाले को "द्विज" भी कहा जाता है।

जनेऊ पहनने से जुड़े जरूरी नियम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जनेऊ को हमेशा बाएं कंधे से दाहिनी ओर की कमर तक पहना जाता है। मान्यता है कि शुभ कार्यों के दौरान जनेऊ को इसी स्थिति में रखना चाहिए, जबकि शौच या अशुद्ध कार्यों के समय इसे कान पर लपेटने की परंपरा है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि जनेऊ को नियमित रूप से बदलते रहना चाहिए, खासकर जब यह मैला या टूट जाए, क्योंकि खंडित जनेऊ धारण करना अशुभ माना जाता है।

जनेऊ बदलने का सही समय
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, श्रावणी पूर्णिमा के दिन जनेऊ बदलने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है, जिसे "रक्षाबंधन" के साथ भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन पुराने जनेऊ को उतारकर विधिवत रूप से नया जनेऊ धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है, और इससे व्यक्ति के पूर्व संकल्प नवीनीकृत होते हैं।

आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है यह परंपरा
समय के साथ भले ही आधुनिक जीवनशैली में कई बदलाव आए हों, लेकिन जनेऊ धारण करने की यह परंपरा आज भी अनेक हिंदू परिवारों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। खासतौर पर ब्राह्मण और अन्य समुदायों में आज भी उपनयन संस्कार को बड़े धार्मिक आयोजन के रूप में मनाया जाता है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान से सलाह अवश्य लें।

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