AAP का आरोप: Delhi Voter List से बिहार-यूपी के प्रवासियों के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए
आम आदमी पार्टी (आप) ने बुधवार को आरोप लगाया कि दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत बिहार और उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी मतदाताओं को मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर हटाया गया है। आप विधायक संजीव झा का यह आरोप दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय द्वारा सोमवार को दी गई जानकारी के बाद आया है। सीईओ कार्यालय ने बताया था कि शहर में कुल 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 97.47 लाख मतदाताओं ने अपने गणना प्रपत्र जमा किए हैं, जिन्हें सभी विधानसभा क्षेत्रों में बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) ने डिजिटल रूप में दर्ज किया है।
यह संख्या कुल मतदाताओं की 67.18 प्रतिशत है। गणना प्रपत्र जमा करने की अंतिम तारीख 17 अगस्त थी। संजीव झा ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए दावा किया कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत हटाए गए अधिकतर मतदाता बिहार और उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इनमें ज्यादातर नाम अनुपस्थित और स्थानांतरित श्रेणी के तहत हटाए गए हैं। अनधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में पहचान को लेकर कई समस्याएं हैं। बीएलओ ने अपना काम ठीक से नहीं किया है।
ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग ने जानबूझकर उनके नाम सूची से हटाए हैं।’’ बुराड़ी से विधायक झा ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने पहले निर्वाचन आयोग के साथ हुई बैठक में उन नामों का आंकड़ा मांगा था, जिन्हें अनुपस्थित और स्थानांतरित श्रेणी के तहत मसौदा मतदाता सूची से हटाया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘लोगों के मतदान के अधिकार को बनाए रखा जाना चाहिए। मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया समावेश की नहीं, बल्कि बहिष्कार की प्रक्रिया है।
हमने सुझाव दिया था कि जिन क्षेत्रों में 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, वहां बीएलओ की राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ अलग बैठक कराई जाए। निर्वाचन आयोग ने इस पर सहमति जताई थी, लेकिन बाद में हमें कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया और न ही कोई बैठक बुलाई गई। यह जानबूझकर किया जा रहा है।’’ आम आदमी पार्टी के नेता ने कहा कि निर्वाचन आयोग को इस प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा बड़ी संख्या में लोग मतदान प्रक्रिया से वंचित हो जाएंगे।
एसआईआर के तहत घर-घर सत्यापन अभियान 30 जून को शुरू हुआ था और 17 अगस्त को समाप्त हुआ। इस दौरान 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की संभावना है, क्योंकि या तो उन्होंने गणना प्रपत्र जमा नहीं किए हैं या उन्हें एएसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाता) की श्रेणी में चिह्नित किया गया है। सत्यापन अभियान के दौरान 30 जून से 17 अगस्त के बीच बीएलओ ने प्रत्येक मतदाता को गणना प्रपत्र उपलब्ध कराए थे।
जिन मतदाताओं ने गणना प्रपत्र जमा नहीं किए हैं, वे 24 अगस्त से 23 सितंबर के बीच दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान प्रपत्र-6 जमा कर सकेंगे।
CBI probe का HC ने दिया आदेश, श्रावस्ती मुठभेड़ में पुलिस की कहानी पर उठे सवाल
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती में हुई एक कथित पुलिस मुठभेड़ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने का बुधवार को आदेश दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में कई स्पष्ट विसंगतियां हैं और प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि थाना प्रभारी ने घटना का गलत विवरण पेश किया। अदालत ने निर्देश दिया कि जांच रिपोर्ट तीन महीने के भीतर पेश की जाए।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन की ओर से दाखिल आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने सीबीआई को इकौना थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109 और शस्त्र अधिनियम की धारा 3/25 के तहत दर्ज प्राथमिकी की सत्यता की जांच करने का निर्देश दिया है। अदालत ने सीबीआई को थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की निशाना लगाने की क्षमता की भी जांच करने को कहा है।
इसने कहा कि इस जांच में यह भी देखा जाएगा कि क्या वह रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार में गोली भरने की आवाज सुनकर अपनी नौ एमएम की सरकारी पिस्तौल से सटीक निशाना लगा सकते हैं। अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज घावों के आकार और थाना प्रभारी के इस स्पष्टीकरण पर भी सवाल उठाया कि ये घाव नौ एमएम की गोली लगने से हुए थे। मामला उस कथित मुठभेड़ से जुड़ा है, जिसमें अलाउद्दीन के दोनों पैरों में गोली लगी थी।
पुलिस का दावा था कि उसने 23 सदस्यीय पुलिस दल पर गोली चलाई थी। थाना प्रभारी के अनुसार, हथियार में गोली भरने की आवाज सुनने के बाद उन्होंने आत्मरक्षा में दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं। अलाउद्दीन के अधिवक्ता नदीम मुर्तजा ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्राथमिकी के अनुसार 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में सवार थे और बाद में तीन दलों में बंट गए, जबकि किसी अन्य वाहन का उल्लेख नहीं है।
इसके बाद 10 सदस्यों वाला एक और दल मौके पर पहुंचा और पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 23 हो गई। मुर्तजा ने सवाल उठाया कि 23 पुलिसकर्मी एक ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति को कैसे नहीं रोक पाए। उन्होंने यह भी कहा कि यह बात समझ से परे है कि पुलिस दल कथित रूप से एक देसी तमंचा और केवल दो कारतूस रखने वाले व्यक्ति से निपटने के लिए छिप गया और अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया।
अदालत ने गोली लगने के बाद अलाउद्दीन से कथित रूप से दर्ज कराए गए इकबालिया बयान पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि सात वर्षीय बच्ची के अपहरण से संबंधित मूल प्राथमिकी घटना के 61 मिनट के भीतर दर्ज हो गई थी, लेकिन उसमें दुष्कर्म, रक्तस्राव या बच्ची के घायल होने का कोई उल्लेख नहीं था। ये बातें बाद में कथित इकबालिया बयान में सामने आईं।
अदालत ने प्रथमदृष्टया माना कि पुलिस ने संभवतः झूठा इकबालिया बयान दर्ज किया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मुठभेड़ में शामिल सभी 23 पुलिसकर्मियों को कथित अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत किया गया था। इसमें उस अपराध के संबंध में आरोपी से कथित इकबालिया बयान हासिल करना भी शामिल था, जिसमें अलाउद्दीन को पहले ही बरी किया जा चुका था।
उच्चतम न्यायालय द्वारा पुलिस मुठभेड़ों की जांच के लिए तय दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथमदृष्टया इस मामले में गंभीर चोट वाले मुठभेड़ मामलों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। वहीं, याचिकाकर्ता को राहत देते हुए अदालत ने अलाउद्दीन की रिहाई की याचिका खारिज करने के श्रावस्ती की सत्र अदालत के दो जुलाई के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और मामले को 23 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
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