डबल मर्डर और सुसाइड से लखनऊ में फैली सनसनी, पत्नी और बहन की हत्या के बाद पति ने खुद को मारी गोली
Lucknow Double Murder Suicide Case: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गुरुवार को दोहरे मर्डर और खुदकुशी की घटन से सनसनी फैल गई. जहां पति ने पहले अपनी बैंक अधिकारी पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी. उसके बाद घर पहुंचकर अपनी बहन को भी गोली मार दी. बाद में खुद भी गोली मारकर खुदकुशी कर ली.
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सज्जन कुमार का सियासी सफर: तीन बार सांसद बनने से 1984 दंगा मामलों तक, जानिए बड़े विवाद और उपलब्धियां
दिल्ली की राजनीति में कभी प्रभावशाली चेहरा रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का राजनीतिक सफर उपलब्धियों और गंभीर विवादों से भरा रहा है. नगर निगम पार्षद से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे कुमार ने तीन बार लोकसभा का चुनाव जीता, लेकिन 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों ने उनके राजनीतिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी. हाल के वर्षों में अदालतों के अलग-अलग फैसलों के कारण उनका नाम एक बार फिर चर्चा में रहा है.
नगर निगम से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
सज्जन कुमार ने 1970 के दशक में दिल्ली की स्थानीय राजनीति से शुरुआत की. 1977 में वह दिल्ली नगर निगम के पार्षद चुने गए और इसी दौर में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी बने. इसके बाद उनका राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ा.
1980 में उन्होंने बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया. इस चुनाव में उन्होंने दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश को हराया था. यह जीत उनके राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ मानी गई.
तीन बार लोकसभा पहुंचे
सज्जन कुमार 1980, 1991 और 2004 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. 2004 में उन्होंने बाहरी दिल्ली से दोबारा जीत दर्ज की. संसद में उन्होंने शहरी विकास और सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना से जुड़ी समितियों में भी काम किया.
हालांकि, 1996 की हार के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव एक समय कमजोर पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली की राजनीति में अपनी पकड़ बनाए रखी और 2004 में एक बार फिर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे.
सामाजिक काम भी रहे चर्चा में
संसद की आधिकारिक जीवनी में सज्जन कुमार का पेशा सामाजिक कार्यकर्ता और कारोबारी बताया गया है. इसमें विधवाओं और गरीब महिलाओं की बेटियों के विवाह में आर्थिक सहायता, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुनर्वास और दिव्यांग लोगों की मदद जैसी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है.
यही उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष था, जिसमें स्थानीय स्तर पर सामाजिक संपर्क और जनकल्याण से जुड़े कामों को महत्व दिया जाता था.
1984 के दंगों ने बदल दी तस्वीर
सज्जन कुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा विवाद 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ा रहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुई हिंसा के दौरान उन पर भीड़ को उकसाने और हिंसा में भूमिका निभाने के आरोप लगे.
इन आरोपों ने दशकों तक उनका पीछा किया और उनके राजनीतिक करियर को गंभीर नुकसान पहुंचाया.
2018 में दिल्ली हाई कोर्ट से उम्रकैद
1984 के दंगा मामले में निचली अदालत से राहत मिलने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 में फैसला पलटते हुए सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई. यह मामला पांच सिखों की हत्या और हिंसा से जुड़ा था.
इसके बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. उनकी राजनीतिक सक्रियता भी लगभग समाप्त हो गई.
2025 में हत्या के एक और मामले में दोषी
फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने 1984 की हिंसा से जुड़े एक अन्य मामले में सज्जन कुमार को दो सिखों—जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या का दोषी ठहराया. बाद में उन्हें उम्रकैद की सजा दी गई.
2026 में कुछ मामलों में मिली राहत
हालांकि, सभी मामलों में अदालतों का फैसला उनके खिलाफ नहीं रहा. जनवरी 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने जनकपुरी और विकासपुरी में 1984 की हिंसा से जुड़े एक मामले में सज्जन कुमार को बरी कर दिया. अदालत ने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सबूत नहीं पाए और गवाहों द्वारा कई दशक बाद उनका नाम लिए जाने को भी महत्वपूर्ण माना. इस तरह उनके खिलाफ दर्ज अलग-अलग मामलों में न्यायिक निष्कर्ष अलग-अलग रहे हैं.
उपलब्धियों और विवादों के बीच पूरा हुआ सफर
सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति के उन अध्यायों में शामिल है, जहां एक नेता की चुनावी सफलता और सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव के साथ गंभीर कानूनी विवाद भी जुड़े रहे. नगर निगम से शुरुआत करके तीन बार लोकसभा पहुंचना उनकी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि रही, जबकि 1984 के दंगा मामलों में दोषसिद्धियों ने उनके करियर की दिशा पूरी तरह बदल दी.
आज सज्जन कुमार सक्रिय राजनीति से बाहर हैं और जेल में सजा काट रहे हैं. उनका सफर यह भी दिखाता है कि लंबे राजनीतिक प्रभाव और चुनावी सफलता के बावजूद गंभीर आपराधिक मामलों की न्यायिक प्रक्रिया किसी नेता की सार्वजनिक विरासत को किस तरह पूरी तरह बदल सकती है.
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