Rahul Gandhi सिर्फ फोटो के लिए धरने पर बैठे, BJP नेता Dilip Ghosh ने घेरा
पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने एक युवक को पैलेट गन से लगी चोट के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करते हुए 20 जुलाई को नयी दिल्ली के एक थाने में धरना देने को लेकर शनिवार को राहुल गांधी की आलोचना की। घोष ने पूछा कि परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विद्यार्थियों के आंदोलन के बीच वह झारखंड में क्यों नहीं गये। वरिष्ठ कांग्रेस नेता गांधी शुक्रवार को नयी दिल्ली के संसद मार्ग थाने में छह घंटे तक धरने पर बैठे रहे और जब पुलिस ने शिकायत दर्ज कर ली तब उन्होंने अपना धरना खत्म किया।
गांधी ने यह मुद्दा तब उठाया था जब साहिल लोचब (19) ने दावा किया कि पुलिस उसकी शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर रही है—जबकि उसे छर्रे लगे हैं और उसकी आंख को भी नुकसान पहुंचा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता पर निशाना साधते हुए घोष ने कहा, ‘‘राहुल गांधी वहां नहीं जा रहे हैं जहां उन्हें जाना चाहिए।’’ भाजपा नेता घोष ने यहां पत्रकारों से कहा, ‘‘झारखंड में विद्यार्थी विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और वहां कांग्रेस समर्थित सरकार है। अदालत ने सरकार के (परीक्षा रद्द करने के) फैसले को गलत बताया है।
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अब उनके पास कोई काम नहीं है और वह (दिल्ली में) सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए बैठे हैं।’’ झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर चल रहे 26 दिन के विरोध-प्रदर्शन को झारखंड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस गठबंधन सरकार के उस फैसले ने शांत कर दिया, जिसमें 22 परीक्षाओं को रद्द करने और 23 अन्य की जांच के आदेश दिए गए थे। हालांकि, इस फैसले ने सफल उम्मीदवारों के बीच एक और विरोध को जन्म दिया, जिनमें से कई ने नौकरी जाने के डर से उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। उनकी अर्जियों पर सुनवाई करते हुए, झारखंड उच्च न्यायालय ने भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने वाले कई सरकारी अधिसूचनाओं के अमल पर रोक लगा दी।
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इससे परीक्षा के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों में नाराजगी फैल गई। उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार पर ‘धोखा देने’ तथा उच्च न्यायालय में भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने के अपने फ़ैसले का ठीक से बचाव नहीं कर पाने का आरोप लगाया। परीक्षाओं का रद्द करना ही प्रदर्शनकारियों की एक मुख्य मांग थी।
भाजपा ने प्रदर्शनकारियों को अपना समर्थन दिया और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर विद्यार्थियों के कल्याण के मामले में ‘दोहरा रवैया’ अपनाने का आरोप लगाया। हालांकि सत्तारूढ़ झामुमो ने आरोप लगाया कि भाजपा अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए विद्यार्थियों का इस्तेमाल कर रही है।
CJI Surya Kant ने Justice Sanjay Karol को दी विदाई, कार्यशैली व मानवीय दृष्टिकोण की प्रशंसा की
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने शनिवार को न्यायमूर्ति संजय करोल को उनके कार्यकाल के आखिरी दिन विदाई दी। उन्होंने न्यायमूर्ति करोल की एक ऐसे न्यायाधीश के तौर पर प्रशंसा की, जिनका करियर ‘‘कानून के प्रति गंभीरता, लोगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये और अपने पद के प्रति अटूट सम्मान’’ से भरा रहा। न्यायमूर्ति करोल, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की एक औपचारिक पीठ की अध्यक्षता करते हुए, प्रधान न्यायाधीश ने सेवानिवृत्त हो रहे न्यायाधीश के साथ अपने लंबे पेशेवर जुड़ाव का जिक्र किया।
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प्रधान न्यायाधीश ने याद किया कि वह उन्हें पहले बार के सदस्य के तौर पर, फिर साथी महाधिवक्ता के तौर पर, उसके बाद हिमाचल प्रदेश में साथी के तौर पर और आखिर में उच्चतम न्यायालय में साथी न्यायाधीश के तौर पर जानते थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, ‘‘बार न्यायमूर्ति करोल को सिर्फ उनके फैसलों के लिए ही नहीं, बल्कि उनके धैर्य, विनम्रता, सुनने की इच्छा और अदालत कक्ष में उनकी मौजूदगी से मिलने वाले भरोसे के अहसास के लिए भी याद करती है। शायद, न्यायिक पद पर रहने वाले किसी व्यक्ति को दिए जा सकने वाला यह सबसे अच्छा सम्मान है।’’ न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने न्यायमूर्ति करोल के प्रशासनिक कामकाज के बारे में भी बात की।
प्रधान न्यायाधीश ने बताया कि त्रिपुरा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर, न्यायमूर्ति करोल ने अनुशासित वाद सूची, मुकदमों की फाइलों पर लगातार ध्यान देने और खुद कुछ अहम मुकदमे संभालने के जरिए, 10 महीनों के भीतर लंबित मामलों की संख्या 60,000 से घटाकर 27,000 से कम कर दी थी। वहीं, न्यायमूर्ति संजय करोल ने शनिवार को अपने विदाई भाषण में कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे भी फैसले में गलती हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीश के तौर पर काम करने के लिए कुछ हद तक विनम्रता और हर वादी के पीछे छिपे वास्तविक इंसान को देखने की क्षमता जरूरी है।
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न्यायमूर्ति करोल ने कहा, ‘‘संविधान हमसे सिर्फ कानून को सही ढंग से लागू करने के लिए नहीं कहता। वह हमसे इसे न्यायपूर्ण ढंग से लागू करने के लिए कहता है। शायद इसीलिए, फैसला करने की जिम्मेदारी मुझे हमेशा महज यह तय करने से कहीं बड़ी लगी है कि कानूनी तौर पर कौन सही है।
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