होर्मुज में अमेरिका पर ईरान भारी पड़ रहा:ट्रम्प की धमकी के बावजूद जहाज ईरानी रूट से जा रहे, सिर्फ 3 ने ओमानी रास्ता चुना
होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले ज्यादातर जहाज अपनी पहचान या रास्ता छिपा रहे हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 236 जहाज यहां से गुजरे, लेकिन 148 जहाजों की राह साफ तौर पर पता नहीं चल सकी। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि ट्रम्प की धमकियों के बावजूद कई जहाज ईरानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि होर्मुज स्ट्रेट में इस समय अमेरिका का दबदबा ज्यादा है या ईरान का। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री यातायात पर अमेरिकी सेना का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अमेरिका इस इलाके की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश कर सकता है। वहीं, ईरान का कहना है कि तेहरान की मंजूरी के बिना कोई जहाज होर्मुज स्ट्रेट से नहीं गुजर सकता। ऐसे में दोनों देशों के दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि वास्तव में इस रास्ते पर किसका कंट्रोल है। ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावे ट्रम्प ने ओमान पर बमबारी की धमकी भी दी है। ओमान अमेरिका का सहयोगी है और होर्मुज स्ट्रेट के दूसरी तरफ ईरान के सामने स्थित है। स्ट्रेट का समुद्री इलाका ईरान और ओमान दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ट्रम्प की धमकी का मकसद मस्कट को तेहरान के साथ होर्मुज स्ट्रेट का संयुक्त संचालन करने के समझौते से रोकना बताया गया है। युद्ध के बाद दो रास्तों में बंटा होर्मुज युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज को एक ही समुद्री रास्ता माना जाता था। जहाज तय रास्ते से गुजरते थे। उनका रास्ता बंदरगाह, जहाज के समझौते और सुरक्षा को देखकर तय होता था। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद यहां दो अलग रास्तों की बात होने लगी। ईरानी रास्ता: यह होर्मुज के उत्तरी हिस्से में ईरान के तट के पास है। यह लारक और किश्म द्वीपों के करीब से गुजरता है और ईरान के बंदरगाहों और तेल टर्मिनलों तक जाता है। ओमानी रास्ता: यह होर्मुज के दक्षिणी हिस्से में ओमान के करीब है और ईरान के तट से दूर है। अमेरिका इसी रास्ते से जहाजों को गुजरने पर जोर देता है। अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा में चलने वाले कई कॉमर्शियल जहाज भी इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। 80% से ज्यादा जहाजों का रास्ता पता नहीं समुद्री खुफिया कंपनी केप्लर के मुताबिक, 1 से 19 अगस्त के बीच 112 तेल, एलपीजी और एलएनजी ले जाने वाले जहाज होर्मुज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें से 21 जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गए, जबकि सिर्फ 2 जहाजों ने ओमानी रास्ते का इस्तेमाल किया। बाकी 89 जहाजों का रास्ता साफ नहीं था। यानी इस दौरान होर्मुज से गुजरने वाले 80% से ज्यादा तेल और गैस वाले जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ट्रैक नहीं हो सकी। ऐसा तब होता है जब जहाज अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) बंद कर देते हैं। कई बार जहाज का AIS डेटा केप्लर के तय ईरानी या ओमानी रास्तों से मेल भी नहीं खाता। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में किस रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों में भी ईरानी रास्ता आगे 1 से 19 अगस्त के बीच कुल 236 जहाज स्ट्रेट से गुजरे। इनमें तेल और गैस के अलावा सूखा माल और रसायन ले जाने वाले जहाज भी शामिल थे। यानी हर 10 में से 6 से ज्यादा जहाज किस रास्ते से गुजरे, यह साफ तौर पर पता नहीं चल सका। जहाज AIS क्यों बंद कर रहे हैं? युद्ध शुरू होने के बाद ईरान और अमेरिका दोनों ने अपने बताए समुद्री रास्तों या नियमों का पालन नहीं करने वाले जहाजों को चेतावनी दी। कुछ मामलों में जहाजों पर हमले भी हुए। इसी वजह से कई जहाज अपना ट्रांसपोंडर बंद कर रहे हैं। इससे उनकी सही स्थिति और वे किस रास्ते से जा रहे हैं, इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। ब्रिटेन के थिंक टैंक चैथम हाउस के एसोसिएट फेलो नील क्विलियम ने अल जजीरा से कहा कि ट्रांसपोंडर बंद करने से जहाज की आवाजाही कम दिखाई देती है। हालांकि, इससे समुद्री सुरक्षा का खतरा भी बढ़ जाता है। उनके मुताबिक, कुछ जहाज कंपनियां खतरे के बावजूद अपना कारोबार जारी रखना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे होने वाला फायदा जोखिम से ज्यादा है। रास्ते में जहाजों के बीच सामान भी बदला जा रहा ट्रांसपोंडर बंद करने की एक वजह समुद्र में दो जहाजों के बीच सामान का ट्रांसफर भी है। एनर्जी एक्सपर्ट मार्क अयूब ने अल जजीरा से कहा कि सऊदी अरब, इराक और कुवैत समेत कुछ खाड़ी देशों ने ओमानी रास्ते से कुछ खेप भेजीं। इसके लिए कुछ जहाजों की ट्रैकिंग बंद की गई और रास्ते में दूसरे जहाजों को माल सौंपा गया। उनके मुताबिक, कुछ ईरानी जहाज भी ओमानी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका मकसद प्रतिबंधों और अमेरिकी नाकाबंदी से बचना है। क्या आंकड़े ईरान के दबदबे की ओर इशारा कर रहे हैं? 148 जहाजों का रास्ता साफ नहीं होने की वजह से यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में कितने जहाज ईरानी या ओमानी रास्ते से गुजरे। फिर भी उपलब्ध आंकड़ों से एक बात सामने आती है। अमेरिकी नाकाबंदी और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद हर पांच में से एक जहाज खुले तौर पर ईरानी रास्ते से गुजरा। सभी तरह के जहाजों को मिलाकर देखें तो 35% जहाजों ने सार्वजनिक रूप से ईरानी रास्ते का इस्तेमाल किया। इसके मुकाबले ओमानी या पुराने रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम रही। इससे संकेत मिलता है कि कई जहाज अमेरिकी धमकियों के बावजूद ईरानी रास्ते का इस्तेमाल करने को तैयार हैं। यानी मौजूदा हालात में ईरान को नाराज करने का डर ट्रम्प की धमकियों से ज्यादा असरदार दिखाई दे रहा है। होर्मुज दुनिया के लिए इतना अहम क्यों है अमेरिका-इजराइल का ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के तेल और एलएनजी की करीब एक-पांचवीं सप्लाई होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरती थी। तब हर दिन करीब 130 जहाज यहां से गुजरते थे। इसके मुकाबले अगस्त के 19 दिनों में कुल 236 जहाज ही यहां से गुजरे। ईरान ने मार्च की शुरुआत में स्ट्रेट बंद कर दिया था और सिर्फ अपने मित्र देशों के जहाजों को गुजरने दिया। 17 जून को अमेरिका के साथ MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद भी यह जलमार्ग दोनों देशों की बातचीत का सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। इस संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी पड़ा। संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट कच्चा तेल करीब 66 डॉलर प्रति बैरल था। मार्च में यह 119 डॉलर तक पहुंच गया। बाद में कीमत घटी, लेकिन तनाव बढ़ने के साथ फिर चढ़ गई। गुरुवार सुबह ब्रेंट कच्चा तेल 92.9 डॉलर प्रति बैरल पर था। नील क्विलियम के मुताबिक, अगर जहाजों की आवाजाही पर तेहरान का असर कम होता हुआ माना गया, तो अमेरिका के साथ बातचीत में दबाव बनाने का ईरान का एक अहम हथियार कमजोर पड़ सकता है। ---------------------------- यह भी पढ़ें….. ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
चीन बोला-जापान के पास 5500 परमाणु बम बनाने जितना प्लूटोनियम:राजदूत ने कहा- चाहे तो कभी भी परमाणु हथियार बना सकता है
चीन ने जापान की परमाणु क्षमता को लेकर फिर चिंता जताई है। रूस में चीन के राजदूत झांग हानहुई ने दावा किया कि जापान के पास इतना प्लूटोनियम है, जिससे करीब 5,500 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। रूस की सरकारी न्यूज एजेंसी TASS में लिखे एक लेख में झांग ने कहा कि जापान के पास परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करने और प्लूटोनियम निकालने की तकनीक भी है। उन्होंने कहा कि अगर जापान के पास परमाणु हथियार बनाने की इच्छा और जरूरी क्षमता है, तो उसका परमाणु शक्ति बनना अब सिर्फ कल्पना नहीं है। चीन बोला- जापान का 2024 से 300% प्लूटोनियम बढ़ा झांग ने कहा कि 2024 के अंत तक जापान के पास 44.4 टन प्लूटोनियम था। यह इस्तेमाल किए जा चुके परमाणु ईंधन से निकाला गया है। अब जापानी स्टोरेज में 191 टन और प्लूटोनियम मौजूद है, जिसे अभी निकाला नहीं गया है। यानी करीब 300% का इजाफा। झांग ने आगे कहा, अगर टोक्यो परमाणु हथियार बनाने का फैसला करता है, तो पूर्वोत्तर एशिया का शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। इससे इस इलाके में कभी भी परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। जापान गैर-परमाणु सिद्धांतों के कारण हथियार नहीं बनाता जापान के तीन गैर-परमाणु सिद्धांत हैं। यह एक राष्ट्र नीति है, जिसके तहत जापान ने 3 अहम संकल्प लिए हैं- 1. परमाणु हथियार न रखना 2. परमाणु हथियार न बनाना 3. परमणु हथियार को अपने देश में न आने देना इन सिद्धांतों की घोषणा 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ईसाकु सातो ने की थी। इसके पीछे हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों का डरावना असर और जापानी लोगों की परमाणु हथियारों के खिलाफ सोच थी। हालांकि ये सिद्धांत कानून नहीं हैं, लेकिन कई दशकों से ये जापान की सुरक्षा नीति और शांतिवादी संविधान का अहम हिस्सा बने हुए हैं। --------------- यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-आर्थिक हमले से ईरान को दुनिया से काट देंगे: जो देश ईरान का साथ देंगे, वे नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि ईरान ने समझौते का मौका गंवा दिया है। अब उसे आर्थिक तौर पर अलग-थलग किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…
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