Asim Munir बोले Balochistan में उग्रवादियों को मिल रही विदेशी मदद, पाक सेना प्रमुख का बयान
पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर ने शुक्रवार को बलूचिस्तान में सक्रिय उग्रवादियों को ‘‘विदेश प्रायोजित छद्म सैनिक’’ करार देते हुए कहा कि वे प्रांत को अस्थिर करने का काम कर रहे हैं। सेना की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, मुनीर ने बलूचिस्तान के प्रमुख लोगों और नेताओं के साथ बातचीत के दौरान यह टिप्पणी की। बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी हिंसा का सामना कर रहा है।
खनिज संपदा से समृद्ध इस प्रांत में प्रतिबंधित बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) समेत कई संगठन सक्रिय हैं, जो इसकी आजादी की मांग कर रहे हैं। मुनीर ने कहा कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान का वर्तमान तथा भविष्य ‘‘एक है और हमेशा एक रहेगा।’’ उन्होंने किसी देश का नाम लिए बिना आरोप लगाया कि प्रांत में ‘‘सक्रिय उग्रवादियों को विदेशी मदद मिल रही है, जिसका इस्तेमाल शत्रुतापूर्ण तत्व बलूचिस्तान को अस्थिर करने, उसके विकास में बाधा डालने और राज्य तथा लोगों के बीच दूरी पैदा करने के लिए कर रहे हैं।’’ सेना प्रमुख ने कहा कि बलूचिस्तान का भविष्य केवल वहां के लोगों के हाथों में है। बलूचिस्तान की आजादी की मांग करने वाले विद्रोही समूह लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार ने प्रांत को राजनीतिक रूप से हाशिये पर रखा है और उसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है।
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हाल के वर्षों में बीएलए ने सुरक्षा बलों, सरकारी प्रतिष्ठानों, चीनी नागरिकों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से जुड़ी परियोजनाओं को निशाना बनाकर हमले तेज किए हैं।
Gaza Ceasefire समझौतों में स्पष्ट निगरानी और प्रवर्तन तंत्र की कमी से बढ़ा गतिरोध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने जुलाई के अंत में ग़ाज़ा के लिए 15 सूत्री रूपरेखा जारी की थी। इसके तहत हमास अपने हथियार अंतरराष्ट्रीय सत्यापन संस्था से प्रमाणित फलस्तीनी तकनीकविदों की एक समिति को सौंपता और इजराइल चरणबद्ध तरीके से ग़ाज़ा से हट जाता। इजराइल ने नौ अगस्त को इस योजना को आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया।
फिर अमेरिकी दूत जैरेड कुशनर ने मिस्र के तट पर हमास के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। इसके बाद वह यरूशलम पहुंचे, जहां हथियारों का हस्तांतरण अमेरिकी सेना के एक जनरल की निगरानी में करने का प्रस्ताव रखा गया। निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया में यह बदलाव इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि जनवरी 2025 से ग़ाज़ा को लेकर हुए समझौतों में क्या गलत रहा है।
इनमें से किसी भी समझौते ने पहले से यह तय नहीं किया कि अनुपालन को प्रमाणित कौन करेगा। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के ‘पीस एग्रीमेंट डेटाबेस एंड डेटासेट’ ने 2025 में ग़ाज़ा संघर्ष विराम प्रक्रिया से संबंधित चार समझौतों को दर्ज किया है। इनमें जनवरी का संघर्ष विराम समझौता, अक्टूबर में हुए संघर्ष विराम और उससे जुड़े समझौतों की एक श्रृंखला तथा नवंबर में पारित संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव शामिल हैं।
इन समझौतों में बंधकों और कैदियों की अदला-बदली तथा ग़ाज़ा पट्टी के लिए एक अंतरिम प्राधिकरण के गठन जैसे मुद्दों पर प्रावधान किए गए थे। लेकिन इनमें यह स्पष्ट नहीं था कि उल्लंघन किसे माना जाएगा, विवाद की स्थिति में फैसला कौन करेगा और उल्लंघन पाए जाने के बाद प्रक्रिया को दोबारा कैसे शुरू किया जाएगा। जनवरी 2025 के चारों समझौतों में सबसे विस्तृत प्रावधान थे।
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प्रकाशित पाठ में अदला-बदली किए जाने वाले बंधकों और कैदियों की संख्या, इजराइली सैनिकों के ग़ाज़ा से बाहर निकलने के मार्ग और विस्थापित परिवारों के घर लौटने का क्रम तक बताया गया था। लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया था कि पक्षों को समझौते का पालन कराने की व्यवस्था क्या होगी। अमेरिका, मिस्र और कतर को गारंटर बनाया गया था और उनसे केवल बातचीत जारी रखने की दिशा में काम करने को कहा गया था।
कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जासिम अल-थानी ने समझौते के साथ ही एक फॉलोअप तंत्र की घोषणा की थी, लेकिन इसे समझौते का हिस्सा नहीं बनाया गया था। गारंटरों को समस्याओं को दर्ज करने का अधिकार था, लेकिन समझौते को लागू कराने का अधिकार नहीं था। यह कमी समझौते का पहला चरण एक मार्च को समाप्त होने पर सामने आई।
दूसरा चरण अधर में रहा और 18 मार्च को इजराइल ने फिर से बमबारी शुरू कर दी। अक्टूबर 2025 में हुए दो समझौतों का उद्देश्य संशोधित शर्तों के तहत प्रक्रिया को फिर से पटरी पर लाना था। 10 अक्टूबर के समझौते में जनवरी के समझौते में मौजूद प्रवर्तन तंत्र की कमी को दूर करने की कोशिश की गई।
अमेरिकी सेना की मध्य कमान, जो मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए जिम्मेदार है, द्वारा इजराइल से संचालित एक केंद्र बनाया गया। इसका काम सहायता का समन्वय करना और संघर्ष विराम की निगरानी करना था। लेकिन दो महीने बाद भी बहुत कम बदलाव हुआ।
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राहतकर्मियों और संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों ने सहायता पर जारी प्रतिबंधों तथा ग़ाज़ा के शासन और सुरक्षा को लेकर बातचीत न होने की शिकायत की। अमेरिका, मिस्र, कतर और तुर्किये के नेताओं ने 13 अक्टूबर को तथाकथित ‘ट्रंप डिक्लेरेशन फॉर एंड्यूरिंग पीस एंड प्रॉस्पेरिटी’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में धार्मिक सहिष्णुता, मानवाधिकार, सुरक्षा और क्षेत्र में संवाद से जुड़े व्यापक सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई।
इजराइल और हमास, दोनों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। यह असामान्य नहीं है, क्योंकि कई बार गारंटर उन समझौतों पर हस्ताक्षर करते हैं जिन पर संघर्षरत पक्ष हस्ताक्षर नहीं करते। लेकिन चार सरकारें उन दो पक्षों की ओर से सहिष्णुता और मानवाधिकार की गारंटी नहीं दे सकतीं, जिन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर ही नहीं किए हों।
इसके अलावा, दस्तावेज में यह भी नहीं बताया गया कि इन सिद्धांतों को लागू कराने के लिए वे क्या करेंगी। नवंबर में संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव संस्थागत रूप से सबसे महत्वपूर्ण समझौता था। इसने ट्रंप की ग़ाज़ा शांति योजना, जिसे ‘ग़ाज़ा संघर्ष समाप्त करने की व्यापक योजना’ कहा गया, का आधिकारिक समर्थन किया और ग़ाज़ा में राजनीतिक संक्रमण की निगरानी के लिए गठित एक नए अंतरिम निकाय के प्रमुख के रूप में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की स्थापना की।
हालांकि, प्रस्ताव में यह नहीं बताया गया कि इस निकाय में कौन-कौन शामिल होगा। महिलाओं की भूमिका का भी उल्लेख नहीं किया गया, जबकि समझौते में महिलाओं का जिक्र केवल कैदियों और बंधकों के संदर्भ में आता है। प्रस्ताव ने ग़ाज़ा के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए संस्थागत व्यवस्था जरूर बनाई।
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इसमें फलस्तीनी लोगों के ‘‘आत्मनिर्णय और राज्य का दर्जा’’ हासिल करने से संबंधित प्रावधान भी था। लेकिन इस प्रस्ताव में भी संघर्ष विराम समझौतों जैसी ही कमी थी। पंद्रह सूत्री रूपरेखा का उद्देश्य पिछले समझौतों में मौजूद कुछ विवरणों की कमी को दूर करना था।
योजना में एक अंतरराष्ट्रीय सत्यापन समिति का प्रावधान है, जो यह प्रमाणित करती कि अगले चरण में जाने से पहले दोनों पक्षों ने मौजूदा चरण पूरा कर लिया है। हालांकि, रूपरेखा में किए गए इजराइली सैनिकों की चरणबद्ध वापसी के वादे को अब बदल दिया गया है। 17 अगस्त को ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को आश्वस्त किया कि हमास के निरस्त्रीकरण के पूरी तरह होने तक इजराइली सेना ग़ाज़ा से बाहर नहीं जाएगी।
इस निरस्त्रीकरण के सत्यापन की जिम्मेदारी भी बहुपक्षीय समिति से हटाकर एक अमेरिकी जनरल को सौंप दी गई है। इस समझौते के किसी भी व्यवहारिक स्वरूप के लिए ऐसे मध्यस्थ की जरूरत है जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें और जिसकी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होने से पहले हो। साथ ही, उल्लंघन होने की स्थिति में उठाए जाने वाले कदमों की स्पष्ट प्रक्रिया भी तय होनी चाहिए।
इस व्यवस्था में उन क्षेत्रीय गारंटरों को भी शामिल करना जरूरी है, जिन्होंने शुरुआत में इन समझौतों को संभव बनाया था। इसके अलावा, ऐसी शासन व्यवस्था की जरूरत है जिसमें ग़ाज़ा के फलस्तीनियों की कुछ भूमिका हो, उन्हें भविष्य के लिए एक राजनीतिक लक्ष्य मिले और युद्ध के कारण हुए आघात से निपटने के लिए कुछ साधन उपलब्ध हों। ऐसा नहीं होने पर, भले ही निरस्त्रीकरण का विवाद सुलझ जाए, निर्णय लेने और अनुपालन सुनिश्चित करने की वही कमी फिर गतिरोध को जन्म देगी।
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