केरल K. Krishnankutty ने तमिलनाडु से जल अधिकारों पर सीखने को कहा
पलक्कड़, दो अगस्त वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) नेता के. कृष्णनकुट्टी ने रविवार को केरल सरकार से आग्रह किया कि वह तमिलनाडु के साथ लंबित जल बंटवारे के मुद्दों को उठाए और कर्नाटक से कावेरी का पानी हासिल करने के तमिलनाडु के तरीके से सीख ले। कृष्णनकुट्टी, एलडीएफ के घटक दल इंडियन सोशलिस्ट जनता दल के वरिष्ठ नेता हैं। वह 2018 से 2021 तक केरल के जल संसाधन मंत्री और 2021 से 2026 तक ऊर्जा मंत्री रहे थे।
कृष्णनकुट्टी ने केरल सरकार की ओर से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को मादक पदार्थ रोधी अभियान ‘ऑपरेशन तूफान’ में आमंत्रित किए जाने का जिक्र करते हुए ‘फेसबुक’ पर एक पोस्ट में कहा कि इस मौके का उपयोग केरल के लंबित जल बंटवारे के मुद्दों पर चर्चा करने और यह समझने के लिए भी किया जाना चाहिए कि पड़ोसी राज्य तमिलनाडु ने अपने जल अधिकारों को प्रभावी ढंग से कैसे सुरक्षित किया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु ने लगातार दबाव बनाया और कर्नाटक से कावेरी नदी के पानी में अपना निर्धारित हिस्सा हासिल करने में सफलता पाई। वरिष्ठ नेता ने कहा, “केरल को इससे सीख लेनी चाहिए।
कावेरी के जलाशयों में जल भंडारण 50 प्रतिशत से कम होने के बावजूद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण ने तमिलनाडु को 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने की मंजूरी दे दी। तमिलनाडु अपना वाजिब हिस्सा हासिल करने में सफल रहा, या यूं कहें कि वह आवश्यक दबाव बनाने में कामयाब रहा।” कृष्णनकुट्टी ने आरोप लगाया कि परंबिकुलम-अलियार समझौते के तहत मिलने वाले पानी को हासिल करने के लिए केरल ने कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। उन्होंने आरोप लगाया, “परंबिकुलम-अलियार समझौते के तहत केरल ने अपने हिस्से का पानी पाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
इसके बजाय उसने तमिलनाडु के उन तर्कों को स्वीकार कर लिया, जिन्हें मैं गलत मानता हूं, और चित्तूर के किसानों के हितों से समझौता कर लिया।” कृष्णनकुट्टी ने दावा किया कि एक ओर तमिलनाडु, कर्नाटक से कावेरी नदी के पानी में अपना हिस्सा हासिल कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह कावेरी नदी घाटी में परंबिकुलम-अलियार परियोजना के तहत उपलब्ध पानी का भी रणनीतिक ढंग से उपयोग कर रहा है, जिससे केरल के किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
IIT अध्ययन: वायु प्रदूषण से Delhi स्थित हुमायूं के मकबरे का हो रहा है क्षरण
नयी दिल्ली, दो अगस्त रुड़की स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-रुड़की) और आईआईटी-कानपुर के संयुक्त अध्ययन से पता चला है कि वायु प्रदूषण की वजह से दिल्ली स्थित हुमायूं के मकबरे पर लगे बलुआ पत्थर के क्षरण की गति बढ़ रही है। यह मकबरा यूनेस्को की विरासत सूची में शामिल है। ‘इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आर्किटेक्चरल हेरिटेज’ में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, अध्ययन के दौरान हुमायूं के मकबरे के विभिन्न हिस्सों से एकत्र किए गए काले परत के नमूनों की रासायनिक संरचना, खनिज सामग्री और सूक्ष्म संरचना का विश्लेषण करने के लिए प्रयोगशाला तकनीकों का उपयोग किया गया।
अनुसंधान टीम ने पाया कि काली परत मुख्य रूप से जिप्सम से बनी होती है और प्रदूषित हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड, कैल्शियम से भरपूर धूल और नमी के साथ प्रतिक्रिया करने पर बनती है। अध्ययन के मुताबिक जिप्सम की परत गाड़ियों के धुएं, निर्माण कार्यों, सड़क की धूल, कृषि अपशिष्ट के जलाने और औद्योगिक प्रदूषण से निकलने वाली कालिख, धूल और धातु के बारीक कणों को रोक लेती है, जिससे धीरे-धीरे बलुआ पत्थर पर एक काली परत बन जाती है। अध्ययन में सामने आया कि स्मारक के बारिश से बचे हिस्सों में सबसे मोटी काली परत बन गई, जहां लंबे समय तक प्रदूषक जमा होते रहते हैं, जबकि ज़्यादा खुली सतहों पर परतें अपेक्षाकृत पतली थीं क्योंकि बारिश स्वाभाविक रूप से कुछ प्रदूषकों को धो देती है।
अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक काली परत केवल सतह पर लगा दाग नहीं है। इस परत को बनाने वाली रसायनिक प्रतिक्रिया धीरे-धीरे बलुआ पत्थर को कमज़ोर कर देती हैं, जिससे वह मौसम की मार और लंबे समय में होने वाले नुकसान के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है। उन्होंने कहा कि अध्ययन के नतीजों से वैज्ञानिक रूप से साबित होता है कि वायु प्रदूषण का संबंध हुमायूं के मकबरे के क्षरण से है और इससे अधिकारियों को इस स्मारक के संरक्षण के उपाय करने में मदद मिल सकती है।
अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि वैज्ञानिक रूप से परखे गए संरक्षण के तरीकों का इस्तेमाल करके समय-समय पर काली परत को हटाया जाए, स्मारक के आस-पास प्रदूषण की लगातार निगरानी की जाए और सुरक्षात्मक परत के इस्तेमाल से पहले उनका आकलन किया जाए। इसमें नुकसानदायक जमाव को बनने से रोकने के लिए स्वच्छ परिवहन प्रणाली और कम उत्सर्जन वाले ईंधन के जरिए प्रदूषण के स्रोत को भी सीमित करने का सुझाव दिया गया। यह मकबरा मुगल बादशाह हुमायूं की याद में 16वीं सदी में बेगा बेगम ने बनवाया था।
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