Rajasthan News: एनालॉग पनीर को लेकर राजस्थान में नियम अलग! नकली होने के बाद भी जारी बिक्री, क्यों
Rajasthan News: पनीर इन दिनों सियासत का हिस्सा बना हुआ है. पहले महाराष्ट्र फिर गुजरात, छत्तीसगढ़ और अब राजस्थान. देश के लगभग हर राज्य में पनीर के नकली होने की पुष्टि हो रही है. इसलिए, एनालॉग पनीर पर बैन भी लगाया जा रहा है. मगर उसी बीच देश में अजीबोगरीब विरोधाभास है कि केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने एनालॉदग पनीर को गैरकानूनी नहीं बताया है. इतना ही नहीं इसे बेचने और बनाने की भी छूट दी है. बस इतनी शर्त रखी गई है कि पैकेट पर साफ-साफ लिखा हो कि यह असली दूध से नहीं बना है. अब राजस्थान इस घेरे में आ गया है कि आखिर राज्य में एनालॉग पनीर बैन है लेकिन उसे बनाने और बेचने पर नहीं. यह उलझन की नई वजह बन गई है.
क्या है यह एनालॉग पनीर?
एनालॉग पनीर देखने में, स्वाद में और बनावट में बिल्कुल असली दूध के पनीर जैसा लगता है, लेकिन इसे बनाने में मिल्क फैट या दूध के प्रोटीन की जगह वेजिटेबल ऑयल, स्टार्च, सोया या मटर के प्रोटीन और चिपकाने वाले पदार्थों का इस्तेमाल किए जाते हैं. कहीं-कहीं तो सोडा और वनस्पति घी से नकली दूध और फ्रेंच चॉक यानी सेलखड़ी से नकली मावा भी तैयार किया जाता है. इसकी लागत असली पनीर से बहुत कम होती है. इसलिए, होटल, ढाबों, रेस्तरां और खानपान के बड़े कारोबार में इसका खुलकर इस्तेमाल किया जा रहा है. समस्या तब पैदा होती है जब इसे उसी कीमत पर, बिना किसी सूचना के, असली दूध के पनीर के नाम पर बेचा जाता है.
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असमंजस में राजस्थान सरकार
राजस्थान में एनालॉग पनीर के उत्पादन और बिक्री पर अन्य राज्यों की तरह स्पष्ट प्रतिबंध नहीं लगता दिख रहा है. खाद्य सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि फूड सेफ्टी एक्ट में अलग से कोई प्रावधान नहीं होने की वजह से कार्रवाई सिर्फ सामान्य मिलावट के आधार पर ही की जा रही है, जिससे असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
राजस्थान की स्थिति बाकी राज्यों से अलग क्यों?
राजस्थान की स्थिति बाकी राज्यों से कुछ अलग है. दरअसल, देश के कुल दूध उत्पादन में करीब 15 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ राजस्थान देश का दूसरा सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है. इसके बाद भी यहां पनीर, मावा और घी जैसे एनालॉग उत्पादों के निर्माण और बिक्री पर अलग से कोई प्रतिबंध लागू नहीं किया जा रहा है. इनकी निगरानी फिलहाल सामान्य खाद्य मिलावट जांच के तहत ही की जा रही है. पिछले साल राज्य में हजारों फूड सैंपल्स की जांच की गई थी, जिनमें बड़ी संख्या में नमूने निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरे थे. हालांकि, दूध और मावा से जुड़ी मिलावट के मामलों का अलग से विस्तृत आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है.
वहीं, खाद्य उत्पादों की लेबलिंग को लेकर बरती जा रही लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता का कारण बनी हुई है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि पब्लिक हेल्थ, विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए. इस मामले में केंद्र सरकार से भी जवाब मांगा जा रहा है.
कानून क्या कहता है?
कानूनी स्थिति की बात करें तो यदि एनालॉग पनीर को सही जानकारी और उचित लेबलिंग के साथ बेचा जाता है, तो मौजूदा नियमों के तहत यह अपने आप में गैरकानूनी नहीं है. केंद्र सरकार ने इस तरह के उत्पादों पर सीधे प्रतिबंध लगाने के बजाय उनकी पहचान और ट्रांस्पेरेंसी वाली लेबलिंग पर जोर दिया है. हालांकि, बाजारों में समस्या तब पैदा होती है जब ऐसे उत्पादों को बिना स्पष्ट जानकारी के ही असली दूध से बने पनीर के समान कीमत पर बेचा जाता है.
CM भजनलाल शर्मा कब लेंगे कोई फैसला?
जब दूसरे राज्य एनालॉग पनीर को लेकर डायरेक्ट बैन जैसे सख्त कदम उठाएं हैं, तो राजस्थान सरकार आखिर कब जागेगी? छत्तीसगढ़ ने एनालॉग पनीर की बिक्री पर रोक लगाई है और मध्य प्रदेश ने भी इस पर सख्त फैसला लिया है. ऐसे में सवाल यह है कि देश के सबसे बड़े दूध उत्पादक राज्यों में शामिल राजस्थान में उपभोक्ताओं की सुरक्षा को लेकर सरकार की नीति क्या है?
अगर बाजार में एनालॉग पनीर असली दूध से बने पनीर के नाम या कीमत पर बेचा जा रहा है, तो सिर्फ सामान्य मिलावट जांच के भरोसे बैठना कितना सही है? क्या सरकार किसी बड़े हादसे या गंभीर स्वास्थ्य संकट का इंतजार कर रही है? जब मामला सीधे जनता और खासकर बच्चों का है, तो मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार एनालॉग पनीर की बिक्री और लेबलिंग को लेकर स्पष्ट नीति कब बनाएगी?
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भारत-ईयू एफटीए व्यापार और निवेश के नए अवसर खोलेगा, भारतीय कंपनियों के साथ सहयोग को लेकर उत्साहित हैं यूरोपीय कारोबार: फिनलैंड ट्रेड काउंसलर
नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। फिनलैंड दूतावास के व्यापार सलाहकार (ट्रेड काउंसलर) एंटी हेरलेवी ने शुक्रवार को कहा कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दोनों पक्षों के व्यवसायों के लिए नए अवसर पैदा करेगा और भारत तथा यूरोपीय देशों के बीच व्यावसायिक सहयोग को नई ऊंचाई देगा। उन्होंने कहा कि यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ अधिक निकटता से काम करने को लेकर काफी उत्साहित हैं और समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन का इंतजार कर रही हैं।
हेरलेवी ने कहा, यह वर्ष बेहद महत्वपूर्ण है। जैसा कि आप जानते हैं, मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और यूरोपीय कंपनियां भारत तथा भारतीय उद्योगों के साथ अधिक गहराई से काम करने की इच्छुक हैं। इस समझौते को लेकर काफी उत्साह है और हमें उम्मीद है कि इसकी सभी व्यावहारिक प्रक्रियाएं जल्द पूरी हो जाएंगी।
उन्होंने कहा कि व्यवसाय जगत इस समझौते के लागू होने का इंतजार कर रहा है, क्योंकि इससे दोनों पक्षों की कंपनियों को व्यापार विस्तार, निवेश और व्यावसायिक साझेदारी बढ़ाने के नए अवसर मिलेंगे। उनके अनुसार, यह समझौता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत और यूरोप के बीच सहयोग को भी मजबूत कर सकता है।
हेरलेवी ने आगे यह भी कहा कि भारत चक्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में फिनलैंड के अनुभव से महत्वपूर्ण लाभ उठा सकता है। उन्होंने बताया कि फिनलैंड सहित कई यूरोपीय देशों ने लंबे समय से संसाधनों के पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों को अपनाने पर काम किया है। ऐसे में दोनों देशों की कंपनियां संसाधनों की खपत कम करने, उत्पाद डिजाइन को बेहतर बनाने और पुनर्चक्रण प्रणालियों को मजबूत करने के क्षेत्र में सहयोग कर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल उद्देश्य संसाधनों का अधिकतम उपयोग और अपशिष्ट को न्यूनतम करना है। यदि सामग्री के उपयोग को कम किया जाए तो पूरी आपूर्ति शृंखला में लागत और पर्यावरणीय प्रभाव घटाया जा सकता है। इससे ऊर्जा और पानी की खपत भी कम होगी तथा नई कच्ची सामग्री पर निर्भरता घटेगी, जिनके उत्पादन में आमतौर पर अधिक ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन होता है।
हेरलेवी ने कहा, सरल शब्दों में कहें तो हमें कम सामग्री का उपयोग करना चाहिए और अधिक से अधिक पुनर्चक्रण करना चाहिए। यह वास्तव में एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम हो सकता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था की शुरुआत उत्पाद के डिजाइन चरण से ही होनी चाहिए। कंपनियों को ऐसे उत्पाद विकसित करने चाहिए जिनमें कम सामग्री का उपयोग हो, जिनका जीवनकाल अधिक हो और जिनके उपयोग के बाद सामग्री को आसानी से पुनर्चक्रित किया जा सके।
उन्होंने कहा, यह प्रक्रिया शुरुआती चरण से शुरू होती है। बेहतर योजना और उत्पाद डिजाइन ही ऐसे टिकाऊ उत्पादों का आधार बन सकती है जो चक्रीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप हों।
--आईएएनएस
डीबीपी
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