इंडियनऑयल का सप्लाई समझौता मॉरिशस को कीमतों में उतार-चढ़ाव से बचाएगा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा: सरकार
नई दिल्ली, 22 अगस्त (आईएएनएस)। भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी ऊर्जा साझेदारी को और मजबूत करते हुए मॉरीशस के साथ एक महत्वपूर्ण दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति समझौता किया है। केंद्र सरकार के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) और मॉरीशस स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन (एसटीसी) के बीच हुआ 5 वर्षीय समझौता मॉरीशस को ईंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेगा और उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से भी बचाने में मदद करेगा।
इस सप्ताह केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी की इस सप्ताह मॉरीशस यात्रा के दौरान दीर्घकालिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। सरकार ने इसे हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया के बाहर किसी भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनी द्वारा किया गया पहला दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति समझौता बताया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, यह समझौता भारत को मॉरीशस का प्रमुख और भरोसेमंद ईंधन आपूर्तिकर्ता बनाता है तथा हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक उपस्थिति को और मजबूत करता है।
समझौते के तहत इंडियन ऑयल मॉरीशस की पेट्रोल, हाई स्पीड डीजल और विमानन टर्बाइन ईंधन की पूरी आयात आवश्यकता को पूरा करेगा, जिससे मॉरीशस को लंबे समय तक स्थिर आपूर्ति का भरोसा मिलेगा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का असर कम होगा।
सरकार ने कहा कि भारत आज दुनिया के प्रमुख पेट्रोलियम शोधन केंद्रों में से एक बन चुका है। देश की 23 रिफाइनरियों में प्रतिवर्ष लगभग 267 मिलियन मीट्रिक टन परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन होता है, जिससे भारत परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक बन गया है।
भारत पहले से ही नेपाल और भूटान की पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करता है और क्षेत्र के अन्य देशों को भी ईंधन की आपूर्ति करता है। मंत्रालय ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के दौरान भी भारत ने नेपाल और भूटान को की गई आपूर्ति प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है, जिससे एक भरोसेमंद ऊर्जा सुरक्षा साझेदार के रूप में उसकी साख मजबूत हुई है।
दोनों देशों के बीच तेल एवं गैस सहयोग पर हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन केवल ईंधन आपूर्ति तक सीमित नहीं है। इसके तहत प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और जैव ईंधन क्षेत्र में सहयोग को भी बढ़ावा दिया जाएगा। भारतीय विशेषज्ञ मॉरीशस के अधिकारियों को तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल विकास में सहायता प्रदान करेंगे।
मंत्रालय के अनुसार, जैव ईंधन के क्षेत्र में दोनों देश ज्ञान साझाकरण, अनुसंधान और प्रशिक्षण के माध्यम से सहयोग बढ़ाएंगे। मॉरीशस वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन का संस्थापक सदस्य भी है, जिसकी शुरुआत भारत ने अपनी जी-20 अध्यक्षता के दौरान की थी।
इसके अलावा, वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन सचिवालय मॉरीशस के ऊर्जा एवं सार्वजनिक उपयोगिता मंत्रालय के साथ मिलकर देश के लिए जैव ईंधन नीति ढांचा विकसित करने पर भी काम कर रहा है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
डीआरसी में इबोला: तेजी से फैल रहा संक्रमण, मृतकों की संख्या 2,500 के पार
किंशासा, 22 अगस्त (आईएएनएस)। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में इबोला का प्रकोप दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दोहराया है कि यह इतिहास के सबसे घातक इबोला प्रकोप को भी पीछे छोड़ सकता है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला इबोला प्रकोप बन चुका है।
अफ्रीका सीडीसी के आंकड़ों के अनुसार, 21 अगस्त तक कांगो में 5,290 कन्फर्म केस और 2,516 लोगों की मौत दर्ज की गई है। हालांकि अधिकारियों का अनुमान है कि वास्तविक संक्रमितों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि फिलहाल केवल 30 से 40 प्रतिशत मामलों का ही पता चल पा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता इसकी रफ्तार है। अफ्रीका सीडीसी के मुताबिक, प्रकोप के 13वें सप्ताह तक वर्तमान संक्रमण संख्या 2014-16 के पश्चिम अफ्रीका के इबोला प्रकोप की इसी अवधि की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक, जबकि मौतों की संख्या करीब सात गुना अधिक है। उस महामारी में 28,000 से अधिक लोग संक्रमित हुए थे और 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।
यह प्रकोप बुंडीबुग्यो वायरस के कारण हो रहा है। इस वायरस के खिलाफ फिलहाल कोई स्वीकृत टीका या उपचार उपलब्ध नहीं है। इसके लक्षण कुछ अन्य इबोला प्रकारों की तुलना में हल्के हो सकते हैं, जिससे लोग शुरुआती चरण में अस्पताल या स्वास्थ्य अधिकारियों से संपर्क करने में देर कर रहे हैं।
कांगो के पूर्वी हिस्से में जारी सशस्त्र संघर्ष, बड़े पैमाने पर विस्थापन, लोगों की लगातार आवाजाही और स्वास्थ्य अधिकारियों के प्रति अविश्वास ने बीमारी पर नियंत्रण को बेहद कठिन बना दिया है। संक्रमण अब छह प्रांतों के 56 स्वास्थ्य क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। हाल ही में बास-उएले प्रांत में भी दो मामले सामने आए हैं। यहां पहले यह संक्रमण नहीं पहुंच पाया था।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने की प्रक्रिया बेहद कमजोर है। वर्तमान में 10 प्रतिशत से भी कम नए मामले ऐसे लोगों में मिल रहे हैं जो पहले से निगरानी में थे, जबकि किसी प्रकोप को नियंत्रण में मानने के लिए यह अनुपात आम तौर पर 90-95 प्रतिशत के आसपास होना चाहिए।
मौतों का बड़ा हिस्सा भी अस्पतालों के बाहर हो रहा है। 17 अगस्त को दर्ज मौतों में 97 प्रतिशत मौत समुदाय के स्तर पर हुईं, यानी संक्रमित लोगों को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाई।
डब्ल्यूएचओ का आकलन है कि यदि संक्रमण की मौजूदा रफ्तार पर प्रभावी ढंग से रोक नहीं लगाई गई तो यह प्रकोप 2014-16 के पश्चिम अफ्रीकी इबोला संकट को पीछे छोड़कर इतिहास का सबसे घातक इबोला प्रकोप बन सकता है।
--आईएएनएस
केआर/
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